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Wednesday, October 16, 2019

एक ख़त रात ग्यारह बजकर दस मिनट पर

स्मृति यात्रा:

एक ख़त रात ग्यारह बजकर दस मिनट पर
एकता कानूनगो बक्षी





जीवन के कुछ पल हमारे लिए अनमोल हो जाते है ऐसा लगता है हमारे जीवन की परिभाषा यहीं से शुरू होती हो। अभी वह जैसे कल ही का दिन लगता है जब अख़बार में पढ़कर मम्मी ने बताया था कि आकाशवाणी इंदौर मे केसुअल एनाउंसर का ऑडिशन होने वाला है. , लगा  कि बस जैसे बचपन का सपना ही सामने आ खडा हुआ था, तो बिना दूसरी बार सोचे आकाशवाणी केंद्र पर नियत दिन ऑडिशन देने चली गयी।



यह स्वीकार करने में मुझे कुछ  संकोच नहीं है कि ऑडिशन देने से पहले मैंने कभी ठीक से रेडियो अनाउंसमेंट नहीं सुने थे। मैं तो रेडियो सुनते समय बस डांस वाले हाई नोट्स बीट्स वाले गानों का इंतज़ार करती थी और उन पर रोज़ एक घंटा डांस करती थी या फिर धीर गंभीर और रोमांटिक गानों पर कुछ एक्टिंग जैसा करती रहती थी। मेहनत और लगन से अच्छे नम्बरो से परीक्षाएं पास करने के बाद भी असली खुशी मुझे डांस,एक्टिंग, प्रोग्राम संचालन,लेखन,पठन,रोल प्ले में ही आती थी, इसलिए यह तो पता था कि मुझे भविष्य में शायद इसी दिशा में जाना है। मन तो यही चाहता था।



आकाशवाणी के ऑडिशन में कई बातें पूछी गईं जिसमे एक मुझे अभी तक याद है। रिकॉर्डिंग रूम में एक चेयर लगी हुई थी। पूरा रूम खाली था। मुझे सिर्फ सवाल सुनाई दे रहे थे और कोई दिखाई नही दे रहा था। ये रेडियो से जुड़ी सब से पहली चुनौती थी जब बिना देखे आपको संवाद करना होता है। जिस से पहली बार मेरा सामना हुआ।। मुझ से पूछा गया कि आप रेडियो एनाउंसर क्यों बनना चाहते हैं। उसके जवाब में मैंने काफी बातें कही, जैसे  की आकाशवाणी जैसी प्रतिष्ठित संस्था से जुड़ना. जिसका इतिहास, ध्येय, सूत्र, सब कुछ अनुकरणीय है। इसके बाद एक वाक्य पर मैं अटक सी गयी मैंने कहा क्योंकि मुझे तो बस यही करना है और उसके बाद मैंने दोबारा भी अधिक जोर देकर से फिर से वही बात कही। ‘सर, मुझे बस यही काम करना है।‘ मैं खुद आज भी इस बात पर अचरज करने लगती हूँ  कि कैसे वह वाक्य और वह जिद मेरे अन्तःकरण से सहज ही निकल गयी थी।



आकाशवाणी इंदौर से जब रेडियो का सफर शुरू हुआ तो लगने लगा जैसे ट्रेनिंग के दौरान ही मेरे व्यवहार और व्यक्तित्व में बदलाव सा आने लगा हो, चीज़ों को देखने का नज़रिया ही बदल गया। तत्कालीन कार्यकारी निदेशक श्री शशिकांत व्यास सर और सुश्री मधुकौर मैडम ने इस तरह से ट्रेनिंग दी जैसे कि वो मेरे पूरे जीवन को ही संवारनें का सबक दे रहे हों। व्यास सर जिस तरह समझाते थे, लगता था जैसे अपने ही घर के कोई बड़े बैठकर शांति से आपको समझा रहे हों, वे कहते थे आचरण में हमेशा विनम्रता को महत्व दो, बोलने का सही तरीका रखो। श्रोताओ को ईश्वर का दर्जा देने की बात रही हो या फिर सामने वाले के गुस्से पर शीतल वाणी की फुहार वाला आचरण। ऐसे अनगिनत पाठ उन्होंने मुस्कुराते हुए ही सिखा दिए और ये सुनिश्चित कर दिया कि यदि लोगों का मन जीतना है तो भविष्य में मेरा हर कदम सुविचारित और विवेकपूर्ण रहे।



वहीं मधु मैडम ने हौसला,हिम्मत, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास के पाठ पढ़ा दिए। मुझे अभी भी याद है जब ट्रेनिंग के बाद लाइव प्रोग्राम देने का समय आया तब हम सब घबरा रहे थे पर मधु मैडम ने हमे हिम्मत दी हमारे अंदर का विश्वास जगाया। आज प्रोग्राम देने में या फिर जीवन मे कुछ छोटे-बड़े निर्णय लेने का जो भी आत्मविश्वास बन पाया है वह मैं कह सकती हूँ उसमे मधु मैडम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।



जब हम आकाशवाणी से जुड़ते हैं तब हम सिर्फ एक संस्था से नहीं जुड़ते, हम एक परिवार से जुड़ जाते हैं। यह हमें संस्कार देती है। और बस ऐसा ही कुछ हुआ जब मैं इस परिवार के बाकी सदस्यों से मिली, जिन्हें मैं कभी भी अपने सीनियर या बॉस नहीं मान सकी, उनको मैं अपने परिवार का सदस्य ही मानती रही। क्योकि उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया, और वो भी बहुत आत्मीयता के साथ। टेक्निकल बातें हो, या भाषा और सही उच्चारण की समझ, संगीत, फिल्मो की बाते या फिर अच्छे प्रोग्राम देने के गुर,एक बहुत सुखद परिवेश मुझे आकाशवाणी में काम करते हुए इन सब ने दिया। इन सबके प्रोत्साहन की वजह से बेझिझक  जितनी भी संभव रही उड़ान भर सकी।  शालिनी मैडम,अनुराधा मैडम, मोना मैडम, रीना मैडम, संतोष अग्निहोत्री सर, सुधीर तेलंग सर , आसिफ सर, संजीव सर, विजय सर , विद्याधर मुले सर,और भी बहुत से आत्मीय साथी और वरिष्ठ लोग याद आते रहते हैं. 

और इनके अलावा बहुत अच्छे और प्रतिभाशाली दोस्त ऋचा,प्रतिमा,समता,उदिता को कैसे भुलाया जा सकता है।



जब प्रोग्राम होते थे तब घर मे उत्सव का माहौल रहता था. सुबह 4 बजे उठकर मम्मी मेरे लिए नाश्ता तैयार करती और तड़के पापा मुझे स्टूडियो छोड़ कर आते थे। प्रोग्राम होने पर बात खत्म नही हो जाती थी। पापा मेरे लाइव प्रोग्राम घर पर रिकॉर्ड करते। आने वाले दो दिनों तक उसकी समीक्षा की जाती। मेरी गलतियों को सुधारा जाता। यह भी सच है कि आज तक एक भी ऐसा प्रोग्राम में नही दे पाई जिसमे मुझे संतुष्टि हो पाई हो। कुछ न कुछ गलती हर बार हो ही जाया करती थी।



इस बीच शादी तय हो गयी। मैं ने अपनी कोर्टशिप के दौरान संकल्प से लगभग रेडियो की ही बाते की, वह भी मेरे साथ पूरे समय रेडियो के मेरे हमसफर बने रहे।



शादी के बाद जब इंदौर मुझ से छुटा तो मेरे लिए वह घड़ी बहुत कठिन थी। पर मुझे नही पता था की मुंबई में कभी भी किसी के पैर नही थमते है, हर यात्री का वह स्वागत करती है। हालांकि इंदौर से ट्रांसफर सीधे आकाशवाणी के चर्च गेट केंद्र पर हुआ जो कि मेरे ससुराल मलाड से काफी दूर था। इंदौर में स्कूटी से कुछ मिनटों में दूरी तय करने वाली मैं अचंभित थी जब चर्च गेट लोकल ट्रेन का सफर पहली बार किया. वहां जो सर मिले उन्होंने मुझे राय दी कि क्योकि आपका घर काफी दूर है तो आप रात का प्रोग्राम कर सकती हैं और फिर यहाँ रात्रि विश्राम व ठहरने की व्यस्था भी है. सुबह का प्रोग्राम कर के आप घर लौट सकती हैं। मुझे पता था कि यह सब मेरे बस की बात नहीं है। तो बस चर्च गेट की भेल और पानी पूरी का मज़ा ले कर घर लौट आई।



फिर पता चला कि विविध भारती तो बोरीवली में ही है जो कि घर के बहुत करीब है और फिर एक और सरप्राइज मिला कि वहा ऑडिशन होने वाला है. वह भी मेरे जन्मदिन पर. फिर क्या था रेडियो की मेरी गाड़ी फिर चल निकली।



