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Saturday, August 24, 2019

कविता / सफेद घर / एकता कानूनगो बक्षी ( सुबह सवेरे - 25 अगस्त 2019)

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

कविता
सफेद घर
एकता कानूनगो बक्षी

गुलाबी और सफेद
बोगनबेलिया से आच्छादित सफेद रंग का घर
आकर्षित करता है बार बार

पारदर्शी खिड़कियों के भीतर का रहस्य
कुतूहल जगाता है सूरज की रोशनी के साथ

दीवारें
जैसे खिड़कियों में बदल दी गईं हैं इस घर की
और जैसा कि चलन है इन दिनों
एक मात्र प्रवेश द्वार
डोर बेल बजाने को ललचाता रहता है मुझे

धूप के साथ
मन प्रवेश करता है सामने के सफेद घर में

आंगन में चिड़ियों के साथ
बिल्लियाँ और कुछ बच्चे दौड़ लगाते हैं दिन भर
ग्रामीण चौकीदार की झोपड़ी से निकल कर 
रोटियों की महक
मेरी बालकनी को स्मृतियों से भर देती है 

उदास तो कतई नही लगता यह
दो बुजुर्ग रहते हैं इस घर मे
जीवन की शाम बिताते

चाय के दो प्याले खिलखिलाते हैं
सुबह शाम
हंसी हंसी में उड़ा दिए हैं जैसे उन्होंने
अपने सारे दुःख 

जीवन की आख़िरी पारी में
आत्मनिर्भरता ,आत्मसम्मान और संतोष की
भैरवी से गूँजता रहता है सफेद घर।

Tuesday, July 30, 2019

कविता /एक दिन ( नईदुनिया के तरंग परिशिष्ट में -28 जुलाई 2019)

 नईदुनिया के तरंग परिशिष्ट में कविता का प्रकाशन हुआ है। आप भी पढ़ें।

कविता
एक दिन

एक दिन
खेलूँगी बहुत देर तक
तुम्हारे साथ

तुम्हारे साथ ही
कोहरे की रजाई हटा देखूंगी
पहाड़ो को पार करते हुए
सूरज की लंबी कूद

दिन भर धूप और छांव जैसा
नृत्य करेंगे मिलकर
गौरया के साथ

बहरूपिए बादलों में ढूंढेगे अपनों को
और कभी खुद का बिम्ब देख
लगाएंगे ठहाके

गुलाबी शाम का स्वागत करेगे
रंगोलियाँ बना कर आसमान में

टिमटिमाते तारों की गुटबाजी
और चांद की खूबसूरती को
निहारते रहेगे देर तक

धूल और धुंए से मुक्त हो
निर्मल मन से 
चहकते रहेंगे बच्चों की तरह
एक दिन।
****

एकता कानूनगो बक्षी






वीणा में पापा(श्री ब्रजेश कानूनगो) के साथ कविता । जून 2019 अंक



वीणा में पापा के साथ कविताएँ प्रकाशित होने से वीणा का यह जून अंक मेरे लिए खास बन गया है । धन्यवाद श्री राकेश शर्मा सर राकेश शर्मा।





बेटी का पत्र माँ के नाम ( सुबह सवेरे 12 मई 2019)

मदर्स डे की शुभकामनाओं के साथ, सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
बेटी का पत्र माँ के नाम
एकता कानूनगो बक्षी

सुनो माँ !
मुझे तुम्हारे हाथ का बना भोजन अब नहीं खाना
भले ही दुनिया के सारे पकवान
तुम्हारे हाथों से बने खाने के सामने फीके हैं
पर अब मुझे नहीं खाना।

माँ !
इन दिनों
तुम्हारे हाथ का स्वाद स्वतः
मेरे हाथ मे चला आया  है
आये भी क्यों ना
जब अपनी पूरी सृष्टि तुमने
मुझ पर न्यौछावर कर डाली है
मेरी खुशियों
मेरे दुःखों की रेखाएं
नज़र आती है अक्सर तुम्हारे चेहरे पर।
जैसे मैं ही जीवन का उद्देश्य हूँ तुम्हारा
पर बस अब और नहीं।

