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Monday, March 25, 2019

बहुमूल्य ग्यारह रुपये ( नईदुनिया के नायिका परिशिष्ट में 23 मार्च 2019)

नईदुनिया के 'नायिका' परिशिष्ट में मेरी रचना पढ़ें।

संस्मरण/लघुकथा
बहुमूल्य ग्यारह रुपये
एकता कानूनगो बक्षी

दादी सुबह से ही अपने बटुए और बैग को टटोले जा रही थी।ऐसा रोज़ नही होता था कुछ खास दिनों को ही ऐसा होता था।
बहू वसुधा ने उनकी बैचेनी के बारे में पूछा तो बटुए को टटोलते हुए, दादी ने कहा- 'अरे लाड़ी, खुल्ले रुपये नहीं मिल रहे हैं।'
दादी की बहू उनकी बहुत लाड़ की थी इसलिए उसे वो हमेशा लाड़ी ही बुलाते।इनका रिश्ता माँ बेटी का ही था।
दादी ने वसुधा को  50 रुपये का नोट देते हुए कहा 'मुझे 50 रुपये के छुट्टे दे दो।  मुझे 10 रुपये चाहिए एक का सिक्का तो है मेरे पास।'

वसुधा ने 50 रुपये का नोट उन्हें लौटाते हुए कहा 'अरे ये 50 रुपये तो आप ही रखो,यदि बाजार से  कुछ लाना है तो मुझे बताओ आप।'
'नही कुछ नही लाना , अंकिता का कल परीक्षा परिणाम आ रहा है  ना! अंकिता को देना हैं।' दादी ने कहा।

वसुधा को दादी की हमेशा की आदत याद आ गयी। उनकी आदत थी जब भी घर में किसी की सालगिरह होती, त्योहार होता, घर पर कोई उनसे मिलने आते तो वो पहले ही 11 रुपये का इंतज़ाम कर के रख लेतीं और अच्छे कपड़े पहन तैयार हो जातीं।

जैसे ही कोई उनके आशीर्वाद के लिए चरणस्पर्श करता तो वो उनका हाथ सिर पर स्नेह और अधिकार से रख देतीं और खूब सारा आशीर्वाद देते हुए 11 रुपये थमा देतीं।

वह ग्यारह रुपये शायद जादुई रुपये होते थे जिनमें वे स्नेह और आशीष का मंत्र फूंक देतीं थीं। उनके अनुसार दस के साथ एक जोड़ना अनिवार्य होता था ।शून्य जीवन और विचारो में कभी नही आना चाहिए।इसलिए हमेशा ग्यारह का ही उपहार देतीं।
दादी के उपहार में अगर कुछ शून्य होता था तो वह था स्वार्थ और लालच।  उन ग्यारह रुपये से कभी कुछ खास खरीदा भी नहीं जा सकता था। यही वह मंत्र था जिसके कारण उनकी शुभकामनाएं और भावनाएँ ही सर्वोपरि हो जाया करतीं थीं।

मंहगाई के बढ़ने से वस्तुओं के दाम तो बढ़े ही पर उसके साथ ही स्नेह और घनिष्टता भी वस्तुओं की कीमत पर निर्भर होती गयी। बंद लिफाफो में रखे नोटो, महंगे उपहारों और बढ़ चढ़कर दी जाने वाली कृत्रिम शुभकामनाओं के बीच दादी के वे ग्यारह रुपए, स्नेह और आशीष में सिर पर रखे उनके हाथ के आगे सब कुछ बहुत कम है।

डॉलर के मुकाबले रुपया कितना भी चढ़ता उतरता रहा। ग्यारह रुपयों का उनका आशीर्वाद सदैव एक सा बना रहा।रिश्तों की गर्माहट और सच्चे आशीर्वाद के दादी के  वे ग्यारह रुपये बेशकीमती उपहारों और औपचारिक  बधाइयों से कई गुना बहुमूल्य हैं।

सदभाव के रंग ( जनसत्ता में 12 मार्च 2019)

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

माह के बहाने  जीवन का ‘मार्च’

एकता कानूनगो बक्षी

साल के हर महीने की अपनी एक अलग पहचान और विशेषता होती  है। मार्च को हम व्यस्त महीना कह सकते हैं. आदमी तो आदमी प्रकृति भी इन दिनों अपने को संवारनें, व्यवस्थित करने में सक्रिय हो जाती है। पतझड़ के बाद पेड़ों के नव पल्लवन और खिलने,फलने का ख़ूबसूरत समय मार्च के आगमन के साथ शुरू हो जाता है।जंगलों में भी पलाश अपने रंग बिखेरने लगता है। मौसम के भी बदले हुए मिज़ाज दिखाई देते हैं, कभी दिन भर की  तीखी धूप और सुबह शाम की सुकून भरी पुरवाई।



यही वक्त है जब विद्यार्थियों की साल भर की मेहनत दांव पर लगी होती है. कुछ विद्यार्थी साल भर के सबक को दोहराने में व्यस्त रहते हैं तो कुछ के ह्रदय परीक्षा केन्द्रों पर तैयारी के बावजूद  धड़कते रहते हैं। इसी तरह की सरगर्मी का माहौल इन दिनों सरकारी और निजी कार्यालयों में भी दिखाई देने लगता है।

