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Saturday, August 24, 2019

कविता / सफेद घर / एकता कानूनगो बक्षी ( सुबह सवेरे - 25 अगस्त 2019)

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

कविता
सफेद घर
एकता कानूनगो बक्षी

गुलाबी और सफेद
बोगनबेलिया से आच्छादित सफेद रंग का घर
आकर्षित करता है बार बार

पारदर्शी खिड़कियों के भीतर का रहस्य
कुतूहल जगाता है सूरज की रोशनी के साथ

दीवारें
जैसे खिड़कियों में बदल दी गईं हैं इस घर की
और जैसा कि चलन है इन दिनों
एक मात्र प्रवेश द्वार
डोर बेल बजाने को ललचाता रहता है मुझे

धूप के साथ
मन प्रवेश करता है सामने के सफेद घर में

आंगन में चिड़ियों के साथ
बिल्लियाँ और कुछ बच्चे दौड़ लगाते हैं दिन भर
ग्रामीण चौकीदार की झोपड़ी से निकल कर 
रोटियों की महक
मेरी बालकनी को स्मृतियों से भर देती है 

उदास तो कतई नही लगता यह
दो बुजुर्ग रहते हैं इस घर मे
जीवन की शाम बिताते

चाय के दो प्याले खिलखिलाते हैं
सुबह शाम
हंसी हंसी में उड़ा दिए हैं जैसे उन्होंने
अपने सारे दुःख 

जीवन की आख़िरी पारी में
आत्मनिर्भरता ,आत्मसम्मान और संतोष की
भैरवी से गूँजता रहता है सफेद घर।

Thursday, August 22, 2019

निजता की अदृश्य लकीर/ जनसत्ता/23 अगस्त 2019

जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।

दुनिया मेरे आगे

निजता की अदृश्य लकीर
एकता कानूनगो बक्षी



मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज की अपनी एक व्यवस्था है, जिसके अपने कुछ नियम और सलीके हैं। इन नियमों के पालन से गरिमामय और स्वस्थ वातावरण का निर्माण तो होता ही है साथ ही ये हमे एक दूसरे से जोड़े रखने का भी काम करते हैं। इन नियमों के साथ ही एक अदृश्य लकीर ऐसी भी हम सब के बीच खिंची होती है, जो हमारी और दूसरों की आज़ादी और उनकी निजता की सुरक्षा और मान को सुरक्षित रखा जाना सुनिश्चित करती है। इस लकीर का पालन किसी भी सभ्य समाज में रहने वाले हर व्यक्ति का दायित्व होना अपेक्षित रहता है।

देखा गया है कि वही समाज फलता फूलता है, जहाँ नए का स्वागत हो और जिसमें हर इंसान को अपना जीवन अपनी पसंद से जीने की आज़ादी हो। कई बार इसके विपरीत भी  देखने को मिलता है, जब समाज कोई एक ऐसा रूढ़ ढांचा बना लेता है जिसमें अपनी तरह से ही चीजों का मूल्यांकन किया जाने लगता है।  व्यापक और नए को स्वीकार करने की दृष्टि के अभाव में वह कई व्यक्तियों की गतिविधियों को खारिज कर देने को ही उचित मानने लगता है। अगर हम उनके बनाए मापदंडों में खरे नहीं उतर पाते तो हमे असफल  घोषित कर दिया जाता है। समाज की आकांक्षाओ का दबाव कभी कभी उस सीमा रेखा को भी लांघ जाता है जिसके चलते इंसान खुद को हताश असहाय महसूस करने लगता है और गलत कदम उठा लेने में विवश हो जाता है।


मनुष्य के अंदर अपार संभावनाएं है, जो कि हर बार  पुराने मापदंड तोड़ती है और नया इतिहास  रचती है। किसी निश्चित पैमाने और कुछ लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने से कहीं अधिक ऊंची उड़ान भरने में वह सक्षम हो सकता है। कुछ लोगो के सीमित ज्ञान और समझ से लागू किये निराधार मापदंडों से खुद का मूल्यांकन करना शायद हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। हर इंसान की अपनी यात्रा है, अपने संघर्ष हैं, और अपने मुकाम भी, तो फिर कैसे लंबे समय से चले आ रहे कुछ रूढ़ पैमानों पर खुद को आंकने के लिए बाध्यता होनी चाहिए?  जबकि अनंत संभावनाओं का विशाल आसमान हमारे समक्ष है।



स्कूल के दिनों में असेंबली या स्पोर्ट्स पीरियड के वक्त विद्यार्थियों को पंक्तिबद्ध करने के पूर्व सब से पहले कहा जाता था कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे  व्यक्ति से एक हाथ की दूरी बनाकर खड़ा हो ताकि सब स्वतंत्र और सहजता से अपना काम व्यस्थित रुप से कर सकें।  यही सबक हमें पुनः याद करने की ज़रूरत है। किसी के भी जीवन मे हमें और किसी को भी अपने जीवन मे इतना हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए कि हमारी खुशियों और निजता पर उसका विपरीत प्रभाव पड़े।  हर रिश्ते में, हर समाज में एक ऐसी सीमा रेखा का होना बहुत ज़रूरी समझा जाना चाहिए।

ऐसे में ख्यात शायर राहत इंदौरी साहब का एक शेर याद आता है "अफवाह थी कि मेरी तबीयत खराब है, लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया"।
एक दूसरे की चिंता,मदद,सलाह,देखभाल जहाँ हमे एक दूसरे के करीब लाती है, वहीं उसकी अति पूरी तरह से विपरीत प्रभाव भी डाल सकती है। इसलिए थोड़ा सा फ़ासला हमेशा बनाये रखना बहुत ज़रूरी है ।

कार्यक्षेत्र और परिवार के बीच भी इस सीमा रेखा की सामान्यतः अनदेखी की जाती है। आप कैसे कपड़े पहनते है? आप मांसाहारी हैं या आप शाकाहारी हैं?आप अपनी भाषा बोलते हैं या आप विदेशी भाषा मे संवाद करना पसंद करते हैं? , आपका व्यवसाय, आपकी शादी,आपके बच्चे, आपके विचार, इन सब सन्दर्भों में भी मनमाने ढंग से समाज के कुछ लोग अपने बनाए रूढीवादी मापदंडों और पूर्वाग्रहों  को थोंपकर जीवन में अनचाही मुश्किलें पैदा करने का प्रयास करते रहते हैं।  अगर आप उनके पैमाने पर खरे नहीं हैं तो आप अधूरे हैं। जबकि अधूरापन उनकी सोच में होता है।  दरअसल, वे लोग वस्तुस्थिति और अन्यों के मन और जीवन को समझने में सक्षम नहीं होते। ऐसे लोग पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं मे जकड़े हुए होते हैं और किसी भी बदलाव से असुरक्षित महसूस करते हैं। जबकि असल मे होना तो यह चाहिए कि पुराने अनुभवों और नए समय की ज़रूरतों को देखकर निर्णय लिए जाएँ न कि लोक लाज के किसी भय से प्रभावित होकर।


हालांकि हमारे यहां बड़ी पुरानी कहावत है "निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय"  पर अपना सही आलोचक चुनना और उसकी किन बातों पर ध्यान देना है, इसका भी सही चयन करना बेहद आवश्यक है। एक बार हमारे विचारों और जीवन पथ का विचलन हुआ तो समझिये फिर सही राह पर आगे बढ़ना कितना  कठिन हो जाएगा।


अक्सर देखा जाता है बेहतर विकल्पों और खुलेपन की चाह के चलते कई लोग शहर,समाज, अपने देश तक से पलायन कर जाते हैं। हर व्यक्ति ऐसे समाज मे रहना चाहता है जहां वह खुश रह सके, अपने मन का कर सके,जहां उसका विकास हो सके। वह अपने जीवन में अपने निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र हो, जहां उसकी निजता का सम्मान हो। आलोचनात्मक रवैयों और थोपे गए विचारों और नियमों , मापदंडों से दूर वो अपनी पूर्णता में खुलकर जी सकें। आज़ादी का एक मतलब खुलकर, अपराध मुक्त और सम्मान भाव से, बिना किसी की आज़ादी में ख़लल दिए ,थोड़ी सी दूरी बनाए रख कर सबके साथ और सबको साथ लेकर आगे बढ़ते जाना भी है।

एकता कानूनगो बक्षी

दुनिया मेरे आगेः निजता की अदृश्य लकीर-https://www.jansatta.com/duniya-mere-aage/duniya-mere-aage-invisible-image-of-human-privacy/1126963/

Tuesday, July 30, 2019

कविता /एक दिन ( नईदुनिया के तरंग परिशिष्ट में -28 जुलाई 2019)

 नईदुनिया के तरंग परिशिष्ट में कविता का प्रकाशन हुआ है। आप भी पढ़ें।

कविता
एक दिन

एक दिन
खेलूँगी बहुत देर तक
तुम्हारे साथ

तुम्हारे साथ ही
कोहरे की रजाई हटा देखूंगी
पहाड़ो को पार करते हुए
सूरज की लंबी कूद

दिन भर धूप और छांव जैसा
नृत्य करेंगे मिलकर
गौरया के साथ

बहरूपिए बादलों में ढूंढेगे अपनों को
और कभी खुद का बिम्ब देख
लगाएंगे ठहाके

गुलाबी शाम का स्वागत करेगे
रंगोलियाँ बना कर आसमान में

टिमटिमाते तारों की गुटबाजी
और चांद की खूबसूरती को
निहारते रहेगे देर तक

धूल और धुंए से मुक्त हो
निर्मल मन से 
चहकते रहेंगे बच्चों की तरह
एक दिन।
****

एकता कानूनगो बक्षी






कौशल के साथ कला (जनसत्ता 20 जुलाई 2019)

जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।
दुनिया मेरे आगे

कौशल के साथ कला

कोई माने या न माने लेकिन बचपन में हम सभी लोग कलाकार जरूर होते हैं। घर की दीवारों पर, कॉपी के पन्नों पर, घर आँगन में लगी फर्शियों या मुहल्ले की डामर वाली काली सड़को पर पेन्सिल,चाक या कोयले से हम सबने आड़ी तिरछी लकीरे अवश्य उकेरीं होंगीं। कभी मुस्कुराते, कभी रोते चेहरे बनाए होंगे, कम से कम एक चित्र तो जरूर ही हर बच्चा अपने बचपन के दिनों में बनाता है जिसमें दो पहाड़ों के बीच से सूरज निकल रहा होता है, नदी होती है, नदी में नाव और किनारे पर एक झोपडी, पास में एक खजूर का पेड़ और आकाश में कुछ पक्षी उड़ रहे होते हैं।

कभी-कभी बस यूं ही स्कूल से पैदल लौटते हुए घर लौटने के उत्साह में अपने कदमो को अपनी ही धुन पर आगे पीछे गोल घुमाते हुए नृत्य की खूबसूरत मुद्रा बनाने लगते है। और  कभी स्कूल की कोई कविता या गीत गुनगुनाने लगते हैं।कभी मजे मजे में कोई झूठी या काल्पनिक कहानी या कोई तुकबंदी गढ़कर दोस्तों के बीच रोब झाड़ने लगते हैं।

