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Wednesday, October 28, 2015

महुआ मदमाने लगा,उडने लगा गुलाल।

रंग पंचमी की शुभकामनाएँ
रंग पंचमी पर मालवा में बहुत धूम होती है . इस दिन कोई भी रंगों से बच नहीं पाता . ऐसे में एक बार मुझे भी इंदौर विविधभारती में कार्यक्रम देने का मौका मिला था .
किसी तरह पापा की कार में बचते बचाते स्टूडियो में पहुच ही गयी थी .वहा कार्यक्रम पेश करते हुए बार बार यही लग रहा था रंगों से भरे हमारे बॉलीवुड के नगमो ने कैसे होली के रंगों में कई कई और रंग भी घोल दिए हैं . रूठना मनाना, छेड़ छाड़, हँसी ठिठोली और बहुत सारा प्यार.
प्रोग्राम के लिए होली के गीतों को चुनते समय एक बात यह भी महसूस हो रही थी की असली ख़ुशी लोक रंग से ओत-प्रोत स्वाभाविक सादगी में ही है
श्री ओम वर्मा अंकल के इस दोहे से मैने कार्यक्रम की शुरुआत की थी-
वंशी मादल बज उठे,मौसम ने दी ताल,
महुआ मदमाने लगा,उडने लगा गुलाल।
इसके बाद मैने कार्यक्रम का पहला गीत बजाया। यादो के इस सफर में आप भी सुनिए आज की इस रंग पंचमी पर वही गीत.. ...


'अमर अकबर एंथोनी

हिन्दी फिल्मों को चाहने वाला कोई भी ऐसा व्यक्ति नही होगा जिसने फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' का नाम न सुना हो। स्टार ऑफ द मिलेनियम अमिताभ बच्चन और नेर्देशक मनमोहन देसाई की बहुत फेमस फिल्म में विनोद खन्ना ने अपने शानदार अभिनय से उस समय के अपने सबसे बडे प्रतिद्वन्दी अमिताभ बच्चन को कडी टक्कर दी थी। इन सबके बावजूद इस फिल्म का संगीत भारतीय फिल्म इतिहास में बहुत उल्लेखनीय बन पडा है। भारतीय सिनेमा के के सबसे ज्यादा सम्माननीय और चार महान गायकों नें पहली बार और शायद आखिरी बार एक साथ अपनी आवाजें इस फिल्म के एक गीत को दी थी। वह गीत था- 'हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें..'
इस गीत को मोहम्मद रफी,किशोर कुमार,मुकेश और लता मंगेशकर जी ने गाया था। रफी साहब ने ऋशि कपूर के लिए, किशोर कुमार जी ने अमिताभ बच्चन के लिए, विनोद खना के लिए मुकेश जी ने और शबाना आजमी,नीतू सिंघ व परवीन बॉबी के लिए लता मंगेशकर जी ने अपनी सुरीली आवाज दी थी।
संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारे लाल ने इसका संगीत और धुन बनाते समय फिल्म के चरित्रों के धर्म और उनकी संस्कृति का विशेष ध्यान रखा था। एंथोनी के लिए पाश्चात्य, अमर के लिए अध्यात्मिक और अकबर के लिए कव्वाली परम्परा के संगीत को आधार बनाकर उन्होने बहुत यादगार काम किया और इस गीत को अमर बना दिया है। इस गीत के फिल्मांकन में न सिर्फ संगीतकार व गायकों का हुनर देखने को मिलता है बल्कि अभिनेताओं, निर्देशक, कोरियोग्राफर और सहायक अभिनेताओं ने भी अपने कौशल से जान फूंक दी है। 