सभी जानते हैं मार्च वित्तीय वर्ष की समाप्ति का माह भी होता है तो  सारे एकाउंट्स में ‘डेबिट-क्रेडिट’ करते हुए क्लोज़ भी करना रहता है। जब हम एकाउंट को क्लोज करते है तो उस प्रक्रिया से पूरे साल का लाभ-हानि भी हमारे सामने आ जाता है। एक तरह से कहा जा सकता है कि मार्च का महीना साल भर में ‘क्या खोया, क्या पाया’ की तस्वीर हमारे जीवन के कैनवास पर चित्रित करने का काम भी कर जाता है।



देखा जाए तो हमारे जीवन में भी कई एकाउंट्स है जिनका समय समय पर अवलोकन करते रहना चाहिए। क्योंकि इनका भी सही रख रखाव और संतुलन पूरे जीवन की बैलेंस शीट को प्रभावित करता है। जैसे कि हमारी सेहत , परिवार , हमारी देनदारियां, हमारे प्रेम और स्नेह का आदान-प्रदान जैसे खातों का संतुलन भी बनाये रखना बहुत आवश्यक है और साथ ही काफी चुनोतीपूर्ण भी है।



दुनिया ही नहीं हमारे जीवन मे भी अर्थशास्त्र का बहुत महत्व है। हमारी प्रत्येक जरूरत का निदान अंततः पैसों अर्थात धन की व्यवस्थित कार्ययोजना से ही निकलकर आता है। धन या संपत्ति को लेकर अनेक पारिवारिक मतभेद ,विवाद भी अक्सर देखने को मिलते हैं। ऐसे में लगता है कि कही ना कहीं  आर्थिक नियोजन के सन्दर्भ में हमारे दृष्टिकोण को सबको पुनर्विचार करते रहना चाहिए।

सामान्यतः हम लोग अपनी संपत्ति का निर्माण या बचत हमारी मूलभूत ज़रूरते पूरी करने के लिए करते हैं। मोटे रूप से  भोजन, आवास, पहन ने को वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित  भविष्य ही हमारी आगे की जरूरतें होती हैं। उसके उपरांत शेष धन का निवेश जनकल्याण के कार्यो में या फिर खुद के विकास के लिए करना काफी हद तक ठीक होता है। इसके अतिरिक्त धन का संचय तो  लालच ही कहलाएगा। अब देखिए !  आपको भूख है दो  रोटियों की पर आप चार  और अतिरिक्त खायेंगे  तो आप को  अजीर्ण होना स्वाभाविक है। अगर आप वो चार रोटियाँ किसी ज़रूरतमंद को दे देते हैं तो आपको मन में संतोष होगा और सुख शांति तो मिलेगी ही लेकिन  आपके आस पास की दुनिया को और ख़ूबसूरत बनाने का आप प्रयास भी करेंगें।

ज़रूरतों के हिसाब से सादगीभरा जीवन जीने से अपूर्व सुकून जीवन मे बना रहता है और हम व्यथित करने वाली अनेक परिस्थितियों से भी बच पाते है। पर इसका मतलब ये बिल्कुल भी नही की हम महत्वाकांक्षी न रहे। खूब मेहनत करें, जीवन में सीढियां चढ़ते जाएँ लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य केवल धन या आधिपत्य प्राप्त करना न रहे बल्कि उद्देश्य उस से कहीं अधिक बेहतर, सर्व कल्याणकारी हो जिससे आपका जीवन केवल ‘मैं’ तक नहीं बल्कि ‘हम’ के व्यापक क्षितिज को स्पर्श कर सके।

कहने का तात्पर्य यह है कि घर के हर सदस्य को बुनियादी आर्थिक समझ होना आवश्यक है। सभी को शिक्षित करना एक जटिल प्रक्रिया है. यह बेहद ज़रूरी है कि समझाइश के केंद्र में रुपये पैसे की  बात न होते हुए ज़रूरतों और बेहतर विकल्पों की बात की जाए।

एक हिदायत जो घर के बड़े बुजुर्ग  अक्सर छोटों से कहते हुए सुने जा सकते है कि   ‘ट्यूब लाइट बंद करो बिल बहुत आ जाएगा’. यह एक सीमित कथन है.  जब कि होना यह चाहिए कि ऊर्जा के नुकसान से व्यापक रूप से क्या असर होता है उस बारे में विस्तार से बात की जाए। इसके साथ ही चीज़ों को सहेजना, उसकी कद्र करना, रखरखाव करना, पुनः उपयोग करना.   इस तरह की शिक्षा जो शायद स्कूलों कालेजों में शायद न मिले पर सीधे तौर पर हमारे घरों की आर्थिक व्यवस्था और हमारे देश की अर्थव्यस्था पर गहरा असर छोड़ती हैं। बाज़ारवाद और विज्ञापनों से अति प्रभावित न होकर विवेकपूर्ण क्रय विक्रय करना भी धन का सही प्रबंधन सुनिश्चित करता है ।