अब तुम खुद के लिए जीयो माँ
फिर से बचपन मे लौटो
एक बार फिर से नए शौक पालो
और खो जाओ उनमें
दुनिया की सैर करो
नए लोगों से मिलो
खुलकर मुस्कुराओ
अपने अनुभवों से
किसी के जीवन को उजालों से भर दो
पुरानी ज़िम्मेदारियां
अपने सारे बचे काम भूल जाओ अब।

जैसे हर बार तुम हो मेरे लिए,
मैं भी हूँ ना तुम्हारे लिए
तुम्हारी छोटी सी बेटी नहीं
जिद्दी माँ।


बातें करो मुझ से ( 14 अप्रैल 2019)

सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
बातें करो मुझ से
एकता कानूनगो बक्षी

मुझ से बातें करो बेशक उगते सूरज की
पंछियों की , बगीचे में खिले फूलों की
उन पर बैठी तितलियों की
बातें करो प्रेम की
अनुराग की

खिलाड़ियों के जुनून की बातें करो 
वैज्ञानिकों  के हौसलों
और आविष्कारों की बातें करो
समृद्ध देश में खिले हुए चेहरों की बातें करो

नए रास्तों पर बढ़ते कदमों की बातें करो
गगनचुम्बी इमारतों और स्थापत्य की बातें करो

भूत की
वर्तमान की
भविष्य की बात करो मुझसे
आस्था,विश्वास और मूल्यों की बात करो

पर सबसे पहले मुझ से बात करो
उनके दुख की
जिन्हें भोजन नहीं मिला आज का
जिनके अपने और सपने
कुहासों में गुम गए हैं कहीं
संघर्ष और पसीने की गंध की बात करो 
या रहने दो मौन अभी।

Friday, June 30, 2017

शतरंज को शिकस्त

कविता
शतरंज को शिकस्त


शतरंज के खेल की बिसात सजी हुई है
हर चाल का जवाब दूसरी चाल से
पूरी रणनीति के बाद

विजय की अभिलाषा लिए
धीमी रफ्तार से आगे बढ़ता है प्यादा
जो आगे बढ़ा एक बार तो पीछे हटना नामुमकिन
पूरे रास्ते मौत से जूझता
अगर पहुच गया सीमा पार
तो मुकुट पहना दिया जाएगा उसके माथे पर

कुछ सैनिक सीधी चाल चलते हैं
तो कोई बस छलांग जाते हैं बाधाएं
डेढ़ कदम उछलकर
कुछ सुनियोजित और भारी कदम रखते
सबकी नजर उनके हर एक कदम पर

परास्त करने का खेल जारी रहता है
जैसे कोई शीतयुद्ध चल रहा हो खामोशी के साथ

तनाव से भरे माहौल में अचानक
खेल के नियम से बिल्कुल विरुद्ध
स्नेह की रणनीति से भरी एक चाल
गंभीरता के बादलों को जब भेद देती है
चहक और उल्लास की बारिश से
भीग जाती है बिसात

अनुभवी दादा
अपनी छोटी सी पोती से
परास्त हो गए हैं अभी अभी

शतरंज की बिसात अभी भी जमी है
वज़ीर, घोड़ा ,हाथी,ऊंट अचरज से भौचक ताक  रहे है खिलाड़ियों को

किसी की किलकारी ने शायद
मात दे दी है शतरंज को।

एकता 

Wednesday, May 3, 2017

जुनून भी नशा है

कविता 
जुनून भी नशा है 

किसी फल या वनस्पति की सड़ांध 
और खमीर से निकलकर नहीं आता नशा
फल की उम्मीद और सुख की कामना में 
जीवन संघर्ष से निकल कर जो रस बहता है निरंतर
अद्भुत होता है उसका नशा।

लगन  की अग्नि में तप कर 
कुंदन बन जाता है
बेहोश नही होता 
नींद से जाग जाता है 
दुनिया को सुंदर बनाने लगता है  
नशे में डूबा आदमी 

लड़खड़ाता तो बिल्कुल नहीं
सहारा देता है गिरते हुओं को मजबूती से 

नही उखड़ती उसकी सांसे
सरगम की तरह धडकनों का संगीत 
मधुरता से भर देता है जीवन 

ये ही वह नशा है 
जिसने चांद तक पहुंचाया
समुंदर के तल से खोज लिया खजाना 

अंतरिक्ष को छू लेता है
जुनून के नशे में डूबा परिंदा।।

एकता

Friday, December 9, 2016

जड़ें

जड़ें 

बीज आहिस्ता से जगह बनाता है अपनी 
जड़े निर्धारित करती हैं 
उसका वर्तमान और भविष्य