आज तक जिनको इंदौर के स्टूडियो से रिले किया, जिनकी आवाज़ और बोलने का अंदाज़ मेरे लिए आदर्श था, आज उन्ही सब के सामने पहुंचकर प्रफुल्लित थी। आँख बंद करके केवल आवाज सुनकर बता सकती थी कि ये रेणु बंसल मैडम है, अमरकान्त सर , कमल शर्मा सर, ममता मैडम, यूनुस खान सर हैं। पर आज इन सब से रूबरू हो रही थी। कुछ दिन मुझे दिए गए यहां के काम को सीखने समझने के लिए। रोज सुबह तैयार होकर स्टूडियो पहुच जाती और स्टूडियो में लाइव प्रोग्राम के वक्त आप सब को ओब्सर्व करती। यहां भी वही इंदौर वाली समानता लगी कोई बॉस या सीनियर नही लगे। सब अपने ही लगे वही आत्मीयता और एक दूसरे के सम्मान वाला व्यवहार।



असल में सबको पहले ही सुनती आयी थी पर सीखना था तो उनका एटीत्युड attitude जिस के कारण वो इतने सफल और प्रभावशाली कार्यक्रम दे पा रहे थे ।  सब से पहले मुलाकात रेणु बंसल मैडम और अमरकान्त सर से हुई। बहुत सारी बाते हुई।  रेणु मैडम ने चाय के लिए पूछा। वो अपनी अलमारी में मिल्क पाउडर शुगर टी सब रखते थे। मैंने हिचकते हुए नहीं कहा तो उन्होंने हक से कहा ‘क्यो नही पीयोगी चाय? चलो आओ हमारे साथ बैठो, साथ मे चाय पीते है’ ।बस उस दिन मुम्बई का  विविध भारती रेडियो स्टेशन भी अपना सा हो गया।



फिर मेरी मुलाकात रेडियो सखी ममता मैडम से हुई। मैडम भी उस दिन एक लबे अंतराल के बाद प्रोग्राम देने वाली थी। जनाब जादू के आगमन के बाद शायद यह उनका पहला प्रोग्राम था। उनसे मिलने से पहले मैं काफी नर्वस थी, पर जब उनसे मिली उनके सौम्य , सरल और मृदुभाषा ने मुझे मुग्ध कर दिया और एक बार फिर मेरा विश्वास इस बात पर बढ़ गया कि जो पेड़ जितना फलों से लदा होता है उनता ही विनम्र होता है। बहुत कुछ सीखा उनसे छोटी छोटी बातें भी उन्होंने मुझे अपना समझ कर बिना पूछे बताई। और फिर अगले प्रोग्राम में कमल शर्मा सर आने वाले थे, उन्हें भी उन्होंने ही मेरा परिचय भी कराया।

कमल शर्मा सर मेरे सामने खड़े थे। प्रतिभा सम्पन्न ऐसे व्यक्तित्व से परिचय हुआ जो बहुत विनम्र थे। उनके आने से पूरे स्टूडियो में अलग ही ऊर्जा का संचार हो जाया करता था।



उसके बाद मैंने सीखा यूनुस सर से उस समय उन्होंने  ‘इना मीना डीका’ गाने का फिलर बहुत तेज आवाज़ में लगा रखा था। ऊर्जा से भरपूर माहौल था। फिलर को फेड आउट करते हुए उतनी ही ऊर्जा से भरपूर और बुलंद और अपनी ख़ास आवाज़ में उन्होंने अपने प्रोग्राम का आगाज़ किया। उनसे सीखा कि कैसे अपने काम में अपना 100 प्रतिशत या शायद उससे भी अधिक दिया जा सकता है।



कुछ समय के लिए मुझे एनाउंसर की जगह वहां श्रोता बना रहना बहुत रास आने लगा था लेकिन तभी मेरे सम्मोहन को तोड़ मेरी डयूटी लगा दी गयी। जयमाला, जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम को आवाज़ देने का मौका मिला। उस दौरान रात के प्रोग्राम में मुझे नाम याद नही आ रहा लेकिन हमारी जो डयूटी ऑफिसर रहती थी वह मुझे फ़ोन करके खुद बुलाती थी क्योंकि मैं अपने काम मे इतनी तल्लीन हो जाती कि मुझे खाने का ध्यान ही नहीं रहता। वे  कहतीं ‘बस एकता अब रिकॉर्डेड है, एक फिलर बाद में लगा कर आ जाओ, पहले खाना खाओ बाकी काम बाद में।‘ उस वक्त कितना स्नेहपूर्ण महसूस करती थी, शब्दों में बयान नहीं कर सकती लेकिन ऐसे ममत्व भरे व्यवहार के कारण काम के प्रति मेरी आस्था और बढ़ जाती थी।



फिर ट्रांसफर हुआ नवाबो के शहर और हाई टेक सिटी हैदराबाद में। स्टूडियो घर से करीब 20 किलोमीटर दूर था. अभी तक की सब से अधिक दूरी और ज्यादा अखरने लगी जब दो-दो  बार स्टूडियो जाने के बाद, खाली हाथ लौट आना पड़ा। पर ये मेरे लिए नई बात नहीं थी। कुछ दिनों बाद पता चला कि वहाँ ऑडिशन होने वाले है। इस बार तो मेरे पास इंदौर और मुम्बई दोनों का अनुभव था। बहुत सहजता से मेरा सिलेक्शन हो गया। पर अब बारी थी फिर से अपने आप को सिद्ध करने की जो थोड़ा टेड़ा काम था। पहले प्रोग्राम पर मेरे मुम्बई के अनुभव का प्रभाव रहा। मेरे प्रोग्राम्स का स्तर वहां के प्रोग्राम से मेल नही खाया हालांकि श्रोताओ को बहुत पसंद आया पर मेरी इंचार्ज वसुमती मैडम ने मुझे हिदायत दी कि ‘आइलैंड मत बनो।‘

ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ। मैंने वहां के शोज़ को खूब सुना और फिर मुझे समझ आया की मैं कहाँ गलती कर रही हूँ। हैदराबाद के स्टेशन की ज़रूरत थी कि मैं अपने आप को उद्घोषक से थोड़ा बदल कर आज के दौर के ‘रेडियो जॉकी’ के रूप में बदल दूँ।

अपने उसूलों को संभालते हुए, मैंने फिर नया गेटअप लिया, अपने को संशोधित किया। पर पुराने सिखाये सबक से किनारा नही किया। आकाशवाणी के मूल्यों के साथ परिपक्व प्रोग्राम दिए बस थोड़ा अलग अंदाज में। श्रोताओ के साथ लाइव प्रोग्राम करते हुए बहुत स्नेह और बहुत कुछ सीखने को मिला। उस वक्त मेरी आँखें भर आईं जब हैदराबाद के स्टूडियो को छोड़ते समय वसुमती मैडम ने मुझे ‘एसेट’ कहा।



और अब इस समय पुणे में हूँ। शुरुआत में यहां भी ट्रांसफर होने के बाद काम नही मिला।

कई बार गयी स्टूडियो, खाली हाथ आयी। फिर एक दिन एक पत्र लिखा डायरेक्टर साहब के नाम। और कुछ दिन बाद वहां से फ़ोन आया। फोन पर थे खड़किकर सर. चिरपरिचित विनम्र संतुलित आवाज़। समझ आ गया कि यह तो यहाँ भी एक बार फिर वही आकाशवाणी है। सर ने मुझे बताया ‘कलश’ नाम का हिंदी का प्रोग्राम आ रहा है। आप स्टूडियो आइये। स्क्रिप्ट आदि सब लेकर। मैं बहुत खुश हो गयी। मैंने उन्हें बहुत शुक्रिया कहा तो उन्होंने और विनम्र होकर कहा कि ‘हम लेट हो गए आपको तो पहले ही बुला लेना था।‘ पहला प्रोग्राम हुआ, आधा घंटे के प्रोग्राम की जगह सर ने मुझे 1 घंटे का प्रोग्राम दिया। बाकी लोगो से मेरा परिचय कराया। सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले पर केंद्रित रोल प्ले में मुझे और संकल्प दोनों की आवाज़ को स्थान देकर हमारे लिए वह शो उन्होंने यादगार बना दिया। उसके बाद प्रदीप सर के साथ काम करने को मिला। जिन्होने मुझ पर बहुत विश्वास रखा। जीवन मे पहली बार साक्षात्कार और चर्चाएं की। राष्ट्रीय प्रसारण में जो कि प्रसारित हुए।

पुणे मे रेडियो के अलग आयाम को छूने का मौका मिला। और अभी भी उम्मीद है कि काम मिलता रहेगा।



आप पूछ सकते हैं कि बिना वजह यह लेख लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी?  इसलिए बिलकुल नहीं कि मैं अपनी रेडियो यात्रा आपको बताना चाह रही थी। दरअसल इस का कारण कुछ यूँ रहा कि अभी दशहरे पर मेरा इंदौर जाना हुआ जहां मम्मी पापा सुबह से रात तक पूरे समय रेडियो पर ‘विविध भारती’ चला कर रखते हैं। और दूसरा कारण हैं अनिता दुबे जी, उनकी प्रस्तर कला पर मैं मुग्ध हो गयी हूँ। उसे बनाने का उनका ख़ास अंदाज़, जिसमें बैकग्राउंड में ‘विविधभारती’ बजता रहता है। मुझे बार बार स्मृतियों में ले जाता है। कल शाम मैंने भी रेडियो एप्प पर लगाया और सुनती रही, रेडियो बंद करने के बाद भी मेरे मन में स्मृतियो का  रेडियो बजता रहा।