व्यापक  दृष्टिकोण का होना हर क्षेत्र में सफल होने के लिए हम सभी के लिए बहुत जरूरी है. सीमित सोच और तात्कालिक लाभ हमे उस समय तो सशक्त और खुशहाल बना सकता है किन्तु भविष्य की स्थायी खुशी और सम्पन्नता की गारंटी नहीं होता। धन, संपत्ति को केवल  ज़रूरत पूर्ति की तरह ही देखा जाए तो बेहतर होगा। जीवन का असली मजा तो सोच-समझकर सबको साथ लेकर  ‘मार्च’ करने में ही आता है. जब बात मार्च  महीने की हो तो यह महीना तो खासतौर पर हर्ष और उल्लास के पर्व होली को भी अपने साथ लेकर आता है। उमंग, उल्लास,प्रेम, भाईचारे और सद्भाव के इन्द्रधनुषी रंग बिखरने की शुरुआत इसी माह की आज की तारीख से क्यों न शुरू कर दी जाए इस बार भी। यही हमारी परम्परा भी रही है। 

http://epaper.jansatta.com/m5/2065183/Jansatta/12-March-2019#page/6/1

गुनगुनाता हौसला / रविवारीय नईदुनिया के तरंग में ( 10 मार्च 2019)

आज रविवारीय नईदुनिया के तरंग में मेरी लघुकथा पढ़ें।

लघुकथा
गुनगुनाता हौसला
एकता कानूनगो बक्षी

सुधा दोपहर की नींद से अचानक से उठ बैठी। वॉश एरिया में आज कोई गुनगुना रहा था। यह समझने में उसे देर नहीं लगी कि शायद ये तो शीतल ही है,जो काम करते करते गुनगुनाती रहती है।

शीतल उनके घर में बर्तन साफ़ करने का काम करती थी।  स्वभाव से वह शांत,मृदुभाषी तो थी ही, अपने काम और व्यवहार से कुछ ही समय में उसने सबका मन भी मोह  लिया था।

देहात से आये अशिक्षित माँ पिता की संतान होने के बावजूद वह  शिक्षा के महत्व को समझती थी। इसलिए उसने आठवीं तक शिक्षा पूरी कर ली थी और अब काम के साथ साथ आगे की पढ़ाई जारी रखने की तैयारी भी कर रही थी।

अभी दो साल पहले उसकी शादी हो गयी तो अपना सारा काम अपनी माँ को सौप कर वह  ससुराल चली गयी। कुछ समय पहले अपने नवजात शिशु से मिलवाने भी वह सुधा के घर आई थी।

लंबे अंतराल के बाद माँ की बजाए आज शीतल वापस काम पर आई थी तो सुधा के कदम सहसा ही वाश एरिया की तरफ बढ़ गए, जहां शीतल अपने काम को हमेशा की तरह तल्लीनता से गुनगुनाते हुए अंजाम दे रही थी।

सुधा ने मुस्कुराते हुए शीतल से पूछा-'अरे शीतल कैसी हो? बहुत दिनों बाद आना हुआ इस तरफ।' शीतल ने चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरते हुए जवाब दिया-'मैं अच्छी हूँ आंटी, अब रोज़ मैं ही आऊँगी।'  'क्यों ससुराल नही जाना है क्या?'
'नही आंटी।'
'क्यो क्या हुआ?'  सुधा ने अपनी चिंता जाहिर की। 'अब आंटी क्या बताऊँ आपको! बहुत सारी परिस्थितियां है इसके पीछे, पर बस इतना है कि उनको मेरे जैसी लड़की नही चाहिए।'
'ओह ! फिर तुम्हारे बच्चे का क्या होगा?'  सुधा ने पूछा।

'मैं खुद ही अपने बच्चे की परवरिश करुँगी आंटी। मैंने आगे की परीक्षा के फार्म भी भर दिए हैं और सिलाई भी सीख रही हूँ और फिर ये काम तो है ही।'

सुधा और शीतल एक दूसरे को देख कर कुछ देर मुस्कुराते रहे।  फिर शीतल पुनः अपने काम मे लग गयी और गुनगुनाने लगी।

अबकी बार शीतल की स्वर लहरियां सुधा के अन्तःकरण में भी कम्पन पैदा करती रही देर तक।

ग्यारह रुपये (11 फरवरी 2019 ) नवभारत

आज नवभारत में मेरी लघुकथा पढ़ें ।

लघुकथा
ग्यारह रुपये
एकता कानूनगो बक्षी

दादी सुबह से ही अपने बटुए और बैग को टटोले जा रही थी।ऐसा रोज़ नही होता था कुछ खास दिनों को ही ऐसा होता था।
बहू वसुधा ने उनकी बैचेनी के बारे में पूछा तो बटुए को टटोलते हुए, दादी ने कहा- 'अरे लाड़ी, खुल्ले रुपये नहीं मिल रहे हैं।'
दादी की बहू उनकी बहुत लाड़ की थी इसलिए उसे वो हमेशा लाड़ी ही बुलाते।इनका रिश्ता माँ बेटी का ही था।
दादी ने वसुधा को  50 रुपये का नोट देते हुए कहा 'मुझे 50 रुपये के छुट्टे दे दो।  मुझे 10 रुपये चाहिए एक का सिक्का तो है मेरे पास।'

वसुधा ने 50 रुपये का नोट उन्हें लौटाते हुए कहा 'अरे ये 50 रुपये तो आप ही रखो,यदि बाजार से  कुछ लाना है तो मुझे बताओ आप।'
'नही कुछ नही लाना , कल परीक्षा परिणाम आ रहे  है ना! अंकिता को देना हैं।' दादी ने कहा।