क्या कुछ नही कर रहे होते हम बचपन में और हमारे  आस पास के लोग हमारी छोटी छोटी हरकत पर मंत्रमुग्ध हो जाते और विश्वास दिला देते हैं कि हम अद्भुत है और कुछ बहुत अच्छा कर रहे। हालांकि कुछ जागरूक माता पिता बच्चों में छुपी प्रतिभा को पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयास भी करते हैं लेकिन ज्यादातर नन्हे कलाकारों का फ़न परिवार में अभावों और ज़रूरतों के बोझ तले बचपन में ही घुटने टेक देता है, लेकिन यह भी सच है कि कुछ ऐसे भी होते हैं जहां अभाव की उपस्थिति ही मानो उनके जुनून को और रफ्तार दे देती है। और इन्हें ही शायद ‘धूल में खिला फूल’ कहा जाता है।

किसी भी व्यक्ति के भीतर मौजूद यही कलाकार एक तरह से उसकी एक ऐसी पूरक ऊर्जा  है जो उसे हर तरह की परिस्थिति में संघर्षों से मुकाबला करने की शक्ति देने का काम करती है। काम को ख़ूबसूरत तरीके से करने का हुनर और परिणाम को बेहतर बनाने में सहयोग करती है।

ज़रूरी नही की हर बच्चा बड़ा होकर एक महान और सफल कलाकार ही बने पर ये बहुत ज़रूरी है कि हम उसे ऐसा वातावरण उपलब्ध कराएं कि वह कलम ,चाक या कोयले से ही सही मगर मनचाहे चित्र बनाता रहे, स्कूल से लौटते हुए खुशी के गीत गाता चले ,पैर थिरकते रहें, हर दिन कुछ नया रचने की कोशिश करे ।

ये जो निरर्थक सी दिखने वाली चीज़े हैं असल मे जीवन का सबसे बड़ा अर्थ उन के भीतर ही छुपा होता है। अपने रोज़मर्रा के कामो में भी अगर अपने भीतर के कलाकार को हम प्रवेश करने की अनुमति देते रहेंगे तो यकीनन वो काम बचपन की तरह ही अद्भुत तो होगा ही साथ ही थकावट और ऊब से मुक्ति देकर काम को बहुत ख़ूबसूरत बनाने का माध्यम भी बन जाएगा।

महान चित्रकार पाब्लो पिकासो ने कहा है कि "सभी बच्चे कलाकार होते हैं, समस्या तो यह है कि बड़े होने के बाद भी कैसे कलाकार बना रहा जाए"। इस छोटे से वाक्य में एक बहुत बड़ी चिंता है और गहन चिंतन है। हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में असल में कला बहुत निचले स्तर पर आती है क्योंकि बड़े से बड़े कलाकार पर भी अपनी और अपने परिवार की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति सर्वोपरि हो जाती है। कोई बिरला ही होता है जो अपनी कला से अर्जित धन से परिवार या अपना पेट भर पाता है। और उस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता काफी संघर्षो  से भरा होता है। इसलिए ये बहुत आवश्यक हो जाता है कि या तो हमने आर्थिक रूप से संपन्न किसी समझदार परिवार में जन्म लिया हो या फिर हमारे पास जीवन यापन करने के लिए कोई और रोजगार भी उपलब्ध हो, जिस के बल पर हम हमारे कलाकार और कला को ज़िंदा रख सकें।

कलाकार व्यक्ति का मन बहुत संवेदनशील होता है. निराशा और असफलता में वह बहुत बेचैन और अपने आप को काफी असहज महसूस करने लगता है। जबकि वह एक रचनात्मक और महत्वपूर्ण काम से जुड़कर दुनिया को परोक्ष रूप से ख़ूबसूरत बनाने में संलग्न होता है।  कला और कलाकार के जूनून की ही ताकत होती है सामान्यतः वह ऐसे मौकों से अपनी कठिनाइयों से पार पा ही लेता है। यदि ऐसा नहीं हो पा रहा तो समाज के अन्य लोगों का दायित्व  है कि वे ऐसे प्रतिभावान व्यक्तियों को  संघर्ष के दौर में संबल दे ।


कितना अच्छा हो अगर रोजगार के इन गैर पारंपरिक और अलग तरह के क्षेत्रों को भी बढ़ावा दिया जाए।  प्रतिभावान लोगों को सही मंच, सही मेहनताना मिले। नन्हे कलाकारों को भी न्यूनतम खर्च या निशुल्क प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिले। कौशल विकास के साथ साथ सरकारें ‘ललित और रचनात्मक कला विकास’ पर भी योजनाएं बनाएं तो शायद बेरोजगारी के बड़े संकट को कुछ हद तक इस तरह भी कम करने में मदद मिल सके। ऐसे में आजीविका का चुनाव हर व्यक्ति अपने कौशल को देख कर करेगा। किसी एक व्यवसाय पर बढ़ते बोझ और भेड़ चाल पर भी लगाम लगाई जा सकेगी।

हालांकि ऐसी कई संस्थाएं हैं जो समय समय पर कार्यशाला आदि लगा कर बच्चों तथा युवाओं की प्रतिभा को पहचानकर  प्रोत्साहित करती रहती हैं लेकिन जब तक इस तरह कलाओं को  केवल हॉबी के रूप में देखा जाएगा तब तक इस का पूरा लाभ नही मिल सकता। कला और कलाकार को नागरिक जीवन की मुख्यधारा में ज्यादा घनिष्टता से लाना शायद एक सही पहल होगी।

एकता कानूनगो बक्षी


सिनेमा के सहारे(जनसत्ता 17 जून 2019)

जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।
दुनिया मेरे आगे

सिनेमा  के सहारे
एकता कानूनगो बक्षी


‘साहित्य और सिनेमा हमारे समाज का दर्पण है’ यह वाक्य हमे स्वतः ही विद्यालय में लिखे निबंन्ध की याद दिला देता है। हालांकि उस समय हम सिनेमा की बारीकियों से अनभिज्ञ होते हैं। सिनेमा का इतिहास, फ़िल्म बनने की प्रक्रिया ,यहां तक कि नायक नायिका की अभिनय कला और उनके संघर्षों को भी हम नही समझ पाते थे फिर भी निर्धारित शब्दो की सीमा में हमारा निबंध तैयार हो ही जाता था जो परीक्षा में हमारे अच्छे अंक सुनिश्चित कर देता है। यकीनन जिस विषय को शिक्षा प्रणाली में इतना महत्व दिया जाता है और उस पर निबंध लिखवाया जाता है उसका जीवन में कोई व्यावहारिक उपयोग संदिग्ध ही रहता है। मुझे लगता है कि उसके लिए उस वक्त विद्यार्थियों द्वारा अपेक्षित शोध और मेहनत नहीं की जाती.  एक मात्र उद्देश्य परिक्षा में अच्छे अंक अर्जित करना ही रहता है।

दरअसल, जब तक कि हम यह ना समझ लें कि वाकई में सिनेमा क्या है , उसका इतिहास क्या है , कैसे बनती है,  कैसे कोई इंसान अपने मूल रूप से हटकर एक दम अलग किरदार निभाता है , कैसे वो किरदार कलाकार के भीतर तक समाहित हो जाता है, कैसे कहानियां रची जाती है ,कैसे किसी फिल्म के डायलॉग अमर हो जाते हैं। बिना ये सब जाने और  कई तरह की  भिन्न-भिन्न  फ़िल्में देखे बिना, हम कैसे उस पर सटीक निबंध लिख सकते हैं या यह भी कैसे कहा जा सकता है कि ‘ सिनेमा समाज का दर्पण है’।

मेरा मानना है कि फिल्मे भी अब पाठ्यक्रम का एक ज़रूरी हिस्सा बनें। जिसमें अलग अलग  समय और देश मे बनी महान फिल्मों को दिखाया जाए. उस पर सामाजिक,आर्थिक के साथ राष्ट्रीय मुद्दों का विश्लेषण भी किया जाए। कई विद्यालयों में पहले और आज भी फिल्मे दिखाई जाने की परम्परा रही है पर अधिकतर यह केवल वार्षिक समारोह में मात्र मनोरंजन के लिए ही विद्यार्थियों के समूह के बीच प्रदर्शित की जाती हैं. विद्यालय आज भी स्तरीय सिनेमा की पहुच से काफी दूर दिखाई देते हैं । हालांकि प्रबंधन की पढाई में ‘लगान’ जैसी कुछ फिल्मों के सन्दर्भों का प्रयोग होता रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता ।

फिल्मों और उनमें बताई, दिखाई बातों का गहरा असर इंसान के मन, मस्तिष्क में प्रत्यक्ष रुप से होता है।  रेडियो और प्रिंट मीडिया की तरह सीमित नही होकर सिनेमा के पास पर्याप्त अवसर होते हैं किसी भी बात को अभिव्यक्त करने के। सिनेमा के जरिये हम अपने जैसे ही किरदारों को बोलते सुनते अलग-अलग परिस्थितियों से उलझते संभलते देख सकते है। हम समाज मे उपस्थिति अलग अलग चरित्र के लोगो का अध्ययन कर सकते हैं। हम भिन्न भिन्न क्षेत्र की संस्कृति ,विचारधारा और  वहां के लोगो के रोज़मर्रा के जीवन और संघर्षों को देख सकते है। समाज में प्रचलित विभिन्न भाषाओं, भूषाओं और भोजन के बारे में अपनी जानकारी बढ़ा सकते हैं।  अलग अलग देश काल की खूबसूरतियों और तत्कालीन कुरीतियों को समझकर  संवेदशील और बेहतर इंसान बन सकते हैं।  इसके अलावा स्वस्थ मनोरंजन जीवन को  प्रफुल्लता से तो भर ही देता है।


सिनेमा को एक थेरपी की तरह भी देखा जा सकता है। हमारे जीवन के कुछ  दौर काफी संघर्षपूर्ण होते हैं। ज़रूरी नही की हमारे साथ  हमेशा कोई ऐसा साथी मौजूद हो जो हमारा उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करता रहे। ऐसे में  किताबें तो हमारी सब से अच्छी दोस्त होती ही हैं लेकिन फ़िल्में भी हमारे अकेलेपन को काफी हद तक कम कर देती हैं, विशेषकर नई टेक्नोलोजी के इस दौर में अपने कंप्यूटर और टीवी पर भी घर बैठे मनचाही फिल्मों का अवलोकन चौबीसों घंटे किया जा सकता है।  लेकिन सिनेमा देखने का भी एक व्यवस्थित तरीका होना ज़रूरी है और उसके पीछे कुछ मकसद भी होना चाहिए। केवल समय काटने के लिए कोई काम करना सही नही कहा जा सकता.  कोशिश हमेशा यही होना चाहिए कि खाली समय मे कुछ रचनात्मक काम किया जाए। अपने बहुमूल्य समय को लंबे समय तक सिर्फ बेकार के कामों में व्यर्थ गवाने से आगे चल कर अवसाद की स्थिति निर्मित हो सकती है। इसलिए काम शुरू करने से पहले उस सन्दर्भ में चाहे वह फिल्मावलोकन ही क्यों न हो पर्याप्त अध्ययन और मनः स्थिति का बनना बहुत जरूरी है।

