My Profile Profile Hello Friends My name is Ekta Kanungo . I am from Indore, presently in Pune . I

Showing posts with label संवाद. Show all posts
Showing posts with label संवाद. Show all posts

Wednesday, June 1, 2016

अपने शहर की सुबह

अपने शहर की सुबह

हर शहर की अपनी एक अलग सुबह होती है ।और जब बात हो हमारे देश की जहा इतनी भिन्नताएं है तो फिर तो यह बात पूरी तरह पक्की हो जाती है की हर सुबह अपने साथ उस क्षेत्र की ख़ास भीनी भीनी महक छोड़ जाती है।

वैसे तो थोड़े समय बाद उन  शहरों की सुबह अपनी जानी पहचानी  सी लगने लगती है जहां हमने अपना कुछ समय बिताया होता है।  वहां के पर्यावरण और खान पान का असर हमारे ऊपर हुए बिना नहीं रहता।चाहे वो मुम्बई की वडा पाँव की खुशबू  और भागते दौड़ते क़दमों की आहट लिए  कोई सुबह हो या  फिर तहजीब और नवाबी ठहराव लिए बिरयानी  और इडली डोसे की महक लिए हैदराबाद की डिजिटल भोर हो।

और उस शहर की सुबह के तो  कहने ही क्या ! जहाँ  गुजारी कई दोपहरें और सुहानी शामें अपने दोस्तों के साथ मस्ती करते गुजारीं हों। सुबह से लेकर शाम तक मौज मस्ती के साथ स्कूल , कॉलेज और कोचिंग के लिए यहाँ की गलियों, सड़को पर दौड़ती रही मेरी प्यारी स्कूटी ।

जब हम अपने शहर से दूर चले जाते हैं,तब उसका आकर्षण और ज्यादा लुभाने लगता है। कुछ ज्यादा ही उजली लगने लगती है अपने शहर की सुबह ।

मेरे शहर इंदौर की सुबह होती है ढेरो अखबारों से जो कि इस शहर का आईना भी है ।  दरअसल इंदौर एक सांस्कृतिक और कला प्रमुख शहर रहा है।यहां से कई ख्यात कलाकार देश दुनिया में सम्मानित और स्थापित हैं।आज भी यह परम्परा कायम है। जैसे ही हम अखबार खोलते है तो नज़र आता है कि यहाँ के लोग कितना कुछ कर रहे हैं, वो साहित्य की बात हो , खेल की , संगीत की हर क्षेत्र से जुड़े हुए लोग शहर का नाम  विदेशो तक में फैला रहे है । गर्व तो होता ही है साथ में पूरी सुबह जोश और गर्व से भर जाती है ।
और फिर नए उत्साह के साथ स्पोर्ट्स शूज पहन कर आप निकलते है ब्रिस्क वाकिंग पर तो एक बहुत ही परिचित सी आवाज़ और भाषा आपको रोक लेती है ।असल में इन्दौरी लोगो की आवाज़ में और लहज़े में एक अलग ही तरह का प्यार और केअर फ्री रवैया नज़र आयेगा । आप उनकी बोलचाल से ही पहचान लेगे की यह शख्स जरूर इन्दौरी है । इंदौरी बोली का असर लोगों पर कितना हुआ है वह उसे तब पता चलता है जब वह दूसरे शहर जाता है और वहां उसके   उच्चारण   पर क्रिया प्रतिक्रिया होती है । खैर,  इन सबके चलते भी इन्दौरी अपने स्किल्स और वाकपटुता के चलते  अपनी झांकी जमा ही लेता है ।

असल में इंदौर एक ऐसा आगे बढ़ता महानगर है जहां  उसे सब कुछ बना बनाया नहीं मिला । ज़मीन से अपनी मेहनत के बलबूते धीरे धीरे संघर्ष करते यहाँ तक पंहुचा है और यही attitude आप यहाँ के लोगो में भी पायेगे । आईआईएम आईआईटीऔर कई कोचिंग संस्थानो के बावजूद  भी कई विद्यार्थी मनचाहे पलेसमेंट से वंचित रह जाते हैं,  पर फिर भी संघर्ष कर अपने मुकाम तक पहुच ही जाते है । यह सब कारण उन्हें हमेशा ज़मीन से जोड़े रखता है । विनम्र बनाये रखता है।कम से कम मैं अपने अनुभव से अपने लिए तो यह कह ही सकती हूँ।