वसुधा को दादी की हमेशा की आदत याद आ गयी। उनकी आदत थी जब भी घर में किसी की सालगिरह होती, त्योहार होता, घर पर कोई उनसे मिलने आते तो वो पहले ही 11 रुपये का इंतज़ाम कर के रख लेतीं और अच्छे कपड़े पहन तैयार हो जातीं।

जैसे ही कोई उनके आशीर्वाद के लिए चरणस्पर्श करता तो वो उनका हाथ सिर पर स्नेह और अधिकार से रख देतीं और खूब सारा आशीर्वाद देते हुए 11 रुपये थमा देतीं।

वह ग्यारह रुपये शायद जादुई रुपये होते थे जिनमें वे स्नेह और आशीष का मंत्र फूंक देतीं थीं। उनके अनुसार दस के साथ एक जोड़ना अनिवार्य होता था ।शून्य जीवन और विचारो में कभी नही आना चाहिए।इसलिए हमेशा ग्यारह का ही उपहार देतीं।
दादी के उपहार में अगर कुछ शून्य होता था तो वह था स्वार्थ और लालच।  उन ग्यारह रुपये से कभी कुछ खास खरीदा भी नहीं जा सकता था। यही वह मंत्र था जिसके कारण उनकी शुभकामनाएं और भावनाएँ ही सर्वोपरि हो जाया करतीं थीं।

मंहगाई के बढ़ने से वस्तुओं के दाम तो बढ़े ही पर उसके साथ ही स्नेह और घनिष्टता भी वस्तुओं की कीमत पर निर्भर होती गयी। बंद लिफाफो में रखे नोटो, महंगे उपहारों और बढ़ चढ़कर दी जाने वाली कृत्रिम शुभकामनाओं के बीच दादी के वे ग्यारह रुपए, स्नेह और आशीष में सिर पर रखे उनके हाथ के आगे सब कुछ बहुत कम है।

डॉलर के मुकाबले रुपया कितना भी चढ़ता उतरता रहा। ग्यारह रुपयों का उनका आशीर्वाद सदैव एक सा बना रहा।रिश्तों की गर्माहट और सच्चे आशीर्वाद के दादी के  वे ग्यारह रुपये बेशकीमती उपहारों और औपचारिक  बधाइयों से कई गुना बहुमूल्य हैं।

रिश्तों की रंगोली ( 1 फरवरी 2019 जनसत्ता)

जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।

रिश्तों की रंगोली
एकता कानूनगो बक्षी

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अन्य लोगों के बिना उसका जीवन संभव नहीं. समाज ही है जो मनुष्य की सभी प्रकार की ज़रूरतों को पूरा करता है। वह चाहे सुख-सुविधाओं की बात हो या मन की शान्ति की चाह या फिर अपनी संवेदनाओं, विचारों को दूसरों तक पहुंचाने की हार्दिक  इच्छा. यह सब तब ही हो पाता है जब हम लोगों के बीच रहते हैं, अपने सुख-दुःख बाँट पाते हैं। हमारे ऋषि मुनि और अनेक साधक कुछ समय के लिए एकाकी रहकर जरूर साधना करते रहे हैं लेकिन वे भी आशा और विश्वास की ज्योति और ज्ञान का प्रकाश लिए इसी समाज के कल्याण के लिए लौट कर आते हैं. इंसान को भौतिक सुख सुविधाओं की ज़रूरत तो होती ही है किन्तु  उससे कहीं अधिक भावनात्मक संबल की तलाश इसी समाज में बनी रहती है।

पुराने समय में साधन बहुत कम थे और अपनी जरूरतों की पूर्ती के लिए जद्दोजहत भी बहुत करनी पड़ती थी। डर अधिक थे इसलिए समूह भी बड़े होते थे। संयुक्त परिवार होते थे लेकिन समय के बदलाव और पारिवारिक जीवन शैली में परिवर्तन आने पर बिखरते रहे। हालांकि अभी भी कई संयुक्त परिवार अपवाद स्वरूप दिखाई देते हैं जो एक प्रकार की मिसाल कहे जा सकते हैं । आपसी समझ , सहनशीलता , स्नेह और आदर जैसे महान आदर्शो की नींव पर स्थापित परिवार ही लम्बे समय तक संयुक्त रह सकते है जहां हर सदस्य एक दूसरे से भावनात्मक और जैविक रूप से जुड़ा होने के बाद भी स्वतंत्र हो। किसी तरह की घुटन का यहां स्थान नही है। पर ऐसा होना आदर्श  स्थिति है जो की दुर्लभ ही होगी।

संयुक्त परिवारों के अलावा भी एक विस्तृत कुटुंब होता था । घरों की दीवारों और छतों की उपस्थिति से भी रिश्तों का निर्माण हो जाता था। पडौसियों के परिवार हमारे अपने कुटुंब का हिस्सा होते थे। छतों पर पतंग उड़ाते और बड़ियाँ, पापड बनाती बहुएं और सासें सब उसी कुटुंब का हिस्सा होते थे. सबके  सुख और दुख एक हो जाते थे। हालांकि ये स्थिति आज भी कहीं कहीं देखने को मिल जाती है. रिश्ते में प्रगाड़ता की चाह हो तो मकानों की मोटी दीवारें बाधक नहीं बन सकती। 