जड़ो से होता हुआ खाद पानी
उसकी देह तक पहुचता है  
उठता है नभ की ओर
पल्लवित होकर 

ये बहुत अचरज की बात है
कि खिलते,लहलहाते नव जीवन को देख
जड़े  उखड़ने लगती है 
ज़मीन से ऊपर निकल , निहारती हैं  अपनी शाखाओं को 


फल , पत्तियो के साथ 
फिर नए रिश्ते बनाता है वृक्ष 
बढ़ता चला जाता है आसमान में निगाहें गढ़ाए

जड़े दूर से निहारती रहती है 
फलो से लदा वृक्ष शीश झुकाये 
मुस्कुराहट के साथ आभार व्यक्त करता है। 

एकता

Tuesday, October 25, 2016

उपवास

उपवास










भोजन को त्याग कर
बैठी है वो
सब कुछ भरा भरा सा है भीतर
सालो से बटौर रही थी
अन्तःकरण में  कही
जो ऊर्जा दे रहा निरंतर

अब न कुछ भीतर जा रहा
न कुछ बाहर आ रहा
अनन्तता से पहले का शून्य पसरा  पड़ा
दिए में थोड़ा और घी उढ़ेल
अन्धकार को रोशनी से भरने की कोशिश कर
उपवास की नयी परिभाषा गड़ रही है वो ।
एकता ***

Tuesday, July 12, 2016

बूंदों की उम्र

बूंदों की उम्र

बूंदों की उम्र क्षणिक
छोटा सा जीवन
सदियों के विशाल संसार में
जैसे छोटी सी उम्र  इंसान की

पलके खुलने से
पलके मुंदने तक का सफ़र
पल भर में मिल जाती संसार सागर में

बूंदों का सफ़र
मधुर स्मृतियों का जैसे एलबम पुराना 
सारांश सुख दुख का

खट्टे मिट्ठे अहसासों
और आलोचनाओ के तराजू के पलड़ों से
खुद को आज़ाद कर देता है जब मन
बारिश होने लगती है
बहने लगती हैं बूँदें

क्षण भर के लिए चमकती बूँदें 
ठंडक देकर
अपनी उम्र पूरी करती है।

एकता

Tuesday, May 10, 2016

ईश्वर

ईश्वर

उसकी मौजूदगी
निरंतर बनी रहती है
उसके अस्तित्व का दूसरा नाम ही नेकी है

जब भी अपने चित्त को शांत पाया
वह हमेशा बना रहा मेरे साथ
किसी  राग द्वेष और ईर्ष्या के आते ही
वह चुपचाप चला गया वहां से

उसके रंग, आकार और  भाव भंगिमाएँ
दिखती रहीं प्रकृति में
नदी के अविरल प्रवाह में मुस्कुराता
नजर आया हमेशा

वह  निर्मल प्रेम सा
स्वार्थ से परे जीवन को नए सिरे से परिभाषित
करता रहा साथ साथ

वह निराकार
लेकिन मेरे भीतर एक ख़ास जगह उसकी
मैं जानती हूँ वह कब और किस तरीके से
आवाज देगा मुझको

अब मौजूद है मेरे साथ
ठीक वैसे
जैसे कोई पिता बच्चे को
भीड़ भरा चौराहा पार करा देता है।

एकता

Wednesday, March 23, 2016

रंग

कविता 

रंग

मिला जुला रंग था विशाल समुद्र की तरह
जो बन गया था कई नदियो के समागम से
रंगो की कई भिन्न छटाएँ सुंदरता  लिए
दूर तक नज़र आती थी

रंगो का इंद्रधनुष कुछ ऐसा
कि  सौदागरों को लुभाता चला गया सदियो तक

रंगो के मिश्रण से उपजे और कई रंग
जिन्होंने धुंधला कर दिया
इसकी मोहक पृष्ठभूमि को

कुछ रंग मटमैले हो गए
स्वार्थ के लुटेरे लूट ले गए कुछ प्यारे रंग
आज खड़े है दूर दूर  नाराज़ से
छिटके हुए ये रंग व्यथित से