ऐसे कई उदाहरण  हमारे समाज मे मौजूद है जहां फिल्मे देख कर और अपने मनपसंद कलाकारों से प्रेरित होकर लोगो का जीवन बदला है। मैं खुद एक दादी को जानती हूँ जो कि दादा के देहांत के बाद काफी निष्क्रिय हो गयी थीं। उनके परिवार के जागरूक सदस्यों ने थोड़ा अध्ययन कर के कुछ ऐसी फिल्मों की सूची बनाई और रोज़ उन्हें दोपहर में एक फ़िल्म दिखाई गई ऐसे में दादी की बोरियत तो दूर हुई  ही साथ मे उनके अंदर उन फिल्मों से प्रेरित हो कर एक बार फिर स्फूर्ति आ गयी और उन्होंने आगे के जीवन को पूरी तरह से स्वीकार कर फिर से जीवन की दौड़ लगाते ही अपनी नई सफल पारी की शुरुआत की।

विद्यार्थियों के लिए , युवाओ के लिए भी अच्छा सिनेमा बहुत ज़रूरी है जिस से की युवा असल जीवन के संघर्ष और हकीकत से समय रहते रूबरू हो सके। ताकि कम उम्र में आत्महत्या, मनोरोगों से वो दूर रह वह  स्वस्थ और प्रयत्नशील बने रह सके  ।ऐसी कई फिल्मे  है जो गिरकर उठना और संघर्ष करते रहना सीखाती है और साहसी भी बनाती है।

इस के अतिरिक्त पारिवारिक फ़िल्में जिन में गृहक्लेश दिखाए जाते हैं वे भी कभी कभार देख लेने में कोई हर्ज नहीं है ताकि सही समय पर पता चल सके कि कही हम भी अपने घर की खलनायिका या खलनायक तो नही बनते जा रहे।  कुछ फिल्मे सब के साथ बैठ कर देखना चाहिए जिसमें पूरा परिवार मिलकर साथ-साथ हंस पाए और परिवार में प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होता रहे।

हम जानते हैं सिनेमा निर्माण एक दुसाध्य काम है. अच्छी फिल्म बनाने में काफी मेहनत लगती है. कई लोगो का इसमे योगदान रहता है. अनेक कलाकार और टेक्नीशियन इस से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं इसलिए ज़रूरी है कि फिल्मो को सही  मंच पर ही देखे, गैरकानूनी तरीके से नही। और ये भी ज़रूरी है कि थोड़ा शोध करके अच्छी और सार्थक फिल्मे देखी जाएँ।


एक अच्छी फिल्म हम को  बस कुछ घंटे का मनोरंजन ही नही देती वो हमारे साथ जीवन भर रहती है.  हमारी सोच , हमारे हौसले , हमारे शब्दो को नई उड़ान देती है ।  तो आइए जल्दी ही लिस्ट बनाये कुछ नायाब फिल्मों की, जो हमे नया नजरिया और सही  दिशा दे... एक सच्चे हितचिन्तक की तरह जीवन को इन्द्रधनुषी रंगों से भर दे..

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वीणा में पापा(श्री ब्रजेश कानूनगो) के साथ कविता । जून 2019 अंक



वीणा में पापा के साथ कविताएँ प्रकाशित होने से वीणा का यह जून अंक मेरे लिए खास बन गया है । धन्यवाद श्री राकेश शर्मा सर राकेश शर्मा।





बेटी का पत्र माँ के नाम ( सुबह सवेरे 12 मई 2019)

मदर्स डे की शुभकामनाओं के साथ, सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
बेटी का पत्र माँ के नाम
एकता कानूनगो बक्षी

सुनो माँ !
मुझे तुम्हारे हाथ का बना भोजन अब नहीं खाना
भले ही दुनिया के सारे पकवान
तुम्हारे हाथों से बने खाने के सामने फीके हैं
पर अब मुझे नहीं खाना।

माँ !
इन दिनों
तुम्हारे हाथ का स्वाद स्वतः
मेरे हाथ मे चला आया  है
आये भी क्यों ना
जब अपनी पूरी सृष्टि तुमने
मुझ पर न्यौछावर कर डाली है
मेरी खुशियों
मेरे दुःखों की रेखाएं
नज़र आती है अक्सर तुम्हारे चेहरे पर।
जैसे मैं ही जीवन का उद्देश्य हूँ तुम्हारा
पर बस अब और नहीं।

अब तुम खुद के लिए जीयो माँ
फिर से बचपन मे लौटो
एक बार फिर से नए शौक पालो
और खो जाओ उनमें
दुनिया की सैर करो
नए लोगों से मिलो
खुलकर मुस्कुराओ
अपने अनुभवों से
किसी के जीवन को उजालों से भर दो
पुरानी ज़िम्मेदारियां
अपने सारे बचे काम भूल जाओ अब।

जैसे हर बार तुम हो मेरे लिए,
मैं भी हूँ ना तुम्हारे लिए
तुम्हारी छोटी सी बेटी नहीं
जिद्दी माँ।


चुनाव और जीवन (जनसत्ता 1 मई 2019)

जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

चुनाव और जीवन

एकता कानूनगो बक्षी

अपने जन्म के साथ ही हम सब बहुत सी क्रियाएँ स्वतः करने लगते हैं. जैसे सांस लेना और सांस छोड़ना ,रोना, हँसना, हाथ पैर हिलाना, खाना पीना, और भी कई तरह से हम ही नहीं बल्कि हर एक प्राणी इन क्रियाओं के माध्यम से ये सिद्ध करने लगता है की वह जीवित है  तथा अपनी उपस्थिति किसी न किसी क्रिया के माध्यम से महसूस कराते हुए जीवन में आगे बढता जाता है। इसके अलावा कुछ बातो को जीवन में हम चुनकर भी अपना लेते हैं. अपने नैसर्गिक माता-पिता को चुनने के अलावा हमारे पास लगभग सभी चीजों को चुनने का विकल्प मौजूद होता है.

उम्रभर हम चुनाव के इस महत्वपूर्ण विकल्प का उपयोग अपने जीवन को संवारने में करते रहते हैं. हमारे संघर्षों की सफलता असफलता और जीवन का सौंदर्य हमारे इसी विकल्प के ठीक और बेहतर उपयोग पर निर्भर करता है. चुनने की थोडी बहुत कोशिश हम सब काफी हद तक जीवन की शुरुआत से करने लगते हैं. लेकिन अनुभव,शिक्षा,नैतिक- अनैतिक मूल्यों के ज्ञान के साथ साथ चयन की बेहतर समझ भी विकसित होती जाती है.

रोजमर्रा में हर एक क्षण हम किसी न किसी बात का चुनाव कर ही रहे होते हैं.  कुछ चुनाव हम ऐसे ही करते जाते हैं कि पता ही नहीं चल पाता. हमारे परिधान, आचरण, दोस्त, प्रेम,  बोलचाल आदि स्वतः शामिल होते जाते हैं लेकिन कुछ का चुनाव हम ध्यानपूर्वक करने की कोशिश करते हैं.  अपनी शिक्षा, व्यवसाय,खान पान, जीवन साथी आदि चुनते हुए काफी सावधानी बरतनी होती है क्योंकि चुनाव की यह प्रक्रिया हमारे सुखों और खुशहाली का आगे का रास्ता सुनिश्चित करती  है.

जीवन के शुरुआती दौर में चुनाव करना काफी सुगम रहता है क्योंकि हमारे परिवार के बड़े ही हमारे लिए सोच समझ कर निर्णय लेते रहते हैं और उन्ही का नजरिया एक तरह से हमारे चयन का आधार बन जाता है, जीवन को लेकर एक दृष्टिकोण भी कुछ समय के लिए उसी के अनुरूप बन जाता है. सच तो यह है कि यह शुरुआती प्रभाव अधिक समय तक बना नही रहता है,जैसे जैसे हमारी उम्र और अनुभव का दायरा विस्तृत होता जाता है चुनाव में हम अपने आप पर निर्भर होते जाते हैं. देश-काल और परिस्थिति भी काफी हद तक हमारे निर्णयों पर खासा असर डालती है.

कहा जाता है कि हमारा काम और हमारी संगति हमारे व्यक्तित्व का आईना होती है. इसी तरह हमारे चुनाव करने की प्रवत्ति भी हमारी जीवनदृष्टि, तार्किकता और सौंदर्यबोध का बिम्ब होती है. हमारे द्वारा लिया गया निर्णय हमें परिभाषित करता है. हमारे लिए गए छोटे से छोटे निर्णय का असर हमारे वर्तमान और भविष्य के साथ ही हमारे आस पास के लोगों और व्यवस्था पर भी असर डालता है. ऐसे में सही निर्णय लेना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी कही जा सकती है.

जब हम चुनाव करते है तब हमारे सामने बहुत सी समस्याएं होती है.  सर्वप्रथम तो कई विकल्पों का एक साथ उपलब्ध होना और उस मे से सब से बेहतर का चुनाव करना जो सबके लिये हितकारी हो. अगर विकल्प अधिक हैं तो हर विकल्प के बारे में सटीक जानकारी और उसके साथ ही तुलनात्मक विश्लेषण करना भी बेहद ज़रूरी हो जाता है.

हमारी सुनने और देखने की शक्ति कितनी ही सक्षम क्यों न हो पर कभी कभी बिना विचारे, बिना विश्लेषण विषय की गहरी पड़ताल किए किसी भी बात और तथ्य को मान लेना, हमारी सब से बड़ी मूर्खता का परिचायक ही होगा । अक्सर हम दूसरों के शब्दों को उनके विचारों को अपना मान लेते है और भुलावे में आकर उनकी ही भाषा हम भी बोलने लगते हैं. अंग्रेज़ी में इसे ब्रेन वाश भी कहा जाता है.  ये एक तरह से हमारा बौद्धिक आलस्य ही है जिस से हम बस पकी पकाई खिचड़ी खाने का मन बना लेते हैं और इस तरह अपने जीवन की गाड़ी का स्टेयरिंग  किसी और के हाथ मे दे देते है. हमारे लिए हम से बेहतर निर्णय कोई और नही ले सकता.  चाहें तो हम सब से राय ज़रूर ले सकते हैं पर आखिरी निर्णय तो हमारा ही होना चाहिए, वो भी काफी विचार और अध्ययन के बाद.