अब स्थितियां बहुत बदल गईं हैं। खासतौर पर शहरों और महानगरों में कुटुंब तो क्या, संयुक्त परिवार तक नहीं रहे. बेटे और पिता के अपने अलग अलग परिवार होते हैं। यहां पड़ोसी तो है पर दरवाज़े तभी खोले जाते है जब दरवाज़े की घंटी बजाई जाए। महानगर है, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग का फ्लेट है तो सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़े बंद रखना ज़रूरी है। बाप  बेटे भी पड़ोसी की तरह अलग रहते हैं। अपने तो होते हैं कभी कभी आते है मिलते हैं मेंहमानों की तरह।

ऐसे में यहां सिर्फ एक इंसान  नियमित घर के दरवाजे पर दस्तक देता है, बेल बजाता है। वह होती है घर पर काम करने वाली बाई। ये महरी केवल महरी नही हो कर घर की सदस्य जैसी ही हो जाती है। इस महरी में ही हमको हमारे बिछुड़े परिवार के सदस्य दिखाई देते हैं. माँ, दादी ,मौशी, बहन, और बेटी भी। और अगर आप मृदुभाषी है, उससे आत्मीयता से बात करते हैं तो वह भी स्नेह से आपको भिगो देती है। आपको गर्म-गर्म फुलके खिला माँ की याद दिला देती है,  तो आपके बीमार हो जाने पर आपके सर पर उसका स्नेह से भरा हाथ रखा होता है। तीज त्योहार पर नए कपड़े और चेहरे पर त्योहार सजाए पूरे घर को उल्लास से भर देती है। यहां भी रिश्ता तो ज़रूरत का ही है पर एक दूसरे के प्रति स्नेह और आदर इस रिश्ते को प्रगाढ़ कर देते हैं।

ये कहना गलत नही होगा कि हम एक दूसरे से ज़रूरत के लिए जुड़े हुए हैं। किसी से भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है तो किसी से सुख सुविधाओं की. लेकिन हमारे रिश्ते तब बिखर जाते हैं जब ज़रूरतें  मुँह फाड़कर बोलने लगती है या फिर हमारी केवल अपेक्षाएं ही रिश्तों को परिभाषित करने लगती हैं। असल मे ज़रूरते हमे एक दूसरे से मिलाती ज़रूर हैं पर हमें हमेशा के लिए जोड़े नही रख सकती क्योंकि हमेशा बेहतर विकल्प मौजूद होता है जिस से हमारी अपेक्षाएं और आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। शायद इसीलिए आज परिवार छोटे होते चले जा रहे है, मनुष्य एकाकी हो रहा है क्योकि वो अपेक्षाओं के दबाव से डरता है । हम ऐसे विकल्प ढूंढने की कोशिश करते है जिस से जीवन में तनाव कम रहे और शांति ज्यादा।

रिश्तों को बनाये रखने के लिए कृतज्ञता का भाव होना बेहद ज़रूरी है। किसी और के द्वारा किया हुआ हमारा छोटा सा छोटा काम हमे उसके प्रति कृतज्ञ बनाता है। चाहे वो छोटा बच्चा भी क्यो न हो। ये भाव हम सब मे बना रहना चाहिए।
हम उसके ऋणी है। उसके प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान की भावना हमेशा बनी रहना चाहिए। वहीं किसी की मदद करते समय अहंकार की भावना , स्वामित्व की भावना का भी विलोपन होना चाहिए। अपेक्षाओं का बोझ दूसरे के कंधों से हटाने के साथ ही खुद से भी हटा लेना चाहिए। तब जाकर शायद फिर से अपनों की महफिलें जमने लगे, किस्से, कहानियों और ठहाकों के दौर और आत्मीय स्नेह से भरे रंगों की रंगोलियां हर घर के आँगन में सजने लगे।

मनोविज्ञान की छांव ( 1 जनवरी 2019)

नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ जनसत्ता में आज मेरा लेख पढ़ें।

दुनिया मेरे आगे
मनोविज्ञान की छांव

एकता कानूनगो बक्षी

इन दिनों विद्यालयों,महाविद्यालयों में पारंपरिक विषयों के अलावा भी कई विषय भविष्य की ज़रूरतों को देखते हुए पढाए जा रहे हैं। जैसे कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं का प्रारम्भिक ज्ञान , प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी , उद्यमिता विकास संबंधी कुछ अध्याय भी कुछ जगह शुरू किये गए हैं. इसके अलावा स्काउट,गाईड,समाजसेवा आदि के साथ एनसीसी से भी एक बेहतर नागरिक के निर्माण और विकास की दृष्टि से कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी नियमित रूप से शामिल किया जाता रहा है. कई संस्थाओं द्वारा तो घुड़सवारी , तैराकी, नृत्य, संगीत जैसी कई खेलों और कलाओं को भी अपने पाठ्यक्रम में स्थान देकर विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं।