यकीनन सौहार्द का रंग
इन सबको फिर से रंग देगा एक-सा
और कैनवास पर एक बार फिर
उभर  जायेगी धुंधली हो चुकी
वही सुन्दर तस्वीर ।

एकता

Monday, March 21, 2016

रूपांतरण

कविता
रूपांतरण

आशंकाओं और संघर्ष के बीच उपस्थित भय
लक्ष्य की और बढ़ते क़दमों को गति देता है
और असंभव को संभव बनाने का हौसला भी


चुपचाप  एक कोने में बैठा कर एकाग्र कर देता है
चिंतन मनन और आत्म मंथन की अग्नि में तप कर साहस में तब्दील हो जाता है यकायक

जिम्मेदारियों और ज़रूरतों का बोझ
कारण नहीं होता भय का

जहां भय होता है
वहीं छुपी होती है मनुष्य होने की लालसा


भय के सकारात्मक रूपांतरण से
अच्छाइयों का पौधा अपनी जड़े जमीन पर जमाये
आँधियों का मुकाबला करता है देर तक ।


एकता

Monday, March 7, 2016

महानता का ताज

कविता 

महानता का ताज

महान नहीं हूँ
अपने हित साधने  के लिए महानता का मुकुट न पहनाएं

बेटी हूँ  , पत्नी हूँ , बहू हूँ  और माँ भी
मगर  सबसे पहले  इंसान हूँ
प्रेम के बीज अंकुरित है प्राकृतिक रूप से  भीतर
नमी ज्यादा है इसलिए बुझा पाती हूँ रिश्तों की आग
निकल पाती हैं नई कोंपलें सूखे बरगद में
दहलीज पार करते समय थरथरा गई  आत्मा तक
जब बढ़ाया था पहला कदम

महानता का मुकुट  जो पहना दिया समाज ने
उसका मान रखते हुए,
आज भी सुबह का सूरज और चिड़िया के बोल उसी तरह लुभाते है जैसे लुभाते थे जब महान नहीं
खुद एक छोटी सी चिड़िया थी

प्रेम से लबालब ज़रूर है मन, पर दोगली भाषा के शोषण से त्रस्त है
कभी माता की तरह पूजी जाती हूँ
कभी शोषण का शिकार बनती हूँ
 कभी तुल जाती हूँ हलकी भाषा में

 महान नहीं हूँ , इंसान हूँ
आपकी ही तरह
शरीर की जकड़न , मानसिक थकान
उत्साह , आशाएं और प्रतिभा सब कुछ समाया है
इंसान की तरह  बुनियादी वज़ूद की लड़ाई लड़ती हूँ
हर दिन दूसरो को सभालते हुए खुद का रास्ता खोजती हूँ।

एकता...

Sunday, February 28, 2016

बॉलकनी में एक शाम

बॉलकनी में एक शाम

कुर्सी पर बैठी, निहार रही थी
सूरज की चित्रकारी
नीले कैनवास पर पल पल बदलते  रंगो की कूंचिया  चला रहा था  लगातार

घर लौटते मजदूरो का साथ दे रहे थे
आशियानों में लौटते पंछियो के  समूह
यही था शायद जो दृश्य में सुनाई दे रहा था सांध्य राग की तरह

उत्तर की शीतल हवा पूरे दिन की तपन और थकान को
अपनी शीतलता से विश्राम का अनुरोध कर रही थी

नीले कैनवास का रंग पल पल बदलते हुए सिन्दूरी होकर
धीरे धीरे लुप्त  हो गया अँधेरे मे
महसूस हुआ की सूरज अब अपने खेल से थक चुका है
देखते ही देखते वह अपना काम चाँद को सौप  आराम करने चला गया चुपचाप

खूबसूरत गोधूलि बेला से गुजर रही है साँझ
देवस्थानों की घंटियों ,अज़ान और घरों में जलाई लोबान अगरबत्तियों  की खुशबू से महक गई है बॉलकनी 

लगातार  सीटियों की आवाजें आने लगीं
कभी इस दिशा से तो कभी उस दिशा से
घरों में जैसे कोई सायरन बज उठा हो
आमंत्रण की पुकार थी शायद यह किसी के प्यार से बने भोजन की खुशबू लिए जो पहुँच रही थी बॉलकनी तक