रेडियो, आकाशवाणी,से जुड़ने का घटनाक्रम और लोग, उनसे जुड़ी मेरी यादें, किसी फ़िल्म की तरह लगातार रिवाइंड और फारवर्ड होती रही। इसलिए आज सोचा  की क्यों ना आप सबको लगे हाथ शुक्रिया दे दूँ।

आप सब ने मेरे जीवन को आकार दिया है और दूसरा एक शिकायत भी थी कि आप सब के स्नेह के कारण अक्सर जब भी रेडियो सुनती हूँ मेरी नींद उड़ जाती है। यह सब लिखने के बाद शायद अब नींद आ जाये।

जय हिन्द।













एकता

Wednesday, February 8, 2017

फ्लाइट मोड में ज़िन्दगी

लेख 
फ्लाइट मोड में ज़िन्दगी 
एकता कानूनगो बक्षी 

मेरी एक मित्र को मोबाइल के वाट्सएप पर एक बुरा समाचार मिला तो उसकी हालत बिगड़ गयी।स्थिति यह हो गयी कि उसे डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा।बाद में पता चला कि वह एक गलत फारवर्डेड मेसेज था।

ऐसा इन दिनों अक्सर होता रहता है क्योंकि जब से नई टेक्नोलॉजी आई है,अच्छी बुरी सूचनाएं तुरंत बिना सोचे समझे भावावेश में सबसे पहले भेजने की लालसा में अपनों को प्रेषित कर दी जाती हैं।

टेक्नोलॉजी के बल पर दुनिया भी  मिनी बल्कि  माइक्रो होती जा रही है। आज आप मीलों  दूर बैठे अपने परिजन को  ख़ुश होने का अवसर दे सकते हैं तो दूर बैठे को सिरदर्द भी गिफ्ट कर सकते हैं ।दूसरे के सुख और दुःख की चाबी कुछ हद तक अब हमारे पास भी   मौजूद है । 

कोई छोटी सी बात जैसे ही सामने आती है,  हमारा फुल टाइम हरकारा, स्मार्ट फ़ोन हमारी उंगलियो के इंस्ट्रक्शन पर हरकत के लिए हाजिर हो जाता है। एक बटन दबाया और दूसरे छोर पर प्रतिक्रिया शुरू।  ख़ुशी हो या दुःख देने  वाली कोई अप्रिय सूचना,तुरंत असर करने लगती है।

परिणाम के बारे में पड़ताल का समय हमारे पास होता ही नहीं  ! भाई , इस लाइट इन फ़ास्ट स्पीड के ज़माने में सोच विचार आउटडेटेड सा ही हो गया है। मैसेज मिलते ही उधर दूसरे पक्ष ने सिरदर्द की गोली ली और आगे का काम शुरू कर दिया मिनिटों में और  देखते ही देखते  सालों से चला आ रहा रिश्ता हो जाता है  क्लीन बोल्ड । 

मुझे लगता है पहले ऐसा नहीं होता होगा । शोक समाचार भी भेजते समय चिट्ठी का एक सिरा काट दिया जाता था ताकि कुछ सेकण्ड्स मिल सके अपने आप को तैयार करने के लिए कि बुरी खबर है ।

पहले भी सब अपनी अच्छी बुरी खबर साझा करते थे पर तब किसी न किसी का विश्वास से भरा हाथ ज़रूर हमारे कंधे पर रहता था  ।अब इस तरह के  फ़ास्ट फॉरवर्ड मैसेज बिना ये जाने की प्राप्तकर्ता की मनोदशा, स्थिति और स्थान क्या रहा होगा आगे बड़ा दिए जाते है यह तो कुछ ठीक नहीं हुआ। कुछ तो नियम होने ही चाहिए । और होते भी हैं । जैसे आज हम अंतरराष्ट्रीय मैसेज करते हैं तो वहां का समय और स्थितियां हमारे  दिमाग में होना चाहिए ।

कभी कभी इतनी भागम भाग का समय होता है कि हम  थोड़े से ठहराव की अपेक्षा लिए सोचते हैं कि  थोड़ी देर के लिए  सब से दूर हो जाएँ। कोई हम तक पहुच नहीं पाये ।कुछ देर थोड़ा रुक कर सोचें, कुछ देर अकेले केवल अपने साथ रहें। कुछ देर के लिए अल्पकालीन शून्य का सुख हम भोग लें। मतलब जीवन का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से हमारे खुद के हाथ में हो।

भले ही मोबाइल फोन में फ्लाइट मोड़ का एक विकल्प किन्ही अन्य कारणों से रहां होगा लेकिन कभी कभार अपने जीवन के मोबाइल पर भी ये चालू करके देखिये जरूर!  अपनी ज़िन्दगी की पिक्चर थोड़ी और क्लियर दिखेगी ।फ्लाइट में नहीं भी होंगे पर एक सुकून भरी  उड़ान ज़रूर भर सकेंगे। 

एकता

Wednesday, December 21, 2016

संस्मरण /उम्र के बंधनों से मुक्त रिश्तों की महक

संस्मरण
उम्र के बंधनों से मुक्त रिश्तों की महक


छोटे बड़े में उम्र का अंतर समझना हमेशा से मेरे लिए मुश्किल ही रहा है। रहता भी क्यूँ नही, बचपन से ही बड़े और छोटे उम्र के अंतर करने की समझ ठीक से  विकसित ही न जो हो सकी।

अब देखिए !  पंद्रह वर्ष से भी ज्यादा बड़ी मेरी दीदी मुझे मेरी दोस्त लगती थी, और छह साल बड़े भैया को मै अपने छोटे भाई की तरह प्यार करती और उनका हमेशा ख़याल रखती थी।

दादी अक्सर कहती कि मैं तो उनकी गुरु हूँ, मेरीे छोटी सी सलाह भी उनके बड़े काम आती थी। और दादी की मम्मी जिनका तकियाकलाम भी गजब का था "आप  समझो साहब "को मैं पहली कक्षा में पढ़कर आने के बाद घर पर  'अ' अनार का सिखाया करती थी। बाद में पता चला कि वो तो खुद प्राइमरी टीचर रहीं थी। उन्होंने गजब की एक्टिंग की और  'आप समझो साहब' मुझे इस तरह की समाज सेवा करने के संतोष को महसूस करने का अवसर भी दिया।

दादाजी  के लिए तो मै उनकी प्यारी गुड़िया थी और लाड़ से मुझे वे 'गनिया' बुलाते थे। उन्हें जो भी सिखाना होता था तो सोने से पहले रात की कहानियों के माध्यम से सिखा देते थे। उसके साथ ही  मेरी हर छोटी से छोटी  बात भी मानते ।मैंने भी उनकी सब बातों को कंठस्थ कर रखा था।उन्होंने मुझे सिखाया था खूब हवा खाना , खूब पानी पीना और खूब चलना । उनकी बातों को मानने की जिद के कारण मम्मी को कई किलोमीटर दूर मेरे स्कूल पैदल चलकर मुझे छोड़ने और लेने जाना पढता था । मैं स्कूल के तांगे में कभी नहीं बैठती।

घर के अन्य बच्चों की भी मै बहुत बड़ी दीदी बना करती थी। दो या तीन साल  बड़े होने के बाद भी वो मेरी बात बहुत मानते थे । मैं जो कहती वह बिना विवाद करते।मेरे साथ बैठ कर खाना खाने की जिद्द से लेकर , मेरे द्वारा बनाये सब बेतुके  खेलों में हमेशा बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते।
चाची को चाची जान तो कभी 'चाची 420'  कह कर बुलाती पर अपने नाम की तरह वो सिर्फ स्नेह ही बरसाने लगतीं। प्यार को प्यार की तरह ही स्वीकार किया जाता था।

सबसे छोटी थी फिर भी इतना सम्मान मिलता रहा था बचपन से ।शायद वो सब मुझ से प्यार करते थे या फिर कोई रौब था शायद मेरा ।पता नहीं।😊

पापा क्रिटिक थे तो मै भी किसी विपक्षी दल के नेता से कम न थी। वाद विवाद के बाद ही मुझे उनकी कोई बात समझ आती थी ,किसी तरह के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती थी , पर उसके चलते मेरी सारी  उलझनें सुलझती गईं।

मम्मी तो कभी भी मुझ से बड़ी थी ही नहीं। मुझ से ज्यादा घर में उनकी रौनक रहती। दिनभर भर मुस्कुराते गाते सबकी ज़रूरते पूरी करने में लगी रहती और उसके बावजूद  पता नहीं कैसे मेरी धाराप्रवाह बातों को सुन ने के लिए भी तैयार  हो जाती। अब तक की मेरी सब से अच्छी और धैर्यशाली श्रोता शायद वही है ।

अफ़सोस!  समस्या वहीं के वहीं रह गयी ।मुझे समझ ही नहीं आया की कौन मुझ से बड़ा है और कौन  छोटा । दादी दादा अगर बड़े है लेकिन  मम्मी इतने प्यार से उन्हें खाना खिलाती है उनकी देखभाल करती है,तब लगता है जैसे वो उनकी भी मम्मी हो । मम्मी पापा एक दूसरे से बहुत सम्मान और प्यार से बातें करते है उन दोनो में से कौन बड़ा है पता ही नहीं चलता। और सबसे ज्यादा प्यार और सम्मान तो मुझे मिलता है मतलब.... उफ़!! बहुत असमंजस है....!