जब जब आप प्रजातंत्र में अपनी सरकार बनाने के लिये चयन की इस प्रक्रिया से गुजरते हैं तब जिम्मेदारी और अधिक बढ जाती है. अगर आप किसी निश्चय पर आ भी गए हैं तब भी एक और वैचारिक प्रक्रिया बचती है. वह यह कि क्या आपका चुनाव आपके नैतिक मूल्यों पर खरा उतरता है? क्या आपका चुनाव सबके हित में है? क्या उसका सकारात्मक असर पंक्ति में आखिरी खड़े व्यक्ति पर पड़ेगा. क्या विकल्प का यह चयन आप अपनी कमजोरियों, स्वार्थ या किसी लाभ की आकांक्षा से तो नहीं कर रहे । अब्राहम लिंकन ने कहा था कि ‘मेहनत से कमाए 4रुपये ,चोरी से कमाए हज़ार रुपये से कही अधिक मूल्यवान होते हैं.’



सच तो यह है कि जब हम किसी भी तरह का चुनाव करते हैं तब हमारा उद्देश्य बेहतरी की दिशा में होना चाहिये. सही लिये गये निर्णय का असर प्रत्यक्ष रूप से दिखने भी लगता है. उस सही निर्णय की वजह से हो सकता है महल खड़ा न हो पाए पर एक स्वस्थ और खुशहाल वातावरण ज़रूर बनता है और उस से भी कहीं बेहतर इंसानियत ,सौहार्द, शिष्टाचार, शिक्षा ,और सभ्य समाज की भव्य इमारत की नींव दिखने लगती है जो सुनिश्चित करती है कि हमारा चुनाव सही है और बहुमूल्य भी. सोचिये क्या हम कर पा रहे हैं कुछ ऐसा ही !




Monday, March 25, 2019

बहुमूल्य ग्यारह रुपये ( नईदुनिया के नायिका परिशिष्ट में 23 मार्च 2019)

नईदुनिया के 'नायिका' परिशिष्ट में मेरी रचना पढ़ें।

संस्मरण/लघुकथा
बहुमूल्य ग्यारह रुपये
एकता कानूनगो बक्षी

दादी सुबह से ही अपने बटुए और बैग को टटोले जा रही थी।ऐसा रोज़ नही होता था कुछ खास दिनों को ही ऐसा होता था।
बहू वसुधा ने उनकी बैचेनी के बारे में पूछा तो बटुए को टटोलते हुए, दादी ने कहा- 'अरे लाड़ी, खुल्ले रुपये नहीं मिल रहे हैं।'
दादी की बहू उनकी बहुत लाड़ की थी इसलिए उसे वो हमेशा लाड़ी ही बुलाते।इनका रिश्ता माँ बेटी का ही था।
दादी ने वसुधा को  50 रुपये का नोट देते हुए कहा 'मुझे 50 रुपये के छुट्टे दे दो।  मुझे 10 रुपये चाहिए एक का सिक्का तो है मेरे पास।'

वसुधा ने 50 रुपये का नोट उन्हें लौटाते हुए कहा 'अरे ये 50 रुपये तो आप ही रखो,यदि बाजार से  कुछ लाना है तो मुझे बताओ आप।'
'नही कुछ नही लाना , अंकिता का कल परीक्षा परिणाम आ रहा है  ना! अंकिता को देना हैं।' दादी ने कहा।

वसुधा को दादी की हमेशा की आदत याद आ गयी। उनकी आदत थी जब भी घर में किसी की सालगिरह होती, त्योहार होता, घर पर कोई उनसे मिलने आते तो वो पहले ही 11 रुपये का इंतज़ाम कर के रख लेतीं और अच्छे कपड़े पहन तैयार हो जातीं।

जैसे ही कोई उनके आशीर्वाद के लिए चरणस्पर्श करता तो वो उनका हाथ सिर पर स्नेह और अधिकार से रख देतीं और खूब सारा आशीर्वाद देते हुए 11 रुपये थमा देतीं।

वह ग्यारह रुपये शायद जादुई रुपये होते थे जिनमें वे स्नेह और आशीष का मंत्र फूंक देतीं थीं। उनके अनुसार दस के साथ एक जोड़ना अनिवार्य होता था ।शून्य जीवन और विचारो में कभी नही आना चाहिए।इसलिए हमेशा ग्यारह का ही उपहार देतीं।
दादी के उपहार में अगर कुछ शून्य होता था तो वह था स्वार्थ और लालच।  उन ग्यारह रुपये से कभी कुछ खास खरीदा भी नहीं जा सकता था। यही वह मंत्र था जिसके कारण उनकी शुभकामनाएं और भावनाएँ ही सर्वोपरि हो जाया करतीं थीं।

मंहगाई के बढ़ने से वस्तुओं के दाम तो बढ़े ही पर उसके साथ ही स्नेह और घनिष्टता भी वस्तुओं की कीमत पर निर्भर होती गयी। बंद लिफाफो में रखे नोटो, महंगे उपहारों और बढ़ चढ़कर दी जाने वाली कृत्रिम शुभकामनाओं के बीच दादी के वे ग्यारह रुपए, स्नेह और आशीष में सिर पर रखे उनके हाथ के आगे सब कुछ बहुत कम है।

डॉलर के मुकाबले रुपया कितना भी चढ़ता उतरता रहा। ग्यारह रुपयों का उनका आशीर्वाद सदैव एक सा बना रहा।रिश्तों की गर्माहट और सच्चे आशीर्वाद के दादी के  वे ग्यारह रुपये बेशकीमती उपहारों और औपचारिक  बधाइयों से कई गुना बहुमूल्य हैं।

सदभाव के रंग ( जनसत्ता में 12 मार्च 2019)

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

माह के बहाने  जीवन का ‘मार्च’

एकता कानूनगो बक्षी

साल के हर महीने की अपनी एक अलग पहचान और विशेषता होती  है। मार्च को हम व्यस्त महीना कह सकते हैं. आदमी तो आदमी प्रकृति भी इन दिनों अपने को संवारनें, व्यवस्थित करने में सक्रिय हो जाती है। पतझड़ के बाद पेड़ों के नव पल्लवन और खिलने,फलने का ख़ूबसूरत समय मार्च के आगमन के साथ शुरू हो जाता है।जंगलों में भी पलाश अपने रंग बिखेरने लगता है। मौसम के भी बदले हुए मिज़ाज दिखाई देते हैं, कभी दिन भर की  तीखी धूप और सुबह शाम की सुकून भरी पुरवाई।



यही वक्त है जब विद्यार्थियों की साल भर की मेहनत दांव पर लगी होती है. कुछ विद्यार्थी साल भर के सबक को दोहराने में व्यस्त रहते हैं तो कुछ के ह्रदय परीक्षा केन्द्रों पर तैयारी के बावजूद  धड़कते रहते हैं। इसी तरह की सरगर्मी का माहौल इन दिनों सरकारी और निजी कार्यालयों में भी दिखाई देने लगता है।

सभी जानते हैं मार्च वित्तीय वर्ष की समाप्ति का माह भी होता है तो  सारे एकाउंट्स में ‘डेबिट-क्रेडिट’ करते हुए क्लोज़ भी करना रहता है। जब हम एकाउंट को क्लोज करते है तो उस प्रक्रिया से पूरे साल का लाभ-हानि भी हमारे सामने आ जाता है। एक तरह से कहा जा सकता है कि मार्च का महीना साल भर में ‘क्या खोया, क्या पाया’ की तस्वीर हमारे जीवन के कैनवास पर चित्रित करने का काम भी कर जाता है।



देखा जाए तो हमारे जीवन में भी कई एकाउंट्स है जिनका समय समय पर अवलोकन करते रहना चाहिए। क्योंकि इनका भी सही रख रखाव और संतुलन पूरे जीवन की बैलेंस शीट को प्रभावित करता है। जैसे कि हमारी सेहत , परिवार , हमारी देनदारियां, हमारे प्रेम और स्नेह का आदान-प्रदान जैसे खातों का संतुलन भी बनाये रखना बहुत आवश्यक है और साथ ही काफी चुनोतीपूर्ण भी है।



दुनिया ही नहीं हमारे जीवन मे भी अर्थशास्त्र का बहुत महत्व है। हमारी प्रत्येक जरूरत का निदान अंततः पैसों अर्थात धन की व्यवस्थित कार्ययोजना से ही निकलकर आता है। धन या संपत्ति को लेकर अनेक पारिवारिक मतभेद ,विवाद भी अक्सर देखने को मिलते हैं। ऐसे में लगता है कि कही ना कहीं  आर्थिक नियोजन के सन्दर्भ में हमारे दृष्टिकोण को सबको पुनर्विचार करते रहना चाहिए।

सामान्यतः हम लोग अपनी संपत्ति का निर्माण या बचत हमारी मूलभूत ज़रूरते पूरी करने के लिए करते हैं। मोटे रूप से  भोजन, आवास, पहन ने को वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित  भविष्य ही हमारी आगे की जरूरतें होती हैं। उसके उपरांत शेष धन का निवेश जनकल्याण के कार्यो में या फिर खुद के विकास के लिए करना काफी हद तक ठीक होता है। इसके अतिरिक्त धन का संचय तो  लालच ही कहलाएगा। अब देखिए !  आपको भूख है दो  रोटियों की पर आप चार  और अतिरिक्त खायेंगे  तो आप को  अजीर्ण होना स्वाभाविक है। अगर आप वो चार रोटियाँ किसी ज़रूरतमंद को दे देते हैं तो आपको मन में संतोष होगा और सुख शांति तो मिलेगी ही लेकिन  आपके आस पास की दुनिया को और ख़ूबसूरत बनाने का आप प्रयास भी करेंगें।

ज़रूरतों के हिसाब से सादगीभरा जीवन जीने से अपूर्व सुकून जीवन मे बना रहता है और हम व्यथित करने वाली अनेक परिस्थितियों से भी बच पाते है। पर इसका मतलब ये बिल्कुल भी नही की हम महत्वाकांक्षी न रहे। खूब मेहनत करें, जीवन में सीढियां चढ़ते जाएँ लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य केवल धन या आधिपत्य प्राप्त करना न रहे बल्कि उद्देश्य उस से कहीं अधिक बेहतर, सर्व कल्याणकारी हो जिससे आपका जीवन केवल ‘मैं’ तक नहीं बल्कि ‘हम’ के व्यापक क्षितिज को स्पर्श कर सके।

कहने का तात्पर्य यह है कि घर के हर सदस्य को बुनियादी आर्थिक समझ होना आवश्यक है। सभी को शिक्षित करना एक जटिल प्रक्रिया है. यह बेहद ज़रूरी है कि समझाइश के केंद्र में रुपये पैसे की  बात न होते हुए ज़रूरतों और बेहतर विकल्पों की बात की जाए।