अब आसमान पूरी तरह से भर गया था टिमटिमाते तारो से
जैसे परोस दिये हों व्यंजन
किसी ने थाली में
चाँद बैठा था थाली संजोये  आसमान में
जैसे माँ भोजन कराती थी सामने बैठकर

दूर अँधेरे में एक झोपड़ी से धुँआ निकलता दिख रहा है
रोटियों के सिकने और मसालों की महक को महसूस करने लगी हूँ मैं
बहुत नजदीक आ गयी है चाँद की रसोई।

एकता

बॉलकनी में एक शाम

बॉलकनी में एक शाम


कुर्सी पर बैठी, निहार रही थी
सूरज की चित्रकारी
नीले कैनवास पर पल पल बदलते   रंगो की कूंचिया  चला रहा था  लगातार

घर लौटते मजदूरो का साथ दे रहे थे
आशियानों में लौटते पंछियो के  समूह
यही था शायद जो दृश्य में सुनाई दे रहा था सांध्य राग की तरह

उत्तर की शीतल हवा पूरे दिन की तपन और थकान को
अपनी शीतलता से विश्राम का अनुरोध कर रही थी

नीले कैनवास का रंग पल पल बदलते हुए सिन्दूरी होकर
धीरे धीरे लुप्त  हो गया अँधेरे मे
महसूस हुआ की सूरज अब अपने खेल से थक चुका है
देखते ही देखते वह अपना काम चाँद को सौप  आराम करने चला गया चुपचाप

खूबसूरत गोधूलि बेला से गुजर रही है साँझ
देवस्थानों की घंटियों ,अज़ान और घरों में जलाई लोबान अगरबत्तियों  की खुशबू से महक गई है बॉलकनी 

आने लगी है अब सीटियों की आवाज़े लगातार 
कभी इस दिशा से तो कभी उस दिशा से
घरो में जैसे सायरन बज उठे हो किसी घोषणा में
आमंत्रण की पुकार थी शायद   किसी के प्यार से बने भोजन की खुशबू लिए,
 जो पहुँच रही थी बॉलकनी तक

अब आसमान पूरी तरह से भर गया था टिमटिमाते तारो से
जैसे परोस दिये हों व्यंजन
किसी ने थाली में
चाँद बैठा था थाली संजोये  आसमान में
जैसे माँ भोजन कराती थी सामने बैठकर

दूर अँधेरे में एक झोपड़ी से धुँआ निकलता दिख रहा है
रोटियों के सिकने और मसालों की महक को महसूस करने लगी हूँ मैं
बहुत नजदीक आ गयी है चाँद की रसोई।

एकता

Wednesday, December 30, 2015

कविता स्क्रीन से बिखरती खुशबू

कविता
स्क्रीन से बिखरती खुशबू
(टीवी पर एक युवा किसान के इंटरव्यू को देखकर)


कहना मुश्किल है
कि कितनी बार अनुपस्थिती दर्ज कराई होगी उसने कक्षा में  
दरवाज़े से सट कर बैठा वह
स्कूल की आख़िरी घण्टी बजते ही सब से तेज दौड़ता हुआ  
पहुंचता होगा अपने खेत पर
  
पाठ्यपुस्तक के पाठों के अलावा
कई और अध्याय भी जुड़े हुए थे उसकी किताब में
कोई अदृश्य हाथ उसे घड रहा था
लगातार कुदरत के चाक पर 

माँ की थकान और पिता की कमरतोड़ मेहनत के  
कई बीज अंकुरित हो रहे थे उसके भीतर

आज उसके पैर मजबूती से जमे हैं  
पहाड़ खोद कर संवारी जमीन पर 
ख्यात चैनल के समझदार एंकर को  
आत्मविश्वास से आज
दे रहा है साक्षात्कार

उसके शब्दों में सुनाई दे रहा है कृषक जीवन का सार
विनम्रता और आदर से सराबोर सुरों से सजा संगीत
गूँज रहा है लहलहाती फसल के बीच
  
साहब यह फसल
छह महीने तक ज़िंदा रहती है फिर गुज़र जाती है 
उसकी गंवई भाषा में मिट्टी और पसीने की महक आ रही है
टीवी के स्क्रीन से निकली सुगंध से भर गया है मेरा ड्राइंग रूम.