इन सब के बावजूद एक बहुत ज़रूरी विषय जो हम सब से छूटता रहा है,वह है मनोविज्ञान। हालांकि इस विषय को स्वतन्त्र रूप से पाठ्यक्रम के प्रमुख विषयों के तौर पर चुनने के लिए सुविधा होती है और डिप्लोमा, डिग्री और पीएचडी तक मनोविज्ञान विषय में किया जा सकता है. लेकिन क्या अब यह वह समय नहीं है जब इसे भी नैतिक शिक्षा,खेलकूद,पूरक भाषाओं के ज्ञान की तरह हरेक स्तर पर साथ-साथ पढ़ाया जाना शुरू कर दिया जाना चाहिए? नीतिशास्त्र (मोरल साइंस) के रूप में एक पतली सी पुस्तिका से हमारा परिचय प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ज़रूर करवाया जाता है, जिसमे जीवन मूल्यों से लेकर सामान्य शिष्टाचार, लोक व्यवहार आदि जैसे  महत्वपूर्ण विषयों को कुछ समय मे घुट्टी पिलाकर पढ़ा भर देने की औपचारिकता संपन्न करा दी जाती है.यदि इस विषय की गंभीरता लिया जाता तो  समाज में आत्महत्या, निराशा, क्रोध, बलात्कार, शोषण, मोब लिंचिंग जैसी घटनाओं के समाचार आये दिन नहीं सुनने को मिलते।



हुआ कुछ यूं कि शार्ट-कट में सफलता प्राप्त करने के लिए हमने ऊपरी ढांचा तो बहुत मजबूत और आकर्षक बना लिया पर अंदर से सब खोखला रह गया। ज़रा सी विपरीत परिस्थिति हमें हिला देती है, विवेक और पर्याप्त सोच विचार और अच्छे-बुरे का अनुमान लगाए जल्दबाजी में गलत और आत्मघाती निर्णय ले लेते हैं. यह बहुत दुखद है कि वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था ने किताबी ज्ञान और स्वस्थ शरीर बनाने को तो प्राथमिकता में रखा लेकिन मन की मजबूती के लिए कुछ ख़ास नहीं किया गया. हमने शिक्षा के दौरान दुनियाभर के बारे में बहुत कुछ जान  लिया लेकिन हम खुद को ही नही समझ पाए। जब खुद को ही ठीक से नहीं समझा तो दूसरे के मन और उनकी भावनाओं को समझने की क्षमता का विकास तो बहुत दूर की बात है.

हम अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग स्वयं तो प्रसन्न, संतुष्ट और खुश रहते ही हैं लेकिन अपने आचरण और व्यवहार से अन्यों के चेहरों पर पर भी मुस्कुराहट बिखेर देते हैं.  सामान्य से मनोविज्ञान का आम आदमी के जीवन मे कितना महत्व है उसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है.

समर्थ और सम्पन्न परिवार के एक बुजुर्ग हैं, जिनकी देखभाल के लिए सब लोग जुटे रहते है, समय पर दवा , खान पान का ध्यान , अच्छे कपड़े , पर्याप्त साफ़ सफाई होने के बावजूद उनकी सेहत गिरती गई. ,अनेक डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी ख़ास फर्क नहीं पडा। एक दिन उनके यहां उनके पुराने मित्र उनसे मिलने आये तो खूब पुरानी बाते हुईं, ठहाके लगे. परिणाम यह रहा कि  दूसरे दिन उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स में काफी अंतर देखा गया। अगर घर के सदस्यों को बुजुर्ग सदस्य की मनःस्थिति थोड़ी बहुत भी समझ आए तो परिस्थिति काफी बेहतर हो सकती है। दवा के साथ कुछ पल सुख दुख की बातें, कुछ हँसी-मज़ाक, यह सब कितना जरूरी है हम सब जानते हैं. अगर आप में थोड़ी भी मनोविज्ञान की समझ है तो आप बीमार से कभी भी उसकी बीमारी संबंधी अधिक बातचीत नही करेंगे. उस से सब तरह की वे बात करेंगे जिससे उसके भीतर उत्साह का संचार हो सके और वे अपने आपको  बेहतर महसूस कर सकें।



घर के बच्चो के साथ भी हमारा व्यवहार तभी सही हो सकता है जब हमने थोड़ा बहुत बाल  मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की हो । अक्सर देखा गया है माता पिता की नज़र बच्चे के किसी एक या दो पक्ष पर केन्द्रित हो जाती है जबकि समय के साथ कई बदलाव बच्चे में आते रहते हैं. उसके मनोभावों को समझना और उसके दोस्त बन कर रहना इसके लिए आपके अंदर बच्चे के मन को समझने की क्षमता होने की जरूरत है. जब आप खुद को ही नही समझ पा रहे हैं  तब उसकी मनस्थिति को समझना आपके लिए बहुत कठिन होगा।



हमारे यहां संस्थाओं में मानव संसाधन विकास विभाग होता है लेकिन बहुत कम ऐसी संस्थाएं है जहां यह विभाग कर्मचारियों  संबंधी आंकड़ों के व्यवस्थापन के अलावा अपने कार्मिकों के मन की क्षमताओं के विकास के लिए कुछ अलग से प्रयास करता होगा. ये एक ऐसा विषय है जिसमे लगातार सीखते और शोध करते रहने की ज़रूरत है। मनोविज्ञान की पढाई करने वाले विद्यार्थी भी अक्सर अपने ही मन की गुत्थी सुलझाने में सफल होने में सफल नहीं हो पाते. क्योकि मनोविज्ञान हमे खुद से और लोगो से जोड़ने का माध्यम होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सोचने समझने में दूसरों के कहे को ध्यान से सुनना भी बहुत महत्वपूर्ण बात होती है। केवल पुस्तकें पढ़कर हम मनोविज्ञान को समझ नहीं सकते हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अच्छे श्रोता भी बन सकें। दूसरों को ही नहीं अपने भीतर की आवाज को भी गहरे उतर कर सुने। वह नही जो दुनिया आपसे कहलवाना या करवाना चाहती है पर वो जो आप स्वयं चाहते हैं। दूसरे को जब सुने तब सिर्फ उसके शब्दो को नही अर्थो को भी सुने उसके कारण और परिस्थिति को सुने, जो उसे ये सब कहने और करने को मजबूर कर रहा है ।परिणामस्वरूप आपके अंदर विवेकशीलता आएगी आप सही निर्णय लेंगे और क्रोध,आक्रोश भी खत्म  हो सकेगा।