आज तक मुझे इस परिवार का पदक्रम समझ ही नहीं आया कौन बड़ा है , कौन छोटा है।  घर के नियम भी कोई ऐसा भेद नहीं करते। पर हाँ  एक ऐसा वातावरण ज़रूर मिला हैै ,जो ईमानदारी, नेकी, प्यार ,सम्मान और एक दूजे का ध्यान रखने की महक से ओतप्रोत है।

एकता

Wednesday, January 15, 2014

खुशी भरा वह दिन

संस्मरण 
खुशी भरा वह दिन 

वह मकर संक्रांति का दिन था.  इस दिन तिल, गुड के सेवन और पतंग की मस्ती के साथ दान का भी अपना अलग महत्त्व होता है . इस बार संक्रांति का अनुभव रोमांचक रहा . नाश्ता कर के मैं और संकल्प अपने स्कूटर पर एक बड़ा सा झोला लिए सुबह-सुबह ही घर से निकल गए . हैदराबाद की अलग अलग रोड और गलियों में हमारी नज़रें ऐसे जरूरतमंद लोगों को ढूंढ रही थीं  जिन्हें हम अपने साथ लाये कपडे आदि दे सकें . 

सही-सही जरूरतमंद व्यक्तियों को तलाशना भी बहुत कठिन रहा . रास्ते में सब से पहले एक मंदिर हमें दिखा, पर वहाँ  इतने ज्यादा जरूरतमंद लोग थे कि हमारे पास जो सामान था वो पर्याप्त नही होता। और किसे दें और किसे छोडें और फिर कहीं वे लोग हमें कुछ भला बुरा बोलने नहीं लग जाएँ ,इस डर से हमने मंदिर के आस पास का इलाका ही छोड़ दिया . आगे बढे तो एक बुजुर्ग व्यक्ति फटे हुए और गन्दे से कपडे और जूते  पहने जा रहा था , पर मन में विचार आया की यह गरीब है या भिखारी, अगर भिखारी है तब तो ठीक है पर अगर कामकाजी गरीब है तो इन्हें देना ठीक नहीं रहेगा क्योकि गरीब का आत्मसमान हम सब से कई गुना ज्यादा होता है और कहीं  अच्छा करते हुए हम उसे दुखी न कर दें इस विचार से कुछ देर तक उन्हें देखने के बाद भी हम हिम्मत नहीं जूटा पाए और आगे बढ़ गए. कुछ मिनट्स गाडी चलाते हुए हमे सिग्नल के पास दो बुजुर्ग व्यक्ति मिले. हिम्मत तब तक नहीं हुई जब तक की उन्होंने स्वयं अपना हाथ आगे नहीं बढाया, जैसे ही उन्होने हमारी ओर हाथ आगे बढ़ाया, हमने ख़ुशी से कपडे और रूपये निकाल कर उन्हें दिए, उनके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई  और हाथ आशीर्वाद के रूप में हमारे सामने कर दिए .उस समय दोपहर के 12 बज रहे थे आधे घंटे से हैदराबाद की गर्मी में हम घूम रहे थे,उन बुजुर्गों की पुलकित आँखों को देख ऐसा लगा किसी ने हमें शीतल पेय पिला दिया हो. अंदर तक अद्भुत तरावट महसूस हुई .


 आगे बढ़ने पर हमें एक कचरा बीनने वाली बूढी और कमजोर सी एक महिला सोती हुई दिखी, उसे भी उठाकर हमने कपडे दिए, हमे ऐसा करते देख पास में खड़े युवक ने भी उसकी मदद में  कुछ रूपये  दे दिए . थोडा और आगे बडे तो एक औरत और उसकी सात-आठ साल की बच्ची हमे आकान्क्षा भरी नजरों से देखने लगी तो मैंने उसे अपने कुछ पुराने टॉप और पेंट दे दी तो देखा कि उस बच्ची और उसकी माँ की आँखों में अथाह ख़ुशी सी भर आई थी.


 फिर कुछ गलियों को पार करते हुए हमे एक बहुत कमज़ोर लड़का दिखा, बहुत हताश सा ज़मीन पर बैठा था उसके कपड़ों से लेकर बाल तक धूल से सने हुए थे. हमने उसे शर्ट दिया लेकिन उसने हमारी तरफ नहीं देखा .देर तक वह हमारे दिए शर्ट को निहारता रहा।. थोडा आगे बढ़कर जब हमने लड़के को देखा,  उसने नया शर्ट पहन लिया था और उसका चेहरा अब बहुत तरोताज़ा लग रहा था. दोपहर हो गई थी और गर्मी भी काफी बड गई थी, भूख भी लगने लगी थी अत: हमने घर की तरफ अपना रुख किया. दिन भर हमारे मन में बहुत खुशी और संतोष का भाव बना रहा, चेहरे पर लगातार मुस्कराहट बनी रही, एक अलग सी स्फूर्ति हमारे सारे कामकाज में महसूस होती रही. ऐसी खुशियाँ शायद ही कभी किसी फिल्म देखने या शॉपिंग मॉल में खरीददारी करने पर मिल पाई होगी।

एकता कानूनगो बक्षी 



Tuesday, January 7, 2014

छुपी हुई टीचर

छुपी हुई टीचर

माँ हमेशा आपके साथ होती है. आपके सुख में, आपकी परेशानियों में और यकीन मानिए तब भी जब आप अपनी माँ से मीलों दूर होते है. जब भी आप असमंजस में होते है,जब भी आपका विश्वास डगमगाता है वो होती है आपके आस-पास. आपके अंदर मौजूद उन संभावनाओ से आपको अवगत कराती है जो आपको पता तक नही होती . वो बताती है की बस सही दिशा में सकारात्मक सोच के साथ अपने पंख फैलाने भर की देर है, फिर तो पूरा आसमान तुम्हारा है. उन पंखों को मज़बूत बनाने और उनके सही इस्तेमाल का तरीका समझाने की हर समभव कोशिश भी माँ ही करती है.

आज जब घर जमा रही थी, अचानक अपनी पुरानी किताबों की धूल साफ करते हुए एक किताब में से माँ के द्वारा काटी कई न्यूज़ पेपर की कटिंग जो वो अक्सर मेरे पढने के लिए सम्भाल कर रखती थी निकल आई. पहले समझ नहीं थी और कोर्स की पढाई के कारण उन पर ध्यान नही दिया इसलिए कभी उन्हे पढना नही चाहा. आज पढने की कोशिश करने लगी तो आँखे पारदर्शी  मोतियों से भर आईं. 

कई तरह की पेपर कटिंग  मेरे सामने थीं जो मुझे अन्दर तक भिगो रही थीं। चूकि मैं रेडियो से सम्बन्ध रखती रही हूँ,  अलग-अलग तरह के प्रोग्राम बनाना पडते रहे हैं. मम्मी ने मेरी मदद की दृष्टि से कई गीतकारों,संगीतकारों,डायरेक्टरों, फिल्मो के बारे में जानकारी संभाल रखी थी. इसके अलावा घर को कैसे सजायें, खाने बनाने की बहुत सारी विधियाँ, दुनिया के अलग अलग क्षेत्र में अपना मुकाम बना चुकी महिलाओं की कहानियाँ, जीवन में सफलता के लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग के कुछ लेसंस, और एक कविता की कटिंग श्री हरिवंश राय बचन द्वारा रचित प्रसिद्ध और प्रेरक कविता की पंक्तिया जो कुछ इस प्रकार थीं- 
  
“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
मेहनत करने वालो की कभी हार नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर बार बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढकर गिरना, गिर कर चढना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत  बेकार नहीं होती 
और कोशिश करने वालों की हार नही होती..... 

इसीलिए कहा गया है माँ हमारी पहली शिक्षक होती है .जब हम माँ के साथ होते हैं हमें उसकी इन खूबियों की जानकारी इतनी नही होती, होती भी है तो उसका हमारे विकास में कितना अदृश्य योगदान और महत्व होता है,यह बहुत बाद में समझ आता है। माँ तुझे सलाम... !  
एकता कानूनगो बक्षी


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Sunday, January 5, 2014

नजरिया हम भी बनेंगे विकसित देश अगर... !

नजरिया 

हम भी बनेंगे विकसित देश अगर... ! 