मेहमूद के एक व्यक्तित्व में कई व्यक्तित्व

मेहमूद के एक व्यक्तित्व में कई व्यक्तित्व समाए हुए थे। उन्हें संगीत की बेहतर समझ थी। पार्श्वगायक मन्ना डे ने जितने नटखट गाने गाए हैं, ज्यादातर का पार्श्वगायन मेहमूद के लिए हुआ है। मन्ना डे ने अपनी आत्मकथा में मेहमूद का आभार भी माना है।
जब मेहमूद फिल्म निर्माता बन गए तो उन्होंने अनेक संगीतकारों को मौका देकर आगे बढ़ाया। मिसाल के बतौर आडी बर्मन (छोटे नवाब), राजेश रोशन (कुंआरा बाप) तथा बासु-मनोहारी (सबसे बड़ा रुपैय्या) के नाम गिनाए जा सकते हैं।
जब कॉमेडियन के रूप में वह फिल्मों के लिए अनिवार्य हो गए तो छोटे बजट की फिल्मों में उन्हें हीरो के रोल मिलने लगे। छोटे नवाब (निर्माता-मेहमूद), फर्स्ट लव, प्यासे पंछी, कहीं प्यार ना हो जाए, शबनम, भूत बंगला, नमस्ते जी जैसी फिल्में प्रमुख हैं। आई.एस. जौहर के साथ भी मेहमूद की ट्यूनिंग उम्दा रही। जौहर-मेहमूद इन गोआ के बाद जौहर-मेहमूद इन हांगकांग इस जोड़ी की यादगार फिल्में हैं।
साठ के दशक में मध्य से हिन्दी फिल्मों के लिए मेहमूद का फिल्म में होना उसकी सफलता की गारंटी बन गया था। इस दौर में बड़े बैनर, बड़ी फिल्में और बड़े सितारों के साथ काम करने का मौका मिला। ऐसी फिल्मों का यहां सिर्फ उल्लेख किया जा सकता है- पत्थर के सनम, दो कलियां, नीलकमल, औलाद, प्यार किये जा, हमजोली, पड़ोसन आदि।
फिल्म पड़ोसन मेहमूद के करियर की ऑल टाइम ग्रेट फिल्म है। यदि पांच कॉमेडी फिल्मों की तालिका बनाई जाए, तो निश्चित रूप से उनमें से एक पड़ोसन रहेगी। शुभा खोटे के बाद कॉमेडी-पार्टनर के रूप में दूसरी लेडी हैं अरुणा ईरानी। मेहमूद का साथ पाकर अरुणा का करियर इतना आगे बढ़ गया कि मेहमूद ने अपने प्रोडक्शन हाउस में अमिताभ बच्चन को हीरो बनाकर फिल्म बॉम्बे टू गोआ (1972) बनाई। आइए अब सुनते हैं इन्ही मेहमूद साहब पर फिल्माए इस शानदार गीत को जिसमें उन्होने दादा स्व. पृथ्वीराज कपूर, पिता स्व. राजकपूर, और बेटे रणधीर कपूर से प्रेरणा लेते हुए कॉमेडी सीक्वेंस में जानदार अभिनय किया था।
आवाजें किशोर कुमार,मुकेश और स्वयं मेहमूद जी की है

Tuesday, October 27, 2015

वेक अप !!


वेक अप !!