अगर आप मनोविज्ञान की थोड़ी भी समझ रखते हैं तो उनकी परेशानियों को वास्तविकता से समझ उनकी हौसला अफ़साई करेंगे. आपके कर्मचारी अपना सर्वश्रेष्ठ संस्था को देने में सफल होंगें ।  इतिहास की तरफ नज़र डालें तो हमारे कई महापुरुषों को मिला जनसमर्थन इस बात को सिद्ध भी करता है. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पीछे उनके अनेक साथी चलते थे क्योंकि उनमें दूसरे की मनःस्थिति समझने और मनोविज्ञान की गहरी समझ और क्षमता थी।

जब हम खुद के मन को और दूसरों के मन को, उनकी परेशानियों को समझ लेंगे तो हम और अधिक स्वाभाविक हो सकेंगे.  एक दूसरे का बेहतर ख्याल रख सकेगे, मनुष्य को मनुष्य की तरह देख पाएंगे, ज़िम्मेदार बनेगे.  गलत पूर्वाग्रहों से बचेंगे. शायद इसी तरह जीवन की कई मुश्किलों से बचा भी जा सकता है। बीता सो बीता कम से कम अब नया हो ।

डस्टबिन नहीं है लेकिन ( 24 दिसम्बर 2018 )

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

कविता
डस्टबिन नहीं है लेकिन 

निराशा,तिरस्कार,कुंठा,अपमान
खत्म करते रहते हैं उसको
सारे कूडे करकट को
छुपाए रखता है अपने भीतर 

चमकती दीवारों के पीछे के क्षरण को
जान पाना मुश्किल हो जाता है उसकी उपस्थिति से 
सबको साथ जोड़ने की कोशिश में
अकेलेपन का संत्रास झेलता रहता है वह उपेक्षित

और जब रोज रोज के
संग्रहित विष का असर होने लगता है
गलने लगती है देह उसकी   
पटक दिया जाता है
बेकार हो गई चीज़ों के साथ
एक दिन।

एकता कानूनगो बक्षी

कठपुतली बनते हम ( 6 दिसंबर 2018 जनसत्ता )

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

कठपुतली बनते हम
एकता कानूनगो बक्षी

कठपुतलियों का खेल हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है और आज भी खासा लोकप्रिय है। बच्चों के साथ साथ बड़े भी बड़ी रूचि के साथ इसका लुत्फ़ उठाते हैं। किस्से कहानियों से लेकर तात्कालिक वातावरण और दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखकर कलाकार नए खेल और कठपुतलियों के स्वांग रचता है। यह सब देखने में तो बहुत सहज,सरल लगता है लेकिन इस प्रदर्शन में सफल वही कलाकार हो पाता है जो काफी शोध, सोचविचार करके खेल या नाटक की कथा बनाता है  और देश काल और परिस्थिति के अनुकूल अपनी कठपुतलियों की साज-सज्जा और श्रृंगार करके हम सब के सामने प्रस्तुत करता है । यहां यह भी गौर करने की बात है कि हर दिन एक जैसा नाटक करने वाला बहुत जल्दी अपने दर्शकों को खो देता है।  वहीं हर बार नई कहानी और नए किरदारों को गढ़ने वाला कलाकार अपने खेल में आकर्षण बनाये रखने में सफल होता है। जहां तक इस मनोरंजक प्रदर्शन की बात है, कठपुतलियों का ये पुराना करतब हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है और इसे इसी खूबसूरती और गरिमा के साथ हमेशा बने रहना चाहिए आने वाली पीढ़ी के लिए।

कठपुतलियों की बात होते ही निश्चित ही सबका ध्यान उन पुतलियों की और जाता है जो काठ याने लकड़ी की बनी होती हैं। साज सज्जा और श्रृंगार के बाद वे लगभग हम मनुष्यों की ही तरह नजर आने लगती है जबकी उसे संचालित करने वाला कोई और व्यक्ति होता  है। कठपुतली मस्तिष्क विहीन होती है उसके पास बुद्धि नही होती। और यही सबसे बड़ा अंतर होता है हम में और किसी कठपुतली में। लेकिन यह विडम्बना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिये जाते हैं. निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता की कमी, व्यावहारिक समझ का अभाव,पर्याप्त साहस की बजाए अनजाने जोखिम का डर या फिर जल्दी से जल्दी सुविधा प्राप्त करने और अपने काम को शीघ्रता से अंजाम देने की हड़बड़ी भी हो सकता है।