किताबों में कई बार पढ़ा था विकासशील देश और विकसित देश। भारत एक विकासशील देश है। पहली बार अवसर मिला इस  अंतर को बारीकी से समझने का ।  वाकई खाई बहुत गहरी और बडी है ।  यक़ीनन मेरा यह वाक्य आपको सकारात्मक नहीं लगेगा पर समझ नहीं आता कि हमारे जैसा  विकासशील देश वहां तक कैसे पहुचेगा और शुरुआत कहां से करेगा।  

पिछले दिनों अपने छोटे से प्रवास में भी विकसित देश की कई बातें सीखने और अपनाने जैसी लगी  लेकिन  जिसने बात ने मुझे गहरे से छुआ वो था वहां का समझदारीपूर्ण खुलापन।  जो हर इंसान को अपने हिसाब से जीने की आजादी देता है वो देश ,और सबसे अच्छी बात मुझे महिलाओं की स्थिति लगी।    सच कहूं  यह बात आपको तीखी लग सकती है वहाँ महिला सिर्फ देवी नहीं है वो इंसान भी है उसे भी जीना है। एक ओर जहाँ भारत में उसे भगवान का दर्जा देकर जिम्मेदारियों में जकड सा लिया गया है,वहीं दूसरी ओर उसके अपने पहनावे में बदलाव लाने को कहा जाता है,उस पर ड्रेस कोड लागू करने के प्रयास होते रहते हैं। स्त्री स्वतंत्रता की बात तब तक बेमतलब होगी जब तक की हम अपनी सोच में बदलाव नही ला पाते।   असल में इसी  बदलाव की वास्तविक जरूरत  है।   स्त्री और उससे जुडी बातों को बगैर किसी पूर्वाग्रह के साथ समझा जाना एक जरूरी कदम होगा।  इसके लिए हमें अपने विचारों और सोच में एक खुलापन भी लाना होगा. इस खुलेपन से मेरा आशय फूहडता और् अनैतिकता से कतई नही है। . 

आजादी के बाद भारत ने कई मुकाम हाँसिल किये हैं क्योकि उसके अन्दर एक मज़बूत इरादा था पर समय के साथ वो शायद कमजोर और मलिन होता जा रहा है।  हम सब दौड लगा रहे है पर सबकी दौड केवल अपने स्वार्थ तक ही  सिमित रह गई है। भारत की अच्छाइयों  को नकारा नहीं जा सकता है। मैं  नतमस्तक हूँ और उन पर मुझे गर्व भी है।  हमारे अंदर बहुत संभावनाए भी है  लेकिन  हम छोटी छोटी फिजूल की बातों को लगाकर अक्सर अपना समय व्यर्थ में गंवातें हैं। प्रगति और आकडों से किसी भी देश का विकास देखना बहुत आसान है पर यह समझना भी बहुत जरूरी होगा कि  क्या  उस देश में सभी को समान अधिकार मिल रहा है बगैर किसी लिंग,जाति या आर्थिक भेद भाव के।  .आज  हमारे समाचार पत्र  और न्यूज़ के कंटेंट पर जरा ध्यान दें तो एक ओर वे  महिला उत्त्पीडन की रसमय  की कथा सुनाते नजर आते हैं तो  दूसरी तरफ देखे तो मीडिया में बाबाओं  और अन्धविश्वास फैलाने  वाली खबरों की बिसात जमी हुई है। अगर बात करे अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए दोषारोपण करने की तो यह क्या वास्तविकता नही है कि जिन  दिग्गजों को  हमने अपना देश हवाले कर रखा है  वो कहां तक अपना काम ईमानदारी से कर रहे है।  देश में भ्रष्टाचार की नदी बहती दिखाई देती है. आखिर अन्ना को आन्दोलन क्यों करना पडा था।  ,अगर हर कोई अपना काम पूरी इमानदारी से कर रहा होता तो आज हमारा देश अभी तक विकसित देश हो ही गया होता।  कहते हैं हमारी आबादी हमरे विकास में बाधक है लेकिन जरा गौर कीजिए, इस देश को संभालने के लिए हमारे पास कितने हाथ मौजूद है। सकारात्मक रूप से देखें तो यह हमारी ताकत भी हो सकती है। नजरिया तो अन्तत: बदलना ही होगा। प्लीज वेक अप। 

Thursday, February 21, 2013

पुराना यदि सोना है तो नया भी हीरे से कम नही


पुराना यदि सोना है तो नया भी हीरे से कम नही

पहला कदम हर इंसान के जीवन में रोमांच से भरा हुआ होता है .वो कदम किसी भी दिशा में लिया गया हो . बच्चे का स्कूल में पहला कदम, नए व्यवसाय में व्यापारी का पहला कदम . राजनीति में पहला कदम  , अभिनय में पहला कदम , या एक लड़की का अपने घर को छोड़ कर नए घर और नए परिवार में पहला कदम. हर नया परिवर्तन एक उत्सव की तरह होता है . जिसका हर इंसान के जीवन में बहुत महत्त्व रहता है .

नया नवेला बहुत उत्साहित रहता है  वह अपनी कार्यक्षमता से कहीं अधिक काम करने के जोश से भरा होता है. बहुत खुश और सकारात्मक सोच से परिपूर्ण . साथ ही  दूसरी और उस क्षेत्र में पहले से पहला कदम ले चुके वहाँ मौजूद उसके सीनियर भी खासा उत्साहित रहते हैं .

नए कार्यक्षेत्र में कदम रखने पर शुरूआती मेल मिलाप के बाद शुरू होती है असली खीचतान . सबसे पहले उससे वो नियम सिखाये जाते है जो सालों से अभी तक किसी भी सिनिअर ने नहीं अपनाए थे.  यह नियम बाकी दिग्गजों के लिए नहीं होते, यह खासकर होते हैं नए नवेले  के लिए. उसके अच्छे काम पर कभी कभी उसकी तारीफ़ भी हो जाती है.  दो दिन  तक वो उस ख़ुशी में और भी बेहतर काम करता है उसके चेहरे की चमक देखने लायक होती है. पर जैसे है उससे छोटी सी गलती हो जाती  है तब उसके पहले किये हुए अच्छे काम को देखते हुए उससे माफ़ी नहीं मिलती बल्कि यह कहकर आलोचना की जाती है कि  वह अभी ट्रेनी है अभी मास्टर नहीं. हर जनरेशन अपने साथ नयी ताजगी लाती है, काम करने के नए तरीके.  बस यहाँ फिर वही खीचतान शुरू होती है , सिनिअर चाहते हैं कि जैसे पहले से चल रहा है सब कुछ वैसा ही चले . वो नए नवेले के सृजनात्मक सोच का तिरस्कार करते हैं  वो उस पर दबाव डालते हैं  ताकि वो उनके बनाये साँचे में वही रूप ले ले जो सालो से चला आ रहा है . वो उसे अपनी तरह बनाना  चाहते है.

दोस्तों कब तक ऐसा चलता रहेगा क्यों आज भी हम नए का स्वागत खुली सोंच के साथ नहीं कर पाते . हाँ हर जगह इम्प्रूवमेंट की जगह होती है पर इम्प्रूवमेंट का मतलब रिवर्स गियर लगाना नहीं है . क्यों हमारा समाज चाहता है की जैसे पहले से चलता आ रहा है वही सही है . कश्मीर की गर्ल बैंड पर रोक लगाना एक जीता जागता उदाहरण है.   क्यों हम नयी जनरेशन से चाहते है की वो एक फ्रेम में काम करे. क्यों हम उन्हें आजादी नहीं देते की वह अपना  नयापन ला सके.  उनके जोश को ठंडा करने का हक किसी को नहीं होना चाहिए.   सकारात्मक दिशा में किया गया परिवर्तन हमेशा अच्छे नतीजे लाता है. सतयुग के महान  ऋषि मुनि जो अब इस दौर में शायद ही बचे होंगे  पर हर दिन  कही न कहीं आज के हमारे संतों की कैसी-कैसी  महफिल  सजती है कौन नही जानता और हर दिन उनके काण्ड न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल की शोभा बढ़ाते ही रहते हैं . आखिर क्यों उन पर रोक नहीं लगती क्योकि संतों सन्यासियों का सम्मान करने की हमारी परम्परा सालों से चल रही है इसलिए ?  
पुराना है तो बेहतर है. Old is gold , ऐसा है पर new can be diamond.. अगर उसे  पुराने का अनुभव और नयेपन की ताजगी और आजादी का तालमेल बैठाने दिया जाए. प्लीज वेक-अप !

Tuesday, July 10, 2012

मन की मिठास


कहानी
मन की मिठास
एकता कानूनगो

कार्तिक के पापा का कुछ समय पहले ही चेन्नै स्थानान्तरण हुआ था, इसके कारण कार्तिक और उसकी मम्मी को भी चेन्नै आना पडा. जब कार्तिक अपने घर पर रहता था उसका दिन अपने दादा दादी के साथ और आस-पास के दोस्तो के साथ खेलते हुए गुज़रता था. चेनै जाने के नाम से ही कार्तिक और उसकी मम्मी दोनो उदास हो गए थे. अपनों को छोड कर इतनी दूर जाना अच्छा नही लग रहा था.

इन्दौर और चेन्नै के बीच दूरी भी इतनी अधिक थी कि बार-बार आना-जाना भी मुश्किल था. चेन्नै जाने के कुछ दिनों बाद कार्तिक की मम्मी को कुछ अच्छा लगने लगा क्योंकि आस-पडौस के लोग बहुत ही  अच्छे थे और मिलनसार थे. एक दूसरे कि भाषा का ज्ञान न होते हुए भी एक दूसरे कि ज़रुरत को समझ लेते थे. एक समस्या यह थी कि  जहाँ पर वे रहते थे वहाँ कार्तिक का हमउम्र कोई भी नही था. .इसलिये कार्तिक बार बार दादा के घर इन्दौर जाने की जिद करता रहता.