कुछ दिनों पहले ही मेरे एक परिचित ने बड़े ही विश्वास के साथ कहा- भैया रेडियो के दिन तो गए , हम तो कई सालों पहले ही उसे कबाड़ी को दे चुके हैं . कौन सुनता है आज उसे । ऐसे लोगो की बेबाक बात को रोकना मुश्किल है । पर सच इस बात से कही परे है। आज सबसे ज्यादा सुनने जानने के लिए रेडियो भी महत्वपूर्ण साधन है। आप किसी भी चौराहे पर जाकर खड़े हो जाएं, कहीं न कहीं से आपके कानो में कोई न कोई मधुर ध्वनि सुनाई दे ही जायेगी . समय के साथ हर चीज़ कई बार आउटडेटिड हो जाती है और नयी चीज़े उसकी जगह ले लेती है , ज़रा गौर से देखिये रेडियो आज एक बड़े से डब्बे के कद में भले ही नहीं है लेकिन आज वो आपको आपके मोबाइल में मिलेगा, आपकी कार में जब आप अकेले हों तब भी, और जब आप इन्टरनेट का प्रयोग कर रहे हो, अपने देश से कही दूर बैठे हों, तब ज़रा अपने देश की किसी रेडियो चैनल को ऑनलाइन सुनकर देखिये कितना सुकून देता है . आल इंडिया रेडियो की तो बात ही निराली है सुबह 5 बजकर 55 मिनट पर किसी दिन tune करके देखिये.. एनाउंसर सुबह सुबह आपको वन्दे मातरम कहते हुए सुनाई देगा वो आपके लिए सुबह 4 बजे का जगा हुआ होता है और आपके दिन को खुशनुमा ,संगीतमय और जानकारी युक्त बनाने के लिए सक्रिय हो जाता है। चाहे उसके निजी जीवन में कितनी ही उथल पुथल क्यूँ न मची हुई हो आपके समक्ष आपको खुश करने का भरपूर प्रयास करता है। लोगों को लगता है की रेडियो मात्र बातचीत और लफ्फाजी करते रहना या गाना-बजाना मात्र है। सच तो यह है कि ऐसे कहने वाले को समय निकाल के एक दिन पूरा दिन रेडियो सुनना चाहिए तब उसे पता चलेगा कि दिन ख़तम होते होते आपके पास कितना सारा ज्ञान और सकरात्मक सोच का संचार हो गया है . उसके लिए अनाउंसर और कार्यक्रम प्रोडुसर और उसकी टीम के कठिन परिश्रम और अपने काम से भावनात्मक तरीके से जुडे होने के कारण ही प्रोग्राम आप तक पंहुच पाते हैं। इसके साथ ही एक अच्छे एनाउंसर को अपने आस पास मौजूद मशीनों ,कम्प्यूटरों, कंसोल , सीडी प्लेयर से तारत्म्य बैठाते हुए विचारों और आवाज़ का एक खूबसूरत ताना बाना भी बुनते हुए चलना पडता है। तब जाकर एक सुन्दर प्रस्तुति आपके समक्ष हो पाती है। ऐसे में अगर उसकी इतनी मेहनत के बाद कोई विपरीत टिप्पणी का सामना होता है तो अनाउंसर के मन को ठेस तो पहुंचेगी ही। तो जरा अनाउंसर के प्रति थोडा सा सहयोग बनाते हुए अपनी विनम्र प्रतिक्रिया दे कर उसके काम को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। यही शायद बेहतर भी होगा। दोस्तों अगर किसी दिन सारी आधुनिक टेक्नोलॉजी मे कोई समस्या आजाए और सूचना के अन्य साधन काम न कर पाएम तो निश्चित ही रेडियो ही वह साधन हो सकता है जो दुनिया से आपको लगातार जोडे रहेगा। जैसा कि हमे इस क्षेत्र में आने के समय सबसे पहले सिखाया गया है कि विनम्रता इस प्रोफेशन की विशेषता है, तो मैं पूरी विनम्रता से कहना चाहती हूँ कि रेडियो और उससे जुडी किसी बात और व्यक्ति पर टिप्पणी करने से पहले आप रेडियो को एक बार ध्यान से ,मन से बगैर किसी पूर्वाग्रह के सुने... सुनकर देखें वो आवाज़ जो आपके जीवन में सकारात्मक उर्जा भर देती है। आप से बस इतना कहना चाहूँगी कि अपनी बात रखने का सबको हक है पर किसी भी काम को छोटा कहना यह आपके अल्प ज्ञान को ही दर्शाता है और कुछ नहीं।

स्टूडियो से ...



स्टूडियो से ...