एकता 

Tuesday, October 27, 2015

कविता / बचपन

कविता
बचपन
वो था यहीं कुछ पल पहले , अब मिल नहीं रहा .
यहीं आँगन में दादी की चोटी पर लगे रिबन से खेलते 
तो दादा की कहानी में डूबते .. वो मम्मी के आँचल से तैरते हुए
पापा की मुस्कुराती आँखों में भविष्य के सुनहरे सपनों से झांक रहा था, आज मिल नहीं रहा कहीं
मैंने खोजा उसे आम के पेड़ के पास , फिसल पट्टी के नीचे, रजाई में दुबके हुए
खिलौनों और किताबों से भरे कमरे में ,छत की मुंडेर पर .
बारिश में , सर्दी में , गर्मी में ,वो मस्तमौला, अल्हड कहीं मिल नहीं रहा ...
ढूँढा उस मनमौजी को समुद्र के तल तक, शितिज तक
पंछियों से पूछा , जल प्राणियों से पूछा..
अभी चहकने की आवाज़ आई थी कहीं से , शायद यहीं कहीं छुपा बैठा है वो ...
तैयारी में है अपनी अगली उड़ान की ..........
एकता

कविता / वो संवाद

कविता
वो संवाद

उफ़! ये बदबू !
लगता नहीं कि यह घर है
दवाखाना लगता है
जी यह घर ही है
धीमी सी आवाज़ में जवाब मिला
कहाँ से ? चारो तरफ तो घेर रखा है दवाओं ने
बाहर निकालो ज़रा सांस लो खुली हवा में
मिला करो अपनों से ..!
यही अपने हैं मेरे..
जब शरीर दर्द करता है
देखिये वो छोटी सी शर्मीली सी लाल लिबास में खड़ी है शीशे की मेरी दोस्त
मेरा सारा दर्द हर लेती है
तो जब नींद नहीं आती तो वो अच्छे कद का वह मेरा शुभ चिन्तक
सब ठीक कर देता है बिना कुछ कहे
मेरे साथ ही सोता है
यह मेरा छोटा सा दर्द हारी बाम
अरे! कैसी बाते कर रहे हो !
परिवार कहाँ है आपका?
इतनी दवाई लेना ठीक नहीं आपके लिए
जी परिवार को फुर्सत नहीं अब अपनों से
सबके अपने अपने दुखड़े हैं
दोस्त तो होगा कोई आपका?
दोस्त तो कब के पीछे छूट गए चले गए अपने नए आशियानों में
आप सही नहीं कर रहे अपने साथ,
बाहर निकलिए इन सब से
खुली हवा में चहल कदमी कीजिये थोड़ा बहुत
जी आप सही हैं शायद
ऐसा ही करूँगा साहब अब
आप आ जाया कीजिये न मुझ से मिलने
अच्छा लगता है !!
एकता

कविता उसका बड़ा दिन

कविता
उसका बड़ा दिन

माफ़ कीजिये 
कि उसे याद नहीं रहा आज भी
कि आज बड़ा दिन है
बेखबर है वह कि
कौन थे हमारे स्वतंत्रता सेनानी
उसका दिल
उत्सव के जोश से नहीं भर रहा ज्यादा
हवाओं में गूँज रही किसी भी धुन और राग से
कोई और लय है उसके भीतर
जिसकी ताल पर थिरक रहा उसका मन और तन
तड़के ही ही निकल गया था यह योद्धा
बिना देखे आज की तारीख, वार और समय
रोज़ की तरह थी इसकी सुबह और उसका लक्ष्य
उसने तो सोचा ही नहीं कि आज गूंजेंगे नारे
और सारा अन्धेरा दूर हो जाएगा
शहद में डूबे शब्दों की रोशनी से
नहीं जानता कि आज बड़ा दिन है
पढ़ी लिखी बहन लौट आई है मायके वापिस ।
माँ का ऑपरेशन कराना बाकी है अभी
रोटी के इंतजाम में आज भी जुटना ही पडेगा रोज की तरह
जानता नहीं
कितनी आजाद हवा में सास ले रहा है वह
अभी-अभी दो लड्डुओं का पैकेट थमा गया है कोई
जब उतरेगी मिठास भीतर
सूरज खोद लाएगा पहाड़ के बीचो बीच से ...
एकता ...