कार्तिक के मम्मी पापा ने घर के पास ही स्थित एक अच्छे स्कूल मे उसका दाखिला करा दिया. मम्मी पापा को विश्वास था कि जब स्कूल में नए साथी उसे मिलेंगे तब शायद उसका मन चेन्नै मे लग जायेगा. बहुत दिनों तक तो कार्तिक ने स्कूल जाने मे कुछ आना-कानी करी लेकिन बाद में वह खुशी-खुशी स्कूल जाने लगा ,एक दिन उसकी मम्मी ने जब उसे दुलारते हुए कहा कि ‘ कार्तिक बेटा आज कल तो तुम स्कूल जाने के लिए खुशी खुशी तैयार हो जाते हो ,बिल्कुल तंग भी नही करते.’ तब कार्तिक ने बताया  ‘क्योकि स्कूल मे मेरा दोस्त इंतजार करता है, हम बहुत खेलते हैं, मस्ती करते हैं’. कार्तिक लगातार चहकता हुआ बोलते जा रहा था, मम्मी ने उसे बीच में टोकते हुए कहा  ‘आपके दोस्त का नाम तो बताए जरा !’  . कार्तिक ने आवाज को बहुत सुरिला बनाते हुए कहा ‘उसका नाम है अली.. वह मेरा बेस्ट फ्रेंड है , he is my best friend... मम्मी ने थोडी देर कुछ सोचा, न जाने क्यों उनके माथे पर कुछ रेखाएँ उभर आईं. कुछ अनमने भाव से उन्होने घडी की तरफ देखा कार्तिक की कलाई थाम कर बोलीं –‘चलो स्कूल के लिए देर हो जायेगी चलो जल्दी जूते पहनों और चलो’.

अब तो ये सिलसिला सा बन गया था , कार्तिक रोज़ स्कूल से आकर पूरे दिन अली के बारे मे बातें करता रहता.  अली की अम्मी बहुत अच्छा खाना बनाती है. अली ऐसा है..अली ऐसा करता है..अली वैसा करता है  अली..अली..अली. कार्तिक की जुबान से जैसे अली शब्द चिपक सा गया था.   कार्तिक कि मम्मी उसे छेडते हुए कहती कि ‘आपके स्कूल मे क्या ‘अलीपाठ’   के अलावा भी कुछ और भी पढाया जाता है?’  कार्तिक बडी मासूमियत से कहता –‘ हाँ,मम्मी अली बहुत अच्छा पाठ पढता है.’

अली के प्रति कार्तिक की दीवानगी से चिंतित कार्तिक कि मम्मी ने उसके पापा से एक दिन कहा-‘ देखो तो कार्तिक का बस एक यह अली ही मात्र दोस्त है’ . इस बात पर कार्तिक के पापा ने कहा –‘तो क्या हुआ अच्छा दोस्त एक भी हो तो बहुत है.’  कार्तिक की मम्मी ने असंतोष भरी आखों से देखते हुए कहा-‘ आप तो कुछ समझते ही नही हैं, मुझे उसकी फिक्र लगी रहती है.’ . ‘ कुछ भी सोचती रहती हो तुम तो ,नाहक परेशान होने से कोई फायदा नही है.’ कार्तिक के पापा मुस्कुराते हुए घूमने चले गए थे.

एक दिन कार्तिक रोते हुए स्कूल से घर लौटा. मम्मी चिंतित हो उठी. जब रोने का कारण पूछा तो कार्तिक ने आँसुओं को पौंछते हुए कहा-  ‘ आज अली ने उसे मारा, उसका उससे झगडा हो गया है’,   मम्मी ने उसे दिलासा दिया और कहा कि ‘रोना बन्द करो, कल मैं तुम्हारे साथ स्कूल चलूंगी और तुम्हारा सेक्शन बदलवा दूंगी, सब ठीक हो जाएगा.’ किसी तरह मम्मी ने उसे शांत किया.  

अगले दिन जब कार्तिक और उसकी मम्मी स्कूल पहुँचे , अली दौडते-चहकते उनके पास चला आया , आते ही उसने कार्तिक से माफी माँगी. वह अपने साथ  फूलों का एक गुलदस्ता भी  लाया था, अली ने एक शीट पर अपने  हाथ से एक ग्रीटिंग कार्ड भी बनाया था. जिस पर उसने सुन्दर अक्षरों में लिखा था,‘ I am sorry my best friend karthik ,lets patch up !!!’

अली के अम्मी और अब्बू भी तभी वहाँ आ गये.  अली की अम्मी ने कार्तिक की तरफ एक मर्तबान बढाते हुए हुए कहा , लो बेटा आपकी पसन्द कि सेवईंयाँ, अली ने बताया कि आपको बहुत पसन्द है.’ कार्तिक ने जल्दी से मर्तबान ले लिया और फिर अली के नजदीक  पहुँचकर कहा-‘तुम भी लो ना तुम्हे भी तो पसन्द है सेवईंयाँ,’ 
एकाएक स्कूल की घंटी बज उठी. दोनों अपनी क्लास की और दौड गए. सेक्शन बदलने का कार्तिक की मम्मी का विचार फूलों की खुशबू और मन की मिठास में न जाने कहाँ गुम सा गया था.

एकता कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इन्दौर-18

Friday, March 23, 2012

वंदे मातरम


संस्मरण
वंदे मातरम
एकता कानूनगो

सवेरे के ठीक चार बजकर पंद्रह मिनट पर पूरे घर में चहल पहल थी . मम्मी उठ कर चाय और नाश्ता बना रही थी . पापा कार बाहर निकाल रहे थे.सभी को मन में आज ऐसा लग रहा था जैसे घर में कोई उत्सव होने वाला हो. देर रात तक वैसे ही किसी को नींद नहीं आई थी. मुझे याद भी नहीं की सुबह कब हो गई . अलार्म के बजने से पहले ही मैंने अपना बिस्तर छोड़ दिया .जल्दी से तैयार हुई . भगवान के आशीर्वाद लिए और और ठीक पाँच बजकर तीस मिनट पर स्टूडियो पहुँच गयी.

अपने अंदर अलग ही तरह के डर और उत्साह का अजीब संयोग अनुभव कर रही थी. बचपन से लेकर अब तक रेडियो(मेरे यहाँ शुरू से ही बैटरी से चलने वाला ट्रांजिस्टर रहा है) मेरे लिए एक जादूई बक्से की तरह था , कोई दिखाई नहीं देता है , कोई तार नहीं है फिर कहाँ से आवाज़ आती है . जब बिजली चली जाती है और टीवी बंद हो जाते है तब भी यह जादू का डिब्बा हमारा मन बहलाता रहता है. स्कूल में फिजिक्स पढाते वक्त भले ही मैडम ने रेडियो के बारे में विस्तार से बताया था लेकिन मेरे मन पर अंकित रेडियो की छबि ऐसी गहरी पडी हुई थी कि मेरे लिए तो हमेशा से वह जादू का बक्सा ही रहा , जिसमे से आवाज़ आती थी और वो आवाज़ आकाश से आती थी, इसलिए ही उसे आकाशवाणी कहते हैं , यही मेरी रेडियो के लिए अपनी समझ थी. आज मेरे जीवन का सबसे खास दिन था . मेरी आवाज़ आज पहली बार ऑन एयर (प्रसारित) होने वाली थी .

आज वो सारी बाते याद आ रही थीं जो हमे हमारे सीनियरों ने ट्रेनिंग के दौरान सिखाई थी. छः दिनों का 'वाणी प्रशिक्षण' (ट्रेनिंग ) भी अपने आप मे अद्भुतीय अनुभव था .असल में मुझे तो यह एक ऐसी यात्रा कि तरह लगा जहाँ मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं उस देश की नागरिक हूँ जिस पर हमें गर्व करना चाहिए . प्रशिक्षण में हमें यह अनुभूति भी हुई कि प्रत्येक हिन्दुस्तानी को सबसे पहले अपने भीतर उन जीवन मूल्यों को समाहित करना चाहिए जो हमारी स्थानीय पहचान होते है.
मेरा विश्वास बढता गया कि सचमुच यह संस्था 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय' जैसे ध्येय सूत्र -वाक्य पर काम करती है,अपने आप में अद्भुयतीय है. प्रारम्भ से ही अपने सिद्धांतों और मूल्यों ,उसूलों पर काम करती इस संस्था ने अभी भी अपनी गरिमा इस प्रतियोगी समय में बनाए रखी है.