एक हिदायत जो घर के बड़े बुजुर्ग  अक्सर छोटों से कहते हुए सुने जा सकते है कि   ‘ट्यूब लाइट बंद करो बिल बहुत आ जाएगा’. यह एक सीमित कथन है.  जब कि होना यह चाहिए कि ऊर्जा के नुकसान से व्यापक रूप से क्या असर होता है उस बारे में विस्तार से बात की जाए। इसके साथ ही चीज़ों को सहेजना, उसकी कद्र करना, रखरखाव करना, पुनः उपयोग करना.   इस तरह की शिक्षा जो शायद स्कूलों कालेजों में शायद न मिले पर सीधे तौर पर हमारे घरों की आर्थिक व्यवस्था और हमारे देश की अर्थव्यस्था पर गहरा असर छोड़ती हैं। बाज़ारवाद और विज्ञापनों से अति प्रभावित न होकर विवेकपूर्ण क्रय विक्रय करना भी धन का सही प्रबंधन सुनिश्चित करता है ।


व्यापक  दृष्टिकोण का होना हर क्षेत्र में सफल होने के लिए हम सभी के लिए बहुत जरूरी है. सीमित सोच और तात्कालिक लाभ हमे उस समय तो सशक्त और खुशहाल बना सकता है किन्तु भविष्य की स्थायी खुशी और सम्पन्नता की गारंटी नहीं होता। धन, संपत्ति को केवल  ज़रूरत पूर्ति की तरह ही देखा जाए तो बेहतर होगा। जीवन का असली मजा तो सोच-समझकर सबको साथ लेकर  ‘मार्च’ करने में ही आता है. जब बात मार्च  महीने की हो तो यह महीना तो खासतौर पर हर्ष और उल्लास के पर्व होली को भी अपने साथ लेकर आता है। उमंग, उल्लास,प्रेम, भाईचारे और सद्भाव के इन्द्रधनुषी रंग बिखरने की शुरुआत इसी माह की आज की तारीख से क्यों न शुरू कर दी जाए इस बार भी। यही हमारी परम्परा भी रही है। 

http://epaper.jansatta.com/m5/2065183/Jansatta/12-March-2019#page/6/1

गुनगुनाता हौसला / रविवारीय नईदुनिया के तरंग में ( 10 मार्च 2019)

आज रविवारीय नईदुनिया के तरंग में मेरी लघुकथा पढ़ें।

लघुकथा
गुनगुनाता हौसला
एकता कानूनगो बक्षी

सुधा दोपहर की नींद से अचानक से उठ बैठी। वॉश एरिया में आज कोई गुनगुना रहा था। यह समझने में उसे देर नहीं लगी कि शायद ये तो शीतल ही है,जो काम करते करते गुनगुनाती रहती है।

शीतल उनके घर में बर्तन साफ़ करने का काम करती थी।  स्वभाव से वह शांत,मृदुभाषी तो थी ही, अपने काम और व्यवहार से कुछ ही समय में उसने सबका मन भी मोह  लिया था।

देहात से आये अशिक्षित माँ पिता की संतान होने के बावजूद वह  शिक्षा के महत्व को समझती थी। इसलिए उसने आठवीं तक शिक्षा पूरी कर ली थी और अब काम के साथ साथ आगे की पढ़ाई जारी रखने की तैयारी भी कर रही थी।

अभी दो साल पहले उसकी शादी हो गयी तो अपना सारा काम अपनी माँ को सौप कर वह  ससुराल चली गयी। कुछ समय पहले अपने नवजात शिशु से मिलवाने भी वह सुधा के घर आई थी।

लंबे अंतराल के बाद माँ की बजाए आज शीतल वापस काम पर आई थी तो सुधा के कदम सहसा ही वाश एरिया की तरफ बढ़ गए, जहां शीतल अपने काम को हमेशा की तरह तल्लीनता से गुनगुनाते हुए अंजाम दे रही थी।

सुधा ने मुस्कुराते हुए शीतल से पूछा-'अरे शीतल कैसी हो? बहुत दिनों बाद आना हुआ इस तरफ।' शीतल ने चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरते हुए जवाब दिया-'मैं अच्छी हूँ आंटी, अब रोज़ मैं ही आऊँगी।'  'क्यों ससुराल नही जाना है क्या?'
'नही आंटी।'
'क्यो क्या हुआ?'  सुधा ने अपनी चिंता जाहिर की। 'अब आंटी क्या बताऊँ आपको! बहुत सारी परिस्थितियां है इसके पीछे, पर बस इतना है कि उनको मेरे जैसी लड़की नही चाहिए।'
'ओह ! फिर तुम्हारे बच्चे का क्या होगा?'  सुधा ने पूछा।

'मैं खुद ही अपने बच्चे की परवरिश करुँगी आंटी। मैंने आगे की परीक्षा के फार्म भी भर दिए हैं और सिलाई भी सीख रही हूँ और फिर ये काम तो है ही।'

सुधा और शीतल एक दूसरे को देख कर कुछ देर मुस्कुराते रहे।  फिर शीतल पुनः अपने काम मे लग गयी और गुनगुनाने लगी।

अबकी बार शीतल की स्वर लहरियां सुधा के अन्तःकरण में भी कम्पन पैदा करती रही देर तक।

ग्यारह रुपये (11 फरवरी 2019 ) नवभारत

आज नवभारत में मेरी लघुकथा पढ़ें ।

लघुकथा
ग्यारह रुपये
एकता कानूनगो बक्षी

दादी सुबह से ही अपने बटुए और बैग को टटोले जा रही थी।ऐसा रोज़ नही होता था कुछ खास दिनों को ही ऐसा होता था।
बहू वसुधा ने उनकी बैचेनी के बारे में पूछा तो बटुए को टटोलते हुए, दादी ने कहा- 'अरे लाड़ी, खुल्ले रुपये नहीं मिल रहे हैं।'
दादी की बहू उनकी बहुत लाड़ की थी इसलिए उसे वो हमेशा लाड़ी ही बुलाते।इनका रिश्ता माँ बेटी का ही था।
दादी ने वसुधा को  50 रुपये का नोट देते हुए कहा 'मुझे 50 रुपये के छुट्टे दे दो।  मुझे 10 रुपये चाहिए एक का सिक्का तो है मेरे पास।'

वसुधा ने 50 रुपये का नोट उन्हें लौटाते हुए कहा 'अरे ये 50 रुपये तो आप ही रखो,यदि बाजार से  कुछ लाना है तो मुझे बताओ आप।'
'नही कुछ नही लाना , कल परीक्षा परिणाम आ रहे  है ना! अंकिता को देना हैं।' दादी ने कहा।

वसुधा को दादी की हमेशा की आदत याद आ गयी। उनकी आदत थी जब भी घर में किसी की सालगिरह होती, त्योहार होता, घर पर कोई उनसे मिलने आते तो वो पहले ही 11 रुपये का इंतज़ाम कर के रख लेतीं और अच्छे कपड़े पहन तैयार हो जातीं।

जैसे ही कोई उनके आशीर्वाद के लिए चरणस्पर्श करता तो वो उनका हाथ सिर पर स्नेह और अधिकार से रख देतीं और खूब सारा आशीर्वाद देते हुए 11 रुपये थमा देतीं।

वह ग्यारह रुपये शायद जादुई रुपये होते थे जिनमें वे स्नेह और आशीष का मंत्र फूंक देतीं थीं। उनके अनुसार दस के साथ एक जोड़ना अनिवार्य होता था ।शून्य जीवन और विचारो में कभी नही आना चाहिए।इसलिए हमेशा ग्यारह का ही उपहार देतीं।
दादी के उपहार में अगर कुछ शून्य होता था तो वह था स्वार्थ और लालच।  उन ग्यारह रुपये से कभी कुछ खास खरीदा भी नहीं जा सकता था। यही वह मंत्र था जिसके कारण उनकी शुभकामनाएं और भावनाएँ ही सर्वोपरि हो जाया करतीं थीं।

मंहगाई के बढ़ने से वस्तुओं के दाम तो बढ़े ही पर उसके साथ ही स्नेह और घनिष्टता भी वस्तुओं की कीमत पर निर्भर होती गयी। बंद लिफाफो में रखे नोटो, महंगे उपहारों और बढ़ चढ़कर दी जाने वाली कृत्रिम शुभकामनाओं के बीच दादी के वे ग्यारह रुपए, स्नेह और आशीष में सिर पर रखे उनके हाथ के आगे सब कुछ बहुत कम है।

डॉलर के मुकाबले रुपया कितना भी चढ़ता उतरता रहा। ग्यारह रुपयों का उनका आशीर्वाद सदैव एक सा बना रहा।रिश्तों की गर्माहट और सच्चे आशीर्वाद के दादी के  वे ग्यारह रुपये बेशकीमती उपहारों और औपचारिक  बधाइयों से कई गुना बहुमूल्य हैं।

रिश्तों की रंगोली ( 1 फरवरी 2019 जनसत्ता)

जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।

रिश्तों की रंगोली
एकता कानूनगो बक्षी

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अन्य लोगों के बिना उसका जीवन संभव नहीं. समाज ही है जो मनुष्य की सभी प्रकार की ज़रूरतों को पूरा करता है। वह चाहे सुख-सुविधाओं की बात हो या मन की शान्ति की चाह या फिर अपनी संवेदनाओं, विचारों को दूसरों तक पहुंचाने की हार्दिक  इच्छा. यह सब तब ही हो पाता है जब हम लोगों के बीच रहते हैं, अपने सुख-दुःख बाँट पाते हैं। हमारे ऋषि मुनि और अनेक साधक कुछ समय के लिए एकाकी रहकर जरूर साधना करते रहे हैं लेकिन वे भी आशा और विश्वास की ज्योति और ज्ञान का प्रकाश लिए इसी समाज के कल्याण के लिए लौट कर आते हैं. इंसान को भौतिक सुख सुविधाओं की ज़रूरत तो होती ही है किन्तु  उससे कहीं अधिक भावनात्मक संबल की तलाश इसी समाज में बनी रहती है।

पुराने समय में साधन बहुत कम थे और अपनी जरूरतों की पूर्ती के लिए जद्दोजहत भी बहुत करनी पड़ती थी। डर अधिक थे इसलिए समूह भी बड़े होते थे। संयुक्त परिवार होते थे लेकिन समय के बदलाव और पारिवारिक जीवन शैली में परिवर्तन आने पर बिखरते रहे। हालांकि अभी भी कई संयुक्त परिवार अपवाद स्वरूप दिखाई देते हैं जो एक प्रकार की मिसाल कहे जा सकते हैं । आपसी समझ , सहनशीलता , स्नेह और आदर जैसे महान आदर्शो की नींव पर स्थापित परिवार ही लम्बे समय तक संयुक्त रह सकते है जहां हर सदस्य एक दूसरे से भावनात्मक और जैविक रूप से जुड़ा होने के बाद भी स्वतंत्र हो। किसी तरह की घुटन का यहां स्थान नही है। पर ऐसा होना आदर्श  स्थिति है जो की दुर्लभ ही होगी।