इंदौर के बारे में एक बात जो हमेशा आकर्षित करती है वो है गज़ब का बैलेंस और तालमेल। ये एक ऐसी जगह है जहा आप को अच्छी शिक्षा भी मिल सकती है साथ में रोजगार भी।यहाँ का रेडीमेड गारमेंट उद्योग आपको हमेशा अप टू डेट रखेगा। प्रसिद्द धर्मस्थल तो आप ज़रूर जाएगे पर यहाँ की ख़ूबसूरत  शामें और दिलकश रातों को भी भुला नहीं पाएंगे।  यहाँ आकर महसूस होता है की सब लोग एक जैसे है दूसरी भाषाओ को भी अपनाया है पर जोर अपनी भाषा हिंदी  पर ही ज्यादा है ।

एक बात और अंत में, इंदौर के बारे  में, इंदौरी लोगो को  बात करने का बस  मौका भर चाहिये ,फिर वो रुकने वाले नहीं । तो हम बात कर रहे थे इंदौर की सुबह क़ी हलकी फुल्की बातो से गहन गम्भीर बातो और अपनेपन की मिठास लिए, मैंने बहुत सारी लफ्फाजी मौक़ा हाथ लगते ही कर ही दी है।
खैर, अब आप सुबह सुबह चौराहे पर चलिए ज़रा, हो जाए गरमा गर्म जलेबियों के साथ जायकेदार उसल पोहा।
आज इतना ही।नमस्ते।।
एकता।

Tuesday, October 27, 2015

बात

बात 

आज एक धार्मिक समारोह में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . उस समारोह की भव्यता देख कर में चकित रह गयी .. चारो तरफ रौशनी और मन को मुग्ध कर देने वाली सजावट . प्रभु के बेशकीमती आभूषण और वस्त्रो से मेरी आंखे चकाचौंद रह गयी . छप्पन भोग का नेवेद और हजारो की संख्या में सज्जे धज्जे श्रद्धालु.
पर दिमाग था की एक ही बात पर अटक गया की इस देश का तो पता नहीं मुझे पर हाँ इस देश के भगवान् बहुत SAMRADH (RICH) है . Feeling lost

बात


बात ..


हमारे कुछ पर्व हमे अपनों के कितने करीब ले आते है .आज शरद पूर्णिमा में जैसे जैसे चाँद और रोशन होता जा रहा है अपनी दादी की याद और उनके साथ बिताए पल भी मुझे याद आ रहे है .आज होटल के इस कमरे में खिड़की से चाँद को देखते हुए मुझे पिछली बार की शरद पूर्णिमा याद आ रही है मम्मी से कह कर दूध को तब तक ओतवाय था जब तक की वो खीर से रबड़ी न बन जाए. छत पर जाली से उसे ढक कर १२ बजे तक उसका अमृत बनने का इंतज़ार किया इस बीच दादी के साथ हसी मजाक किस्से कहानियो और अंताक्षरी का दौर चलता रहा और फिर आँखों को और तेज़ बनाने के लिए चाँद की रौशनी में सूई में धागा पिरोना . दादी के साथ बिताए वो मस्ती भरे पल आज अमृत की ही तरह मुझ में उर्जा का संचार कर रहे है.

बात

बात  

किताबों में कई बार पढ़ा था विकासशील देश और विकसित देश .भारत एक विकासशील देश है . पहली बार अवसर मिला इस अंतर को बारीकी से समझने का . वाकई खाई बहुत गहरी और बडी है . यक़ीनन मेरा यह वाक्य आपको सकारात्मक नहीं लगेगा पर समझ नहीं आता कि विकासशील देश वहां तक कैसे पहुचेगा और शुरुआत कहां से करेगा . आजादी के बाद भारत ने कई मुकाम हांसिल किये हैं क्योकि उसके अन्दर एक मज़बूत इरादा था पर समय के साथ वो शायद कमजोर और मलिन होता जा रहा है . हम सब दौड लगा रहे है पर सबकी दौड केवल अपने स्वार्थ तक ही सिमित रह गई है .
अपने छोटे से प्रवास में भी विकसित देश की कई बातें सीखने और अपनाने जैसी लगी . लेकिन जिसने मुझे गहरे से छुआ वो था वहां का समझदारीपूर्ण खुलापन. जो हर इंसान को अपने हिसाब से जीने की आजादी देता है वो देश ,और सबसे अच्छी बात मुझे महिलाओं की स्थिति लगी . सच कहूं यह बात आपको तीखी लग सकती है वहाँ महिला सिर्फ देवी नहीं है वो इंसान भी है उसे भी जीना है .भारत में उसे भगवान का दर्जा देकर जिम्मेदारियों में जकड सा लिया गया है . यहाँ उसे अपने पहनावे में बदलाव लाने को कहते है,उस पर ड्रेस कोड लागू करने के प्रयास होते रहते हैं। असल में जहां बदलाव की वास्तविक जरूरत है वो है समाज की सोच का बदलना. स्त्री और उससे जुडी बातों को बगैर किसी पूर्वाग्रह के साथ समझना।
आपको लग रहा होगा की मुझ पर विदेशी रंग चढ़ गया है,छोटे मुंह बडी बात लग रही हो .लेकिन यह सच है , हमारे देश की अच्छाएयों को हम नकार नहीं सकते में नतमस्तक हूँ पर ज़रा आप ही देखिये की जब हमें इतनी मेहनत करनी है अपने आप को वहां तक पहुचाने में , तो हम आज भी ऐसी बातों में समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं। . आज सब से पहला कदम जिसकी हमे जरूरत है वो है हमारी सोच और विचारों के खुलेपन की. यहाँ मेरा आशय फूहडता और् अनैतिकता से कतई नही है। .