इतने सारे नए-नए निजी रेडियो स्टेशन शुरू होने के बाद भी सादगी की चादर ओढ़े आकाशवाणी अभी भी ध्रुव तारे कि तरह मनोरंजन और ज्ञान के आकाश में अपनी चमक बिखेर रहा है.
आकाशवाणी हमारे मन की जिज्ञासाओं तथा उदासी के लिए बेहतर भोजन की तरह उपलब्ध होता है. मिर्च मसाले रहित सात्विक भोजन , जिसमे विविधता होती है पर वो हमारा पूरा पोषण करता है . ट्रेनिंग में सिखाई गयी बातें सिर्फ एक अच्छे उद्घोषक (अनाउंसर) बनाने के लिए ही नहीं थी बल्कि वह व्यक्तित्व विकास के लिए एक कार्यशाला भी थी . अपने आप को एक अच्छा इंसान कैसे बनाया जाए इस बात का पाठ पढाया जाना प्रशिक्षण के साथ-साथ चलता गया था. सबसे पहले हमें जो सिखाया गया वह था- 'श्रोता को सबसे आगे माना जाए, वह ईश्वर तुल्य है, उन्हें पूरे सम्मान और प्यार भरे ढंग से जवाब दिया जाये'. विनम्रता को स्वभाव में लाओ तथा कढवी बात का भी जवाब मुस्कुरा कर दो. सामने वाले के कड़वे बोल पर अपने अच्छे व्यवहार की प्रेम भरी बूँदें उसके मन पर ढंडक पहुंचाती हैं.
आकाशवाणी की लायेब्ररी का अनुभव भी अविस्मरणीय रहा . दुर्लभ गीतों का, महान हस्तियों की आवाजों का खज़ाना वहाँ भरा पड़ा था. सारंगी , बांसुरी ,तबला,आदि जैसे कई भारतीय संगीत के वाद्य यंत्रो से परिचय यहाँ मिलता रहा है. अपनी मिटटी की खुशबू लिए लोक गीत, लोक संगीत, हमारी क्षेत्रीय भाषा को अभी भी इसने सहेज रखा है. शब्दों के सही उच्चारण पर हमें अपनी स्कूली शिक्षा से भी कुछ ज्यादा ही यहाँ सीखने को मिला.
यहाँ काम करने वाले लोग जिनके लिए तो बस यही कहते बनता है -मधुर आवाज़ , सादगी , और हर विषय पर ढेर सारा ज्ञान, यही उनकी सुंदरता है, खूबी है .
आकाशवाणी के साथ उसका विशाल गौरवशाली इतिहास है जो किसी को भी बार बार खुद का अवलोकन करने पर विवश कर देता है , मेरी भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी , हालाकि सारे अनाउंसमेंट मै पहले ही लिख चुकी थी .घर पर कई बार आईने के सामने , परिवार के सदस्यों के सामने पढ़ चुकी थी , एक शो तो में अपने सपने में भी कर चुकी थी , पर घबराहट अभी भी ज्यों की त्यों बनी हुई थी. इंदौर केंद्र के स्टूडियो के अंदर आकाशवाणी की चिर-परिचित सिग्नेचर ट्यून को हलके-हलके फेड आउट करते हुए, अनाउंसर के माइक्रोफोन की आवाज पूरी तरह खोलकर , सुबह पांच बजकर पचपन मिनट पर जैसे ही मैंने पहला शब्द बोला- "वंदे-मातरम". मेरा सारा डर समाप्त हो गया और एक बुलंद इरादों वाला विश्वास मुझ में भर गया .
मेरी आवाज़ में 'वंदे-मातरम ' आकाश को चीरते हुए जादुई डिब्बे के माध्यम से न जाने कितने घरों में पहुँच गया था. इसके बाद बंकिमबाबू का लिखा हमारा राष्ट्र-गीत –'वंदे मातरम..वंदे मातरम..सुजलाम ..सुफलाम..मातरम..' बजने लगा . हजारों बार गाए और सुने गीत की पंक्तियों में आज मैं कुछ नया ही अर्थ सुन पा रही थी.

एकता कानूनगो

Friday, March 16, 2012

रखवाली

कॉलोनी के बीचों-बीच अब तक बचा हुआ खेत सभी के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ था . आकर्षण तब और बढ़ गया जब पता चला कि खेत में चने बोए गए हैं.
संपन्न रहवासी रोज उस खेत की तरफ टक-टकी लगाये हुए रहते. अधेड उम्र का एक आदमी खेत की रखवाली बड़ी मेहनत से किया करता था. दिन भर खेत में चक्कर लगाता और रात को खेत के बीचों-बीच खटिया डालकर सो जाता. थोड़े ही दिनों में पौधों में चने की बालियाँ दिखाई देने लगीं. सभी रहवासियों के मन खिल उठे .

चने की फसल देख कर सबके मुँह में पानी आने लगा. छोड़ (हरे चने) खाने के मोह में वे अपने को रोक नहीं सके और एक दिन खेत के चौकीदार से कह ही दिया -'दादा थोड़े चने हमें भी दे दो.' इस पर गरीब चौकीदार ने विनम्रता से कहा –' मैं कैसे दे दूँ बहन जी मैं तो नौकर आदमी हूँ , मालिक आएं तब उनसे बात कर लेना आप लोग.'
उसके इस उत्तर की कल्पना भी कॉलोनीवासियों ने नहीं की थी. एक महिला ने अपनी आवाज़ को थोड़ा ऊँची करते हुए कहा –' अरे मुफ्त में थोडे ही ले रहे हैं , रुपए दे कर लेंगे ,तेरा भी फायदा हो जायेगा.' सबको लग रहा था कि इस जमाने का सबसे प्रभावी हथियार चौकीदार पर सही वार कर सकेगा. लेकिन यह बहुत अचंभित करनेवाली बात थी जब चौकीदार ने पहले की तरह कॉलोनीवासियों की मांग को ठुकराते हुए धीरे से लेकिन दृढता से कहा-' साहब बेईमानी करके मैं ऊपरवाले को क्या जवाब दूंगा.'

अनपढ़ चौकीदार की बात संपन्न और शिक्षित कॉलोनी वालों की समझ से बाहर ही थी.मुँह बिचकाकर उन्होंने अपने-अपने घरों का रुख कर लिया. चौकीदार ने अपने भीतर जो चना अब तक बचा रखा था शायद उसके लिए खेत की रखवाली से भी अधिक महत्वपूर्ण था.


एकता कानूनगो

Monday, December 12, 2011

शिक्षक बनने से पहले जरा सोचें !

सामान्यत: लोग अध्यापन कार्य को बहुत हल्के रूप मे लेते हैं। जैसे ही पढाई समाप्त होती है हर कोई कहने लगता है ,बस अब कहीं न कहीं नौकरी पर लग जाओ, और कुछ नही तो किसी स्कूल या घर पर ही बच्चों की ट्यूशन लेने लगो। ऐसा कहते समय यह कभी नही सोंचा जाता कि वह व्यक्ति इस कार्य के लिए उपयुक्त है भी या नही।
जैसे ही मैने अपनी एमबीए की पढाई पूरी की,मेरे सामने भी इसी प्रकार के सुझाव आने लगे। दरअसल आर्थिक मन्दी के इस दौर मे मेरा दुर्भाग्य रहा कि कॉलेज से सीधे कैम्पस सिलेक्शन नही हो सका था। हर कोई कह रहा था-देखो कितने सारे स्कूल,कॉलेज मशरूम की तरह पैदा हो गए हैं,क्यों न शिक्षक के लिए आवेदन कर देते हो, कोई मन्दी का प्रभाव नही है, बस जाओ,पढाओ और कमाओ..।

हाँलाकि बात बहुत व्यावहारिक थी, जीवन वाकई बडा सहज हो सकता था,लेकिन मै थोडे असमंजस मे आ गई। सोचने लगी –क्या वाकई मै टीचर बनने की योग्यता रखती हूँ? मैने अनेक समाचार पत्रों मे शिक्षकों की आवश्यकता वाले विज्ञापनो पर नजर डाली। कई स्कूलों के लिए अच्छे शिक्षकों की तत्काल जरूरत थी। कहीं विषय विशेष मे डिग्री किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से चाहिए थी तो कहीं कुछ अनुभव आवश्यक था। बस इतना काफी था, बाकि साक्षात्कार समिति को निर्धारित करना था। किसी ने यह भी बताया कि जिस कॉलेज से एमबीए किया है उसी कालेज मे पढाने लग जाओ।

अपने ही कॉलेज मे पढाने के सन्दर्भ मे मेरा कुछ अच्छा अनुभव नही रहा था। जब मै अपने कॉलेज मे पढती थी उसमे उस साल ही अपनी पढाई पूरी करनेवाली गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाली हमारी सीनियर को हमारी शिक्षिका बना दिया गया था। इतनी प्रतिभाशाली होते हुए भी पूरी कक्षा का मन उनके पीरियड मे बिलकुल नही लगता था। कभी-कभी लगता था कि उनकी क्लास का बहिष्कार कर दिया जाए लेकिन गुरू को ईश्वर मानने के संस्कारों ने रोके रखा। आंतरिक मूल्यांकन के अंकों तथा उपस्थिति के चक्कर मे कक्षा मे बने रहने की मजबूरी भी होती थी। सच तो यह लगता था कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो कोचिंग क्लास है ही। छात्रो के साथ-साथ टीचर भी अधिक व्यावहारिक हो गए लगते हैं। पढाओ और कमाओ, थोडा यहाँ पढाओ बाकि कोचिंग से कमाओ। शायद यही समीकरण हर शिक्षण संस्थान मे आम हो गया है।