संयुक्त परिवारों के अलावा भी एक विस्तृत कुटुंब होता था । घरों की दीवारों और छतों की उपस्थिति से भी रिश्तों का निर्माण हो जाता था। पडौसियों के परिवार हमारे अपने कुटुंब का हिस्सा होते थे। छतों पर पतंग उड़ाते और बड़ियाँ, पापड बनाती बहुएं और सासें सब उसी कुटुंब का हिस्सा होते थे. सबके  सुख और दुख एक हो जाते थे। हालांकि ये स्थिति आज भी कहीं कहीं देखने को मिल जाती है. रिश्ते में प्रगाड़ता की चाह हो तो मकानों की मोटी दीवारें बाधक नहीं बन सकती। 

अब स्थितियां बहुत बदल गईं हैं। खासतौर पर शहरों और महानगरों में कुटुंब तो क्या, संयुक्त परिवार तक नहीं रहे. बेटे और पिता के अपने अलग अलग परिवार होते हैं। यहां पड़ोसी तो है पर दरवाज़े तभी खोले जाते है जब दरवाज़े की घंटी बजाई जाए। महानगर है, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग का फ्लेट है तो सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़े बंद रखना ज़रूरी है। बाप  बेटे भी पड़ोसी की तरह अलग रहते हैं। अपने तो होते हैं कभी कभी आते है मिलते हैं मेंहमानों की तरह।

ऐसे में यहां सिर्फ एक इंसान  नियमित घर के दरवाजे पर दस्तक देता है, बेल बजाता है। वह होती है घर पर काम करने वाली बाई। ये महरी केवल महरी नही हो कर घर की सदस्य जैसी ही हो जाती है। इस महरी में ही हमको हमारे बिछुड़े परिवार के सदस्य दिखाई देते हैं. माँ, दादी ,मौशी, बहन, और बेटी भी। और अगर आप मृदुभाषी है, उससे आत्मीयता से बात करते हैं तो वह भी स्नेह से आपको भिगो देती है। आपको गर्म-गर्म फुलके खिला माँ की याद दिला देती है,  तो आपके बीमार हो जाने पर आपके सर पर उसका स्नेह से भरा हाथ रखा होता है। तीज त्योहार पर नए कपड़े और चेहरे पर त्योहार सजाए पूरे घर को उल्लास से भर देती है। यहां भी रिश्ता तो ज़रूरत का ही है पर एक दूसरे के प्रति स्नेह और आदर इस रिश्ते को प्रगाढ़ कर देते हैं।

ये कहना गलत नही होगा कि हम एक दूसरे से ज़रूरत के लिए जुड़े हुए हैं। किसी से भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है तो किसी से सुख सुविधाओं की. लेकिन हमारे रिश्ते तब बिखर जाते हैं जब ज़रूरतें  मुँह फाड़कर बोलने लगती है या फिर हमारी केवल अपेक्षाएं ही रिश्तों को परिभाषित करने लगती हैं। असल मे ज़रूरते हमे एक दूसरे से मिलाती ज़रूर हैं पर हमें हमेशा के लिए जोड़े नही रख सकती क्योंकि हमेशा बेहतर विकल्प मौजूद होता है जिस से हमारी अपेक्षाएं और आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। शायद इसीलिए आज परिवार छोटे होते चले जा रहे है, मनुष्य एकाकी हो रहा है क्योकि वो अपेक्षाओं के दबाव से डरता है । हम ऐसे विकल्प ढूंढने की कोशिश करते है जिस से जीवन में तनाव कम रहे और शांति ज्यादा।

रिश्तों को बनाये रखने के लिए कृतज्ञता का भाव होना बेहद ज़रूरी है। किसी और के द्वारा किया हुआ हमारा छोटा सा छोटा काम हमे उसके प्रति कृतज्ञ बनाता है। चाहे वो छोटा बच्चा भी क्यो न हो। ये भाव हम सब मे बना रहना चाहिए।
हम उसके ऋणी है। उसके प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान की भावना हमेशा बनी रहना चाहिए। वहीं किसी की मदद करते समय अहंकार की भावना , स्वामित्व की भावना का भी विलोपन होना चाहिए। अपेक्षाओं का बोझ दूसरे के कंधों से हटाने के साथ ही खुद से भी हटा लेना चाहिए। तब जाकर शायद फिर से अपनों की महफिलें जमने लगे, किस्से, कहानियों और ठहाकों के दौर और आत्मीय स्नेह से भरे रंगों की रंगोलियां हर घर के आँगन में सजने लगे।

मनोविज्ञान की छांव ( 1 जनवरी 2019)

नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।

दुनिया मेरे आगे
मनोविज्ञान की छांव

एकता कानूनगो बक्षी

इन दिनों विद्यालयों,महाविद्यालयों में पारंपरिक विषयों के अलावा भी कई विषय भविष्य की ज़रूरतों को देखते हुए पढाए जा रहे हैं। जैसे कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं का प्रारम्भिक ज्ञान , प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी , उद्यमिता विकास संबंधी कुछ अध्याय भी कुछ जगह शुरू किये गए हैं. इसके अलावा स्काउट,गाईड,समाजसेवा आदि के साथ एनसीसी से भी एक बेहतर नागरिक के निर्माण और विकास की दृष्टि से कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी नियमित रूप से शामिल किया जाता रहा है. कई संस्थाओं द्वारा तो घुड़सवारी , तैराकी, नृत्य, संगीत जैसी कई खेलों और कलाओं को भी अपने पाठ्यक्रम में स्थान देकर विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं।



इन सब के बावजूद एक बहुत ज़रूरी विषय जो हम सब से छूटता रहा है,वह है मनोविज्ञान। हालांकि इस विषय को स्वतन्त्र रूप से पाठ्यक्रम के प्रमुख विषयों के तौर पर चुनने के लिए सुविधा होती है और डिप्लोमा, डिग्री और पीएचडी तक मनोविज्ञान विषय में किया जा सकता है. लेकिन क्या अब यह वह समय नहीं है जब इसे भी नैतिक शिक्षा,खेलकूद,पूरक भाषाओं के ज्ञान की तरह हरेक स्तर पर साथ-साथ पढ़ाया जाना शुरू कर दिया जाना चाहिए? नीतिशास्त्र (मोरल साइंस) के रूप में एक पतली सी पुस्तिका से हमारा परिचय प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ज़रूर करवाया जाता है, जिसमे जीवन मूल्यों से लेकर सामान्य शिष्टाचार, लोक व्यवहार आदि जैसे  महत्वपूर्ण विषयों को कुछ समय मे घुट्टी पिलाकर पढ़ा भर देने की औपचारिकता संपन्न करा दी जाती है.यदि इस विषय की गंभीरता लिया जाता तो  समाज में आत्महत्या, निराशा, क्रोध, बलात्कार, शोषण, मोब लिंचिंग जैसी घटनाओं के समाचार आये दिन नहीं सुनने को मिलते।



हुआ कुछ यूं कि शार्ट-कट में सफलता प्राप्त करने के लिए हमने ऊपरी ढांचा तो बहुत मजबूत और आकर्षक बना लिया पर अंदर से सब खोखला रह गया। ज़रा सी विपरीत परिस्थिति हमें हिला देती है, विवेक और पर्याप्त सोच विचार और अच्छे-बुरे का अनुमान लगाए जल्दबाजी में गलत और आत्मघाती निर्णय ले लेते हैं. यह बहुत दुखद है कि वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था ने किताबी ज्ञान और स्वस्थ शरीर बनाने को तो प्राथमिकता में रखा लेकिन मन की मजबूती के लिए कुछ ख़ास नहीं किया गया. हमने शिक्षा के दौरान दुनियाभर के बारे में बहुत कुछ जान  लिया लेकिन हम खुद को ही नही समझ पाए। जब खुद को ही ठीक से नहीं समझा तो दूसरे के मन और उनकी भावनाओं को समझने की क्षमता का विकास तो बहुत दूर की बात है.

हम अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग स्वयं तो प्रसन्न, संतुष्ट और खुश रहते ही हैं लेकिन अपने आचरण और व्यवहार से अन्यों के चेहरों पर पर भी मुस्कुराहट बिखेर देते हैं.  सामान्य से मनोविज्ञान का आम आदमी के जीवन मे कितना महत्व है उसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है.

समर्थ और सम्पन्न परिवार के एक बुजुर्ग हैं, जिनकी देखभाल के लिए सब लोग जुटे रहते है, समय पर दवा , खान पान का ध्यान , अच्छे कपड़े , पर्याप्त साफ़ सफाई होने के बावजूद उनकी सेहत गिरती गई. ,अनेक डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी ख़ास फर्क नहीं पडा। एक दिन उनके यहां उनके पुराने मित्र उनसे मिलने आये तो खूब पुरानी बाते हुईं, ठहाके लगे. परिणाम यह रहा कि  दूसरे दिन उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स में काफी अंतर देखा गया। अगर घर के सदस्यों को बुजुर्ग सदस्य की मनःस्थिति थोड़ी बहुत भी समझ आए तो परिस्थिति काफी बेहतर हो सकती है। दवा के साथ कुछ पल सुख दुख की बातें, कुछ हँसी-मज़ाक, यह सब कितना जरूरी है हम सब जानते हैं. अगर आप में थोड़ी भी मनोविज्ञान की समझ है तो आप बीमार से कभी भी उसकी बीमारी संबंधी अधिक बातचीत नही करेंगे. उस से सब तरह की वे बात करेंगे जिससे उसके भीतर उत्साह का संचार हो सके और वे अपने आपको  बेहतर महसूस कर सकें।



घर के बच्चो के साथ भी हमारा व्यवहार तभी सही हो सकता है जब हमने थोड़ा बहुत बाल  मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की हो । अक्सर देखा गया है माता पिता की नज़र बच्चे के किसी एक या दो पक्ष पर केन्द्रित हो जाती है जबकि समय के साथ कई बदलाव बच्चे में आते रहते हैं. उसके मनोभावों को समझना और उसके दोस्त बन कर रहना इसके लिए आपके अंदर बच्चे के मन को समझने की क्षमता होने की जरूरत है. जब आप खुद को ही नही समझ पा रहे हैं  तब उसकी मनस्थिति को समझना आपके लिए बहुत कठिन होगा।



हमारे यहां संस्थाओं में मानव संसाधन विकास विभाग होता है लेकिन बहुत कम ऐसी संस्थाएं है जहां यह विभाग कर्मचारियों  संबंधी आंकड़ों के व्यवस्थापन के अलावा अपने कार्मिकों के मन की क्षमताओं के विकास के लिए कुछ अलग से प्रयास करता होगा. ये एक ऐसा विषय है जिसमे लगातार सीखते और शोध करते रहने की ज़रूरत है। मनोविज्ञान की पढाई करने वाले विद्यार्थी भी अक्सर अपने ही मन की गुत्थी सुलझाने में सफल होने में सफल नहीं हो पाते. क्योकि मनोविज्ञान हमे खुद से और लोगो से जोड़ने का माध्यम होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सोचने समझने में दूसरों के कहे को ध्यान से सुनना भी बहुत महत्वपूर्ण बात होती है। केवल पुस्तकें पढ़कर हम मनोविज्ञान को समझ नहीं सकते हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अच्छे श्रोता भी बन सकें। दूसरों को ही नहीं अपने भीतर की आवाज को भी गहरे उतर कर सुने। वह नही जो दुनिया आपसे कहलवाना या करवाना चाहती है पर वो जो आप स्वयं चाहते हैं। दूसरे को जब सुने तब सिर्फ उसके शब्दो को नही अर्थो को भी सुने उसके कारण और परिस्थिति को सुने, जो उसे ये सब कहने और करने को मजबूर कर रहा है ।परिणामस्वरूप आपके अंदर विवेकशीलता आएगी आप सही निर्णय लेंगे और क्रोध,आक्रोश भी खत्म  हो सकेगा।