बचपन से लेकर अब तक बहुत से विषयों की किताबें स्कूल और कॉलेज में पढ़ी हैं. पर आज लगता है काश एक पीरियड में हिंदी सिनेमा के गीतों को भी पढ़ाया जाता. इन दिनों स्टूडियो में बैठे कभी दर्शन शास्त्र पढ़ रही हूँ ,कभी प्रकृति की सुन्दरता से अवगत हो रही हूँ तो कभी देशप्रेम की भावनाओं से भर उठती हूँ. कभी सूफी संगीत पर नतमस्तक हो जाती हूँ तो कभी झांझ मंझीरे की आवाज और ढोलक की थाप से लोकजीवन के रंग मुझे घेर लेते है. हर बार ऐसा लगता है की स्टूडियो के बाहर जब निकलूंगी तब एक बेहतर इंसान मेरे अंदर पाउगी. अपने भीतर असीम आत्मिक शान्ति महसूस करने लगती हूँ. ऐसे ही जीवन दर्शन से भरा एक गीत ज़रा आप भी सुने, जो क्या कुछ नहीं सिखा रहा.



 अनुभव

एक रेडियो जोकी के रूप में कभी-कभी बहुत दिलचस्प अनुभव होते है. आकाशवाणी के हैदराबाद रेनबो चैनल पर ‘दिल की बात’ नाम से बहुत आत्मीय–सा कार्यक्रम होता है. किसी एक विषय पर श्रोताओं से बातचीत करते हुए फ़िल्मी गाने सुनाए जाते हैं. एक बुधवार को मैंने ‘हम और हमारे पड़ोसी’ जैसा आम विषय रखा था. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब लोगों ने अपने वर्त्तमान पड़ोसियों के प्रति विशेष संतोष और आत्मीयता नहीं दर्शाई. हालांकि वे बरसों पहले रहे उनके पुराने पड़ोसियों से मधुर संबंधों का जिक्र जरूर करते रहे. बहुत से श्रोताओं को दुःख था की अब पड़ोसी एक दूसरे को जानते तक नहीं मदद करना तो दूर की बात है. पड़ोसी जैसे प्यारे रिश्ते में आई इस कमी पर ज्यादातर लोगों का मानना था की इसकी वजह सुविधाओं में वृद्धि तथा पर्याप्त धन की उपलब्धता है. हालांकि ये दोनों बातें किसी भी व्यक्ति के लिए सकारात्मक हैं मगर संबंधों के सन्दर्भ में ‘पड़ोसी’ जैसे रिश्ते का बलि चढ़ जाना गवारा नहीं हो सकता. 
आज ओन लाइन सुविधाओं से हर चीज घर बैठे प्राप्त हो जाती है तब भला पड़ोसियों की क्या जरूरत. मगर ऐसा नहीं है सुख-दुःख के रिश्ते सबसे पहले हमारा पड़ोसी ही निभा सकता है. हम भी किसी के पड़ोसी होते हैं तो कोई और भी हमारा पड़ोसी होता है
.बहरहाल, एक दिलचस्प वार्तालाप यह रहा की जब मैंने अपने एक श्रोता से अपने सवाल के बारे में बोलने को कहा तो वह बोला- ‘मैडम हम तो जंगल में रहते हैं..हमारे तो पासवाले खेत का मालिक ही हमारा पड़ोसी है..जहां तक उससे रिश्ते की बात है..उसके खेत से सब्जियां चुरा लाते हैं..एक दिन उसने देख लिया खूब झगड़ा हुआ... रात को हमने सोंचा हमसे पाप हो गया है... वह भी हमारे आम चुरा लेता है मैडम.. कोई बात नहीं...!’ पर अब हम चोरी नहीं करेंगे मैडम, सच्ची! आपकी आवाज बहुत अच्छी है मैडम...! ‘फिर उन्होंने एक शायरी सुनाने को भी कहा. मैंने इजाजत दी तो उन्होंने बहुत ही ख़ूबसूरत पंक्तियाँ सुनाई. खेतों के बीच रहनेवाले पड़ोसियों के इस अनुभव पर मैं खिलखिला पडी.

पर यह तो बात सही है की जो मैं समझ रही थी बहुत सारे श्रोता अपने पड़ोसियों की भरपूर प्रशंसा करेंगे और उनके सहयोग के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करेंगे लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ. मुझे दुःख भी हुआ है. एक सवाल खडा है मेरे सामने..क्या सचमुच समृद्धि और प्रगति मानवीय रिश्तों का अवमूल्यन कर जाते हैं..सोचिये..और कुछ कहिये भी..!