बात

बात  

किताबों में कई बार पढ़ा था विकासशील देश और विकसित देश .भारत एक विकासशील देश है . पहली बार अवसर मिला इस अंतर को बारीकी से समझने का . वाकई खाई बहुत गहरी और बडी है . यक़ीनन मेरा यह वाक्य आपको सकारात्मक नहीं लगेगा पर समझ नहीं आता कि विकासशील देश वहां तक कैसे पहुचेगा और शुरुआत कहां से करेगा . आजादी के बाद भारत ने कई मुकाम हांसिल किये हैं क्योकि उसके अन्दर एक मज़बूत इरादा था पर समय के साथ वो शायद कमजोर और मलिन होता जा रहा है . हम सब दौड लगा रहे है पर सबकी दौड केवल अपने स्वार्थ तक ही सिमित रह गई है .
अपने छोटे से प्रवास में भी विकसित देश की कई बातें सीखने और अपनाने जैसी लगी . लेकिन जिसने मुझे गहरे से छुआ वो था वहां का समझदारीपूर्ण खुलापन. जो हर इंसान को अपने हिसाब से जीने की आजादी देता है वो देश ,और सबसे अच्छी बात मुझे महिलाओं की स्थिति लगी . सच कहूं यह बात आपको तीखी लग सकती है वहाँ महिला सिर्फ देवी नहीं है वो इंसान भी है उसे भी जीना है .भारत में उसे भगवान का दर्जा देकर जिम्मेदारियों में जकड सा लिया गया है . यहाँ उसे अपने पहनावे में बदलाव लाने को कहते है,उस पर ड्रेस कोड लागू करने के प्रयास होते रहते हैं। असल में जहां बदलाव की वास्तविक जरूरत है वो है समाज की सोच का बदलना. स्त्री और उससे जुडी बातों को बगैर किसी पूर्वाग्रह के साथ समझना।
आपको लग रहा होगा की मुझ पर विदेशी रंग चढ़ गया है,छोटे मुंह बडी बात लग रही हो .लेकिन यह सच है , हमारे देश की अच्छाएयों को हम नकार नहीं सकते में नतमस्तक हूँ पर ज़रा आप ही देखिये की जब हमें इतनी मेहनत करनी है अपने आप को वहां तक पहुचाने में , तो हम आज भी ऐसी बातों में समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं। . आज सब से पहला कदम जिसकी हमे जरूरत है वो है हमारी सोच और विचारों के खुलेपन की. यहाँ मेरा आशय फूहडता और् अनैतिकता से कतई नही है। .