अगर आप मनोविज्ञान की थोड़ी भी समझ रखते हैं तो उनकी परेशानियों को वास्तविकता से समझ उनकी हौसला अफ़साई करेंगे. आपके कर्मचारी अपना सर्वश्रेष्ठ संस्था को देने में सफल होंगें ।  इतिहास की तरफ नज़र डालें तो हमारे कई महापुरुषों को मिला जनसमर्थन इस बात को सिद्ध भी करता है. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पीछे उनके अनेक साथी चलते थे क्योंकि उनमें दूसरे की मनःस्थिति समझने और मनोविज्ञान की गहरी समझ और क्षमता थी।

जब हम खुद के मन को और दूसरों के मन को, उनकी परेशानियों को समझ लेंगे तो हम और अधिक स्वाभाविक हो सकेंगे.  एक दूसरे का बेहतर ख्याल रख सकेगे, मनुष्य को मनुष्य की तरह देख पाएंगे, ज़िम्मेदार बनेगे.  गलत पूर्वाग्रहों से बचेंगे. शायद इसी तरह जीवन की कई मुश्किलों से बचा भी जा सकता है। बीता सो बीता कम से कम अब नया हो ।

डस्टबिन नहीं है लेकिन ( 24 दिसम्बर 2018 )

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

कविता
डस्टबिन नहीं है लेकिन 

निराशा,तिरस्कार,कुंठा,अपमान
खत्म करते रहते हैं उसको
सारे कूडे करकट को
छुपाए रखता है अपने भीतर 

चमकती दीवारों के पीछे के क्षरण को
जान पाना मुश्किल हो जाता है उसकी उपस्थिति से 
सबको साथ जोड़ने की कोशिश में
अकेलेपन का संत्रास झेलता रहता है वह उपेक्षित

और जब रोज रोज के
संग्रहित विष का असर होने लगता है
गलने लगती है देह उसकी   
पटक दिया जाता है
बेकार हो गई चीज़ों के साथ
एक दिन।

एकता कानूनगो बक्षी

कठपुतली बनते हम ( 6 दिसंबर 2018 जनसत्ता )

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

कठपुतली बनते हम
एकता कानूनगो बक्षी

कठपुतलियों का खेल हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है और आज भी खासा लोकप्रिय है। बच्चों के साथ साथ बड़े भी बड़ी रूचि के साथ इसका लुत्फ़ उठाते हैं। किस्से कहानियों से लेकर तात्कालिक वातावरण और दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखकर कलाकार नए खेल और कठपुतलियों के स्वांग रचता है। यह सब देखने में तो बहुत सहज,सरल लगता है लेकिन इस प्रदर्शन में सफल वही कलाकार हो पाता है जो काफी शोध, सोचविचार करके खेल या नाटक की कथा बनाता है  और देश काल और परिस्थिति के अनुकूल अपनी कठपुतलियों की साज-सज्जा और श्रृंगार करके हम सब के सामने प्रस्तुत करता है । यहां यह भी गौर करने की बात है कि हर दिन एक जैसा नाटक करने वाला बहुत जल्दी अपने दर्शकों को खो देता है।  वहीं हर बार नई कहानी और नए किरदारों को गढ़ने वाला कलाकार अपने खेल में आकर्षण बनाये रखने में सफल होता है। जहां तक इस मनोरंजक प्रदर्शन की बात है, कठपुतलियों का ये पुराना करतब हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है और इसे इसी खूबसूरती और गरिमा के साथ हमेशा बने रहना चाहिए आने वाली पीढ़ी के लिए।

कठपुतलियों की बात होते ही निश्चित ही सबका ध्यान उन पुतलियों की और जाता है जो काठ याने लकड़ी की बनी होती हैं। साज सज्जा और श्रृंगार के बाद वे लगभग हम मनुष्यों की ही तरह नजर आने लगती है जबकी उसे संचालित करने वाला कोई और व्यक्ति होता  है। कठपुतली मस्तिष्क विहीन होती है उसके पास बुद्धि नही होती। और यही सबसे बड़ा अंतर होता है हम में और किसी कठपुतली में। लेकिन यह विडम्बना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिये जाते हैं. निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता की कमी, व्यावहारिक समझ का अभाव,पर्याप्त साहस की बजाए अनजाने जोखिम का डर या फिर जल्दी से जल्दी सुविधा प्राप्त करने और अपने काम को शीघ्रता से अंजाम देने की हड़बड़ी भी हो सकता है।

कई परिस्थितियों में हमारा आचरण भी काफी हद तक कठपुतली के समान ही हो जाता है।
अब देखिए अगर हम अपने घर से ही शुरू करें तो किचन में ही किस तरह से हम कठपुतली के खेल में शामिल हो गए हैं। पहले हमारे हाथो में स्टील , पीतल ,मिट्ठी के बर्तन, रोटी को लपेटने के लिए मलमल का कपड़ा , हमारे क्षेत्र में उत्पादित होने वाले स्थानीय फल सब्जियां, अनाज, दालें , घी, तेल  ऐसी सामग्री जो हमे सुलभ तरीके से प्राप्त हो जाती थी और जिनके प्रयोग से हम स्वस्थ भी रहते थे।  फिर अचानक किसी कलाकार ने दृश्य बदल दिया और हमारे हाथ मे प्लास्टिक , नॉनस्टिक , एल्युमीनियम फॉयल , एयर फ्रायर नए तरह के अनाज, दूरदराज से लाई एक्सोटिक सब्जियों और फलों ने ले ली.  घी का सेवन तक हानिकारक हो गया, और खाद्य तेलों की विभिन्न ब्रांडों की बोतलों के साथ हम किचन के सेट वाले स्टेज पर कठपुतलियों की तरह किसी और के इशारों पर डोलने लगे। लंबे समय तक यही दृश्य चलता रहा और फिर अचानक किसी स्वास्थ्य रक्षा की चेतावनी के विज्ञापन के साथ पुरानी परम्पराओं को अपनाने के लिए फिर नया स्क्रिप्ट लिख दिया गया। मिट्टी सहित पुराने बर्तनों और प्राकृतिक और ओरगेनिक सामग्री के उपयोग के सन्देश वाली कहानियों पर मानवीय पुतलियाँ नृत्य करने लगीं. जो एंटिक की तरह महँगा सौदा बन गया।

पहले हम नीम की डाली से दातुन किया करते थे और नमक और सरसों का उपयोग भी दांत की सफाई के लिए करते थे। फिर पाउडर से अपने दांत मांजने लगे, फिर टूथपेस्ट आया। नए रंगों और नए स्वाद में.  उसमे लौंग और नमक भी डाला गया और हम कठपुतलियां बहुत खुश होती गईं.  इन दिनों नीम का दातुन भी ऑनलाइन मिलने लगा है....यह अलग बात है कि एक नीम का पेड़ अभी भी रोड़ किनारे खडा मुस्कुराता रहता है।

सौंदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में तो और भी मूर्खताओं के साथ हम इस खेल में शामिल होते गए हैं।  हमारे पूर्वज और उस जमाने के लोग चाहे वह सम्राट रहे हों या अनन्य सुंदरियां और आम स्त्री-पुरुष खूबसूरती और तंदुरुस्ती बनाये रखने  के लिए जो नुस्खे आजमा रहे थे उनको हमने आउटडेटेड मानकर भुला दिया और नए जमाने के महंगे कास्मेटिकस को अपनाकर हम क्या मात्र कठपुतली नहीं हो गए हैं? जिनकी डोर किन्ही और चतुर उत्पादकों और व्यापारियों की हाथों में है।  जबकि यह खेल भी स्थायी नहीं होता। क्षणिक दृश्य उपस्थित होता है। इसकी भी उतनी ही आयु होती है, थोड़े समय में ही इन कास्मेटिक का विपरीत असर जब दिखने लगता है तो मार्केट में इन्हें ठीक करने के नए प्रोडक्ट्स आ जाते है। फिर भी बात नही बनती तो विज्ञापन की तस्वीरों में फिल्टर्स एप्प काम करने लगते हैं। जो आपकी चेहरे की कमियों को पूरी तरह से छुपाने का दावा करने लगते हैं। बस इसके बाद अगला दृश्य आता है जिसमे आपके हाथों में एक टयूब होती है जिसमे वही उबटन मौजूद होता है जो आपने खुद से दूर कर दिया था आउटडेटेड समझ के।

 ये तो मात्र कुछ दृश्य हैं इसके अलावा भी हमने अपने इस जीवननाट्य में कठपुतली का किरदार निभाया है. बाजार और बाजारवाद की उँगलियों से शायद हम इस कदर संचालित किये जा रहे हैं कि समझ ही नहीं पा रहे कि हम कठपुतली नहीं मनुष्य हैं जिसे बुद्धि और समझ का उपहार जन्म के साथ प्राप्त हुआ है. हमारी आस्था और विश्वास यहां तक कि हमारी भाषा, विचार, और शिष्टाचार पर भी इसका गहरा असर आया है। एक तरह से हमारा व्यवहार और आचरण भेड़ों के समूह की तरह हो गया है. एक ऐसे सामूहिक गान का हिस्सा होते जा रहे हैं हम, जिसमें आँख बंद करके सबके सुर में सुर मिलाना ही श्रेष्ठ माना जा रहा. दुखद है कि हमे इससे ही सुख मिलने लगा है. जबकि ये हमारे लिए नुकसानदायक स्थिति है। यह स्थिति निजी तौर पर हमारी मौलिकता की भक्षक है। इस तरह की वैचारिक शून्यता एक तरह की नई प्रजाति को जन्म दे रही है जिनका उपयोग लगभग उसी तरह हो रहा  जैसे किसी प्रयोगशाला में जीव-जंतुओं के साथ किया जाता रहा है।

बेचने वाले से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी उपभोगकर्ताओं की है कि किन चीज़ों का स्वागत करना है और किन्हें छोड़ देना ही बेहतर होगा।

हम कितने ही आधुनिक क्यों न बन जाये , पर अपनी जड़ों से जुड़े रहने से ही हमारा पोषण होगा. चाहे किसी नई वस्तु की बात हो  या नए विचारो की, विवेक,समझ और साहस के साथ उसका पूरा आकलन करना बेहद ज़रूरी है  ताकि भविष्य में ईमानदार संभावनाओं को  सही आयाम मिले और अपने फायदे के लिए हमे कोई कठपुतली न बना सके।