मेरा मानना है कि एक तरह से से यह अपराध ही होगा कि अपनी सुविधा और लाभ के लिए विद्यार्थियो का इस तरह नुक्सान किया जाना चाहिए। कम से कम शिक्षा जगत मे तो गुरुओं की महत्ता को बनाए रखा जाना चाहिए। शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सम्पूर्ण योग्यता का आकलन मात्र डिग्रियों के आधार पर करना बिल्कुल उचित नही कहा जा सकता । छात्रों के समग्र विकास तथा उनकी जीवन शैली को सार्थकता प्रदान करने की क्षमता को देखकर ही इस पेशे मे सेवाओं का अवसर दिया जाना शायद उचित होगा।
बार-बार यही प्रश्न सामने आ जाता है कि समर्थ शिक्षण संस्थाओं की उपलब्धता के बावजूद कोचिंग कक्षाओं की आवश्यकता ही क्यों होना चाहिए? यदि यह मान भी लिया जाए कि कमजोर विद्यार्थियों को तैयार करने के लिए यह जरूरी है तो फिर क्या कारण हैं कि प्रावीण्यता रखने वाले बच्चे भी क्यों वहाँ जाने के लिए विवश हो गए होते हैं। यह किस बात की ओर संकेत कर रहा है, अच्छी तरह समझा जा सकता है। भारी फीस लेने और बेहतर सुविधा देनेवाले संस्थानो मे आखिर ऐसी क्या कमी रह जाती है कि विद्यार्थियों को दोहरी मेहनत और अधिक खर्च के लिए विवश होना पडता है।
बात सीधी सी है कि जो काम सबसे ज्यादा ईमानदारी और समर्पण तथा निष्ठा की माँग करता है उसे ही सबसे आसान एवम सहज मानकर गम्भीरता से नही लिया जा रहा। एक माँ जैसे बच्चे को जन्म देती है उसी प्रकार एक शिक्षक उसके व्यक्तित्व को बनाने का काम करता है। शिक्षक का व्यवहार, आचरण और उसके व्यक्तित्व का प्रभाव अपने छात्रों पर निश्चित ही असर डालता है। सूचना क्राँति के इस जमाने मे भले ही सब कुछ इटरनेट के जरिए प्राप्त किया जाना सम्भव बना दिया गया हो किंतु कुछ बातें अभी भी साथ साथ बैठकर, सामूहिकता के साथ ही सीखी और सिखाई जाना सम्भव होगा।

अच्छा शिक्षक वही होगा जिससे हर पल छात्रों को कुछ न कुछ मिलता रहे वह चाहे जीवन जीने की कला हो अथवा कोर्स की कोई परिभाषा, उसका व्यक्तित्व ऐसा हो जिसमे छात्रों को आस्था और विश्वास व्यक्त करने मे कोई संकोच न हो। उसकी अभिव्यक्ति अनुकरणीय हो, सही मायने मे वह हीरो हो अपने छात्रो के बीच । विद्यार्थी उसमे अपना एक रचनात्मक दोस्त और पथप्रदर्शक देख सकें।
मेरा मानना है कि यह काम इतना आसान भी नही है। एक युवा के तौर पर मैं अपने विचार इस आकाँक्षा से प्रकट कर रही हूँ कि हम जैसे जो युवा दोस्त, शिक्षक जैसे महत्वपूर्ण एवम पवित्र दायित्व के निर्वाह के लिए प्रस्तुत होना चाहते हैं एक बार अपनी डिग्री और अपने अंत:करण को जरूर खंगाल लें। क्या सचमुच शिक्षक मे आवश्यक गुणों के कुछ रजत कण बिखरकर सामने दिखाई देते हैं ? यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही यह दायित्व हमारे लिए उपयुक्त होगा अन्यथा शायद हम बेहतर समाज के लिए कुछ ठीक नही कर सकेंगे।

प्लीज वेकअप !

एकता कानूनगो

Sunday, September 11, 2011

शुभारम्भ

प्रेरक प्रसंग /लघुकथा
शुभारम्भ
एकता कानूनगो
कुछ समय पहले ही आशाबाई गाँव से हमारे शहर आई थी। थोडे समय मे ही उसने सब का मन जीत लिया था। चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ घर के बच्चों से प्यार से बात करना, बडों का आदर करना उसके स्वभाव मे था। काम के लिए उसे टोंकना नही पडता था,पूरी लगन और मेहनत से वह काम करती थी लेकिन जो बात सबको अच्छी नही लगती थी वह थी अपने साथ नौ बरस की बेटी ज्योति को काम पर साथ-साथ लिए फिरना। पढने लिखने की उम्र मे लोगों के झूठे बर्तन साफ करने मे अपनी मदद ज्योति से करवाकर शायद वह सबको अनायास ही बाल मजदूरी कानून के उलंघन के अपराध मे झोंक रही थी। सबने आशाबाई को कई बार कहा था कि वह ज्योति को अपने साथ नही लाए तथा पढने के लिए स्कूल भेजे लेकिन वह हर बार मुस्कुराकर बात को टाल देती, कहती ‘ क्या करेगी पढकर अभी से काम करेगी तो माहिर हो जाएगी,हमने भी तो ऐसे ही शुरुआत की थी।’
एक दिन सुबह से ही कालोनी मे गहमा गहमी का माहोल बना हुआ था, रोज की तरह सभी महिलाएँ बातचीत करने के लिए जमा थीं लेकिन चर्चा का विषय आज कुछ अलग था। यों अक्सर हँसी मजाक,सुख दुख की बातों मे समय कटता था। बडा अच्छा वातावरण था कालोनी का। लेकिन आज सब कुछ चिंतित से दिखाई दे रहे थे। पडोस की पिंकी स्कूल जाते जाते हर घर मे खबर पहुँचा आई थी कि आज आशा आँटी काम करने नही आएँगी, उनकी बेटी ज्योति बीमार हो गई है हमारे यहाँ उनका फोन आया था। थोडी देर बातचीत के पश्चात सभी महिलाएँ अपने अपने घर का कामकाज निपटाने चलीं गईं।
उधर आशाबाई ज्योति को लेकर अस्पताल पहुच गई थी। पडोस वाली आंटी ने उसे अस्पताल का रास्ता आदि समझा दिया था कहा था कि पहले लाइन मे लगकर पर्ची कटवाना पडेगी। अत: आशाबाई वहाँ लगी हुई थी। लाइन कुछ अधिक ही लम्बी थी। बडी देर बाद आशाबाई का नम्बर आया तो खिडकी पर बैठे व्यक्ति ने कहा –‘बाई बिल दिखाओ!’ आशाबाई घबरा गई। उसने सोंचा आंटी ने बिल के बारे मे तो कुछ नही बताया था । उसने बाबू से पूछा ‘कौनसा बिल भैया ? मेरे पास तो बिल नही है।’ इस पर बाबू कुछ कडे स्वर मे बोल पडा-‘ तो इतनी देर से बिजली के बिल भरने की लाइन मे क्यों खडी हो बाई!’ आशाबाई के चेहरे का रंग उड गया। लाइन मे खडे किसी व्यक्ति को उस पर तरस आ गया गया,उन्होने उससे पूछा-‘ क्या काम था तुम्हे बाई?’ आशाबाई ने सकुचाते हुए बताया कि उसे तो अस्पताल की परची बनवाकर अपनी बेटी को डाक्टर साहब को दिखाना है। उन सज्जन व्यक्ति ने उसे हाथ के इशारे से अस्पताल का गेट दिखाते हुए कहा कि-‘वहाँ सामने है वह अस्पताल ।’
अक्षर ज्ञान नही होने से आशाबाई को आज बहुत शर्मीन्दगी महसूस हुई। वह किसी से नजरें नही मिला पा रही थी। वह भारी मन से अपनी बेटी को लेकर अस्पताल की ओर बढ गई। इस घटना का बडा गहरा प्रभाव आशाबाई पर पडा था। ज्ञान और शिक्षा का महत्व उसके मन पर पूरी तरह अंकित हो चुका था। वह समझ चुकी थी कि अब उसे क्या करना है।
अगले दिन कालोनी की आंटियाँ आशा बाई का इंतजार कर रहीं थीं लेकिन अभी तक वह काम करने नही आई थी। हमेशा समय पर आने वाली आशाबाई को आज न जाने क्या हो गया था। कहीं ज्योति की तबीयत ज्यादा खराब तो नही हो गई। सब सोच ही रहे थे कि वह आती हुई दिखाई दी।
‘कैसी है ज्योति। ठीक तो है ना!’ सबकी चिंता जबान पर आ गई। आशाबाई ने कल की पूरी घटना सबको कह सुनाई। देर से आने की वजह जब आशाबाई ने बताई तो सबके चेहरों पर खुशी फैल गई। आज वह ज्योति को स्कूल मे भरती कराने गई थी ,कल से वह स्कूल जाएगी। फिर क्या था, कोई स्कूल बैग अपनी तरफ से देने का कह रहा था तो कोई युनिफार्म का खर्च उठाने को तैयार था ,कोई किताबों की व्यवस्था करने को राजी था तो कोई कहीं से फीस के बन्दोबस्त का आश्वासन दे रहा था। आज के समय मे ऐसा कम ही देखने को मिलता है लेकिन हमारी कालोनी की यही तो विशेषता थी।
ज्योति अपने जीवन को ज्ञान के प्रकाश से रोशन करने की राह पर चल पडी थी। कुछ दिनो बाद पता चला आशाबाई ने भी शाम को चलनेवाली प्रोढ शिक्षा शाला मे जाना प्रारम्भ कर दिया था। परिवर्तन का शुभारम्भ शायद ऐसे ही होता है !