बात

बात 

आज कल मैं कुछ नए-नए अनुभवों के दौर से गुजर रही हूँ। यहाँ हैदराबाद में वैसे हिंदी भाषी लोगों की कमी नही है। पर मुझे घर से बाहर निकल कर लोगों से दोस्ती करने का अभी पर्याप्त समय नहीं मिला है। मेरा सामना आज कल घर में काम करने वाली महरी और सिक्यूरिटी गार्ड से ही हो पा रहा है । महरी काफी कुछ हिंदी समझ लेती है पर वो वही समझती है जो वो समझाना चाहती है । और सिक्यूरिटी गार्ड पूरी तरह से तेलगु बोलता है और धाराप्रवाह तेलगु बोलता है . अक्सर ऐसा सन्योग बनता रहता है की हम जब तीनो इकट्ठे हो जाते हैं और बिना रुके तीनों अपनी-अपनी बाते करने लगते हैं वे दोनों तो बिना रुके तेलगु बोलते हैं और मैं भी पूरे जोश के साथ हिंदी .. ऐसे प्रसंगों पर मुझे बार बार 1957 में बनी गुरुदत्त जी की फिल्म प्यासा के गीत की ये पंकतियाँ बरबस याद आने लगती हैं--
'जाने क्या तूने कही ज्याने क्या मैंने सुनी बात कुछ बन ही गयी...'
तब लगता है वाकई इंसान के हाव भाव कितने जरूरी होते हैं जो यकायक एक ऐसी भाषा बन जाते हैं,जिससे अपने मतलब के काम बडी आसानी से सुलझते और निपटते जाते हैं।जो काम अक्सर बोलकर नही हो पाते या बने काम बिगड जाते हैं वे केवल चेहरे के भावों और एक अदद मुस्कराहट के कारण सफलता पूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं।

बात / घर की बालकनी से

बात 

घर की बालकनी से

घर की बालकनी से सामने वाली बिल्डिंग के फ्लेट का किचन एरिया दिखाई देता है . हर बार उनकी किचन विंडो में लोग काम करते हुए दिखाई देते हैं .कल जब शाम को अकस्मात उधर ध्यान गया तो यह जाना की किचन में अधिकांश पुरुष ही काम कर रहे थे . यह उन घरों का भी दृश्य था जहाँ महिलाएँ ऑफिस का काम नहीं करती केवल घर का काम संभालती हैं . पुरुष समाज में इस तरह की संवेदना देखना सुखद प्रतीत होता है. जहा महिलाएँ कई वर्षो से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती आ रही हैं कभी घर के बाहर तो कभी अपनों के बीच. इस तरह पुरुषों का यह कदम बहुत सकारात्मक है . खासकर हमारी नई पीढ़ी की सबसे बद्दी खासियत यही है कि यहाँ काम का किसी तरह से भेद नहीं है सारे काम दोनों स्त्री-पुरुष मिलजुल कर करते हैं ऐसे में किसी भी एक व्यक्ति की किसी पूर्वाग्रह के कारण कोई विशेष कार्य को करने की ज़िम्मेदारी नहीं मानी जाती. उन सभी पुरुषों को सलाम जिनके सहयोग से आज की स्त्री को अधिक खुला आसमान मिल रहा है,जहाँ उसको अपनी चमक और आभा दिखाने का भरपूर अवसर मिल पा रहा है।

बात / हर दिन नया दिन

बात 
हर दिन नया दिन
कुछ दिनों से किताबों से घिरी हुई हूँ. प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए समय बहुत कम बचा है लेकिन अपनों का साथ और सहयोग होने से काफी कुछ पढ़ पा रही हूँ . चेहरे पर एक अलग ही तरह की थकान का तनाव दिखाई पढ़ रहा है जैसे कोई लेप लगा रखा हो और आंखे हमेशा से कुछ ज्यादा मोटी हो गईं हैं. इसके बावजूद भी कही न कही अंदर कुछ खनक सी है, जैसे कोई धुन बज रही हो, अंदर से मन बहुत खुश है , बचपन की खिलखिलाहट जैसे गूंज रही है भीतर.
एक बात और समझ आ रही है वो यह कि जब हम छोटे होते हैं तब इतने खुश और ऊर्जावान क्यों रहते हैं. जवाब साफ़-साफ मिल रहा है कि तब हमारा समझ का गिलास खाली था और हर दिन हम कुछ नया सीख रहे थे .हमारे सामने हर दिन नयी चुनौतियाँ आ रही थीं और बिना किसी चतुराई के उसे पूरा करने का जोश भी बना रहता था.
“हर दिन नया होता है” इस वाक्य का सही अर्थ अब समझ आने लगा है. यही लगा रहता है मन में कि हर दिन कुछ नया सीखें, कोई भी दिन अपने हाथ से जाने ना दें. कहा जाता है गंगा में स्नान कर हमारे सारे पाप धुल जाते हैं लेकिन जब हम एक डुबकी ज्ञान के सागर में लगाने का प्रयास करते हैं, अपनी समझ और विवेक में बढोतरी के साथ-साथ खुशी और अपनेपन से भरे कई मोती भी हमें अनायास मिलने लगते हैं.
एकता