कविता बूढ़ा पेड़ (17 नवम्बर 2018)

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

बूढ़ा पेड़

घने हो गए पेड़ की छटाई के लिए
फंदा डाला
और एक आदमी तने का सहारा ले
चढ़ गया ऊंची मजबूत डाली पर

पेड़ ही ने उसे सहारा दिया और ऊँचाई भी

फिर आदमी ने
पेड़ की शाखाओं पर
कुल्हाड़ी से वार किए
पूरा पेड़ कांप गया

धराशाई होती गईं कमजोर शाखाएं

पेड़ के अंग बिखर गए ज़मीन पर
सड़क हरी हो गई ताजा कतरों से

आरी चलाई जा रही अब
अलग हुई डालियों पर
टुकड़ों टुकड़ों में बंट जाएगा पेड़
लदान के लिए

कुछ के घर संवारेगा
कुछ का चूल्हा जलेगा
अलाव में बदलकर
गर्माहट देगा कुछ लोगों को
जाड़े में

थोड़े दिनों में
फिर निकल आएंगी नई शाखाएं

बिना प्रतिशोध निकल आएंगे नए पत्ते
पंछी आते रहेगे नियमित
पुराने जख्मों को भूलकर
फिर मुस्कुराने लगेगा
बूढ़ा पेड़।

एकता कानूनगो बक्षी

मन की सफाई ( 30 ऑक्टोबर 2018 जनसत्ता)

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

मन की सफाई

एकता कानूनगो बक्षी

वैसे तो हर दिन हम घर की और हमारे आसपास  की साफ़-सफाई नियमित रूप से करते रहते है, लेकिन जैसे ही त्योहारों का मौसम आता है हम कुछ अधिक सक्रिय होकर निष्ठा के साथ इस काम में जुट जाते है.  इसी समय घर-घर से बेजरूरत का पुराना सामान, अटाला और रद्दी पेपर आदि खरीदने वालों की फेरियां भी खूब लगने लगती है.  और सचमुच इन दिनों देखिए न रोज़ की सफाई के बाद भी कितना अटाला , कूड़ा और कचरा निकल ही आता है। जैसे जैसे हम इस कार्य में जुटते हैं बरसों से खोई और गुमशुदा चीजें भी बरामद होने लगतीं हैं. कुछ का हम त्याग  कर पाते हैं तो कुछ के मोहपाश में घिर जाते हैं. बहुत सी वस्तुओं से हमारी कई स्मृतियाँ जुडी होती हैं. कुछ को हम जरूरत न होने पर भी सहेज लेना चाहते हैं. ऐसा लगता हैं इन वस्तुओं के संग्रहण से हम कल के लिए कुछ खुशियाँ सुनिश्चित कर लेना चाहते हों. 



जब हम घर की सफाई इतनी मुस्तेदी से करते हैं तो हमे एकबार अपने भीतर की व्यवस्था का भी पुनरावलोकन जरूर कर लेना चाहिए । इस के लिए कुछ सवाल खुद से करना आवश्यक होंगे. मसलन क्या हमारे बचपन की मासूमियत, अल्हड़पन, वह निश्छल खिलखिलाहट सहज रूप से उपस्थित है या वह भी अनावश्यक चीजों की भीड़ में कहीं ओझल हो गई है. हमारा  शरीर पूरे दिन बिना थके हमारा साथ देता है ? क्या चेहरे पर जो झुर्रियां आ गयी हैं वो उम्र परिपक्वता बयाँ कर रही है या फिर वे चिंताओं के निशान हैं ? क्या आज भी हम कुछ समय उन लोगो के साथ बिता पाते हैं जो लोग हमारे प्रिय हैं, जो हमें निस्वार्थ प्यार करते हैं, जिनके साथ हम सहज रह पाते है ? हर सुबह कुछ नया करने की ललक और जोश के साथ क्या आज भी हम सुबह जाग पा रहे हैं ? उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम हों लेकिन ऐसे और कई भावुक और संवेदनापूर्ण सवाल भी हमे खुद से रोज़ पूछते रहना चाहिए और शांति से बैठकर उन पर चिंतन भी करना चाहिए ।



खुद को समझना और खुद से बात करना उतना ही ज़रूरी है जितना जीवन के लिए प्राणवायु ग्रहण करना । उम्र के साथ-साथ हमारे अंदर कई शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं. ऐसे में नई परिस्थिति के साथ खुद को तैयार करना बेहद ज़रूरी होता है । ज्यों ज्यों हमारे संपर्कों का दायरा बढ़ने लगता है परिणामस्वरूप कई तरह के विचारों  और खट्टे मीठे अनुभवों से हमारा सामना होने लगता है। जो आदतें हमारी पहले रहीं होंगी वो नई स्थिति में हो सकता है उपयुक्त न हो । कम उम्र में हमें सबक दिया गया कि जो अपने से बड़े कहे वो बात हमे हर हाल में माननी चाहिए, पर अब समय के साथ हमारे बड़ो में केवल हमारे परिजन और शिक्षक ही नही हैं, अन्य लोग भी शामिल हैं इसलिए अब समझदारी इसी में है कि आदर का भाव सबके साथ  रहे,लेकिन पर खुद के विवेक से ही अच्छे-बुरे का हर निर्णय लिया जाए। अब समय जब हमसे ज़िम्मेदारी की अपेक्षा करता है तो उस से घबराने की जगह पूरी ईमानदारी से उसका निर्वाह किया जाना चाहिए।



घर के अटाले के निपटान की तरह ही हमें अपने भीतर की सामग्री का निपटान भी करते रहना चाहिए. बढ़ती उम्र के साथ कुछ चीज़ें त्यागना चाहिए, वहीं कुछ चीज़ों को स्वीकार कर लेना चाहिए। ये तभी सम्भव है जब हम इस बारे में ईमानदारी से विचार करेंगे। अब देखिए जब घर को रोज़ साफ करने पर भी इतना कचरा जमा हो जाता है तो फिर हमारा मस्तिष्क और शरीर कितना कुछ इकट्ठा कर लेता होगा.  और फिर विचार तो लगभग अमर ही होते हैं. कुछ गलत इकट्ठा हो गए तो उनसे मुक्ति बड़ी कठिन हो जाती है. मन के विचार ही है जो हमे कमज़ोर या मजबूत बनाते हैं. 



हम तो चाहते है हमारा हर दिन उत्सव हो है . इसके लिए हमे दृढ़ता की झाड़ू थाम लेना चाहिए और नष्ट कर देना चाहिए उन विचारों को जो हमारे समय और सेहत को नुकसान पहुचा रहे है.  उन लोगो से भी हमे परहेज करना चाहिए जो अपनी नकारात्मकता से हमे कमज़ोर कर रहे हैं, क्योकि असल मे ऐसी कोई भी परीक्षा और कठिन घड़ी नही है जिसपर हम अपने साहस,मेहनत और विवेक के बल हम फतह हासिल ना कर सके । नकारात्मकता  दीमक की तरह है जो सब कुछ नष्ट कर देती है। हमे उसे अपने पास भी नही फटकने देना चाहिए।



सफाई के साथ साथ हमे इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि हम किन चीज़ों को अपने जीवन मे जगह दे रहे हैं, ये सब हमारे भविष्य की खुशहाली को निश्चित करते हैं या नहीं?  कहा भी गया है सही संगत और अच्छे साहित्य को अपने जीवन में जगह देनी चाहिए। नकारात्मकता का कूढा हमें कमज़ोर करके खत्म कर देता है खुद को समझना और मन की नियमित सफाई करना बेहद आवश्यक है।

इसलिये ये बहुत ज़रूरी है कि हम अपने भीतर की व्यवस्था का रखरखाव और साफ़-सफाई पर भी पर्याप्त ध्यान देते रहें. जिन्हें सहेजकर जीवन सुखी होता हो उन्हें रखकर भीतर के अटाले का भी त्याग करने में ही हमारा भला है।

http://epaper.jansatta.com/m5/1876177/Jansatta/30-October-2018#page/6/1

कविता वो संवाद ( 22 ऑक्टोबर 2018)

आज सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
वो संवाद

उफ़!  ये बदबू !
लगता नहीं कि यह घर है
दवाखाना लगता है

जी! यह घर ही है
धीमी आवाज़ में जवाब मिला

कहाँ से ?
चारो तरफ से तो घेर रखा है दवाओं ने
बाहर निकलो!
ज़रा सांस लो खुली हवा में
मिला करो अपनों से ..!

यही तो अपने हैं मेरे..
देखिये! वो छोटी सी लाल लिबास में
खड़ी है शीशे की मेरी दोस्त 
हर लेती है मेरा सारा दर्द

और जब नींद नहीं आती
तो वो दुबला सा लंबे कद का मेरा शुभ चिन्तक
सब संभाल लेता है बिना कुछ कहे 
मेरे साथ ही सोता है
यह मेरा छोटा सा
दर्द हारी बाम

अरे! कैसी बाते कर रहे हो !
परिवार कहाँ है आपका?
इतनी दवाई लेना ठीक नहीं आपके लिए

जी!
परिवार को फुर्सत नहीं अब अपनों से
सबके अपने अपने दुखड़े हैं

दोस्त तो होगा कोई आपका?

दोस्त तो कब के पीछे छूट गए
चले गए अपने नए आशियानों में

आप सही नहीं कर रहे अपने साथ,
बाहर निकलिए इन सब से
खुली हवा में चहल कदमी कीजिये थोड़ी बहुत

जी!आप सही कह रहे
ऐसा ही करूँगा अब
आप आ जाया कीजिये न मुझ से मिलने
अच्छा लगता है !!

 एकता कानूनगो बक्षी

कविता संक्षिप्त का विस्तार(1 ऑक्टोबर 2018)

आज सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
संक्षिप्त का विस्तार

एकता कानूनगो बक्षी

ब्रह्मांड के रहस्यों की पड़ताल करता वैज्ञानिक
कुछ पंक्तियों में ही दे देता है ज्ञान का  सूत्र

प्रकृति को देखा है
इशारों में अपनी बात कहते हुए
बारिश का संकेत देते हैं  बादल
ठंडी हवाएं पैगाम देती है जाड़े के आगमन का

चेहरे से पता चल जाता है जरूरतमंद का दुख
हिसाब नही देना होता उसे
कठिनाइयों का विस्तार से
कंधे पर रखा हाथ
हौसला देता है बिना कुछ कहे

संक्षिप्त का विस्तार सम्भव है
योजनाओं की बात हो जब
ईमानदार तथ्यों के साथ

संक्षिप्त में दिया निर्देश
बन जाता है सबब शीघ्र कार्यान्वयन का
कम शब्दों में कहने का हुनर
बचा लेता है उबाऊ भाषणों से

संवेदना का  बीज
रचनात्मकता से भर देता है
दो पंक्तियों की कविता
धरती आकाश को बाहों में भर लेती है।