कई परिस्थितियों में हमारा आचरण भी काफी हद तक कठपुतली के समान ही हो जाता है।
अब देखिए अगर हम अपने घर से ही शुरू करें तो किचन में ही किस तरह से हम कठपुतली के खेल में शामिल हो गए हैं। पहले हमारे हाथो में स्टील , पीतल ,मिट्ठी के बर्तन, रोटी को लपेटने के लिए मलमल का कपड़ा , हमारे क्षेत्र में उत्पादित होने वाले स्थानीय फल सब्जियां, अनाज, दालें , घी, तेल  ऐसी सामग्री जो हमे सुलभ तरीके से प्राप्त हो जाती थी और जिनके प्रयोग से हम स्वस्थ भी रहते थे।  फिर अचानक किसी कलाकार ने दृश्य बदल दिया और हमारे हाथ मे प्लास्टिक , नॉनस्टिक , एल्युमीनियम फॉयल , एयर फ्रायर नए तरह के अनाज, दूरदराज से लाई एक्सोटिक सब्जियों और फलों ने ले ली.  घी का सेवन तक हानिकारक हो गया, और खाद्य तेलों की विभिन्न ब्रांडों की बोतलों के साथ हम किचन के सेट वाले स्टेज पर कठपुतलियों की तरह किसी और के इशारों पर डोलने लगे। लंबे समय तक यही दृश्य चलता रहा और फिर अचानक किसी स्वास्थ्य रक्षा की चेतावनी के विज्ञापन के साथ पुरानी परम्पराओं को अपनाने के लिए फिर नया स्क्रिप्ट लिख दिया गया। मिट्टी सहित पुराने बर्तनों और प्राकृतिक और ओरगेनिक सामग्री के उपयोग के सन्देश वाली कहानियों पर मानवीय पुतलियाँ नृत्य करने लगीं. जो एंटिक की तरह महँगा सौदा बन गया।

पहले हम नीम की डाली से दातुन किया करते थे और नमक और सरसों का उपयोग भी दांत की सफाई के लिए करते थे। फिर पाउडर से अपने दांत मांजने लगे, फिर टूथपेस्ट आया। नए रंगों और नए स्वाद में.  उसमे लौंग और नमक भी डाला गया और हम कठपुतलियां बहुत खुश होती गईं.  इन दिनों नीम का दातुन भी ऑनलाइन मिलने लगा है....यह अलग बात है कि एक नीम का पेड़ अभी भी रोड़ किनारे खडा मुस्कुराता रहता है।

सौंदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में तो और भी मूर्खताओं के साथ हम इस खेल में शामिल होते गए हैं।  हमारे पूर्वज और उस जमाने के लोग चाहे वह सम्राट रहे हों या अनन्य सुंदरियां और आम स्त्री-पुरुष खूबसूरती और तंदुरुस्ती बनाये रखने  के लिए जो नुस्खे आजमा रहे थे उनको हमने आउटडेटेड मानकर भुला दिया और नए जमाने के महंगे कास्मेटिकस को अपनाकर हम क्या मात्र कठपुतली नहीं हो गए हैं? जिनकी डोर किन्ही और चतुर उत्पादकों और व्यापारियों की हाथों में है।  जबकि यह खेल भी स्थायी नहीं होता। क्षणिक दृश्य उपस्थित होता है। इसकी भी उतनी ही आयु होती है, थोड़े समय में ही इन कास्मेटिक का विपरीत असर जब दिखने लगता है तो मार्केट में इन्हें ठीक करने के नए प्रोडक्ट्स आ जाते है। फिर भी बात नही बनती तो विज्ञापन की तस्वीरों में फिल्टर्स एप्प काम करने लगते हैं। जो आपकी चेहरे की कमियों को पूरी तरह से छुपाने का दावा करने लगते हैं। बस इसके बाद अगला दृश्य आता है जिसमे आपके हाथों में एक टयूब होती है जिसमे वही उबटन मौजूद होता है जो आपने खुद से दूर कर दिया था आउटडेटेड समझ के।

 ये तो मात्र कुछ दृश्य हैं इसके अलावा भी हमने अपने इस जीवननाट्य में कठपुतली का किरदार निभाया है. बाजार और बाजारवाद की उँगलियों से शायद हम इस कदर संचालित किये जा रहे हैं कि समझ ही नहीं पा रहे कि हम कठपुतली नहीं मनुष्य हैं जिसे बुद्धि और समझ का उपहार जन्म के साथ प्राप्त हुआ है. हमारी आस्था और विश्वास यहां तक कि हमारी भाषा, विचार, और शिष्टाचार पर भी इसका गहरा असर आया है। एक तरह से हमारा व्यवहार और आचरण भेड़ों के समूह की तरह हो गया है. एक ऐसे सामूहिक गान का हिस्सा होते जा रहे हैं हम, जिसमें आँख बंद करके सबके सुर में सुर मिलाना ही श्रेष्ठ माना जा रहा. दुखद है कि हमे इससे ही सुख मिलने लगा है. जबकि ये हमारे लिए नुकसानदायक स्थिति है। यह स्थिति निजी तौर पर हमारी मौलिकता की भक्षक है। इस तरह की वैचारिक शून्यता एक तरह की नई प्रजाति को जन्म दे रही है जिनका उपयोग लगभग उसी तरह हो रहा  जैसे किसी प्रयोगशाला में जीव-जंतुओं के साथ किया जाता रहा है।

बेचने वाले से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी उपभोगकर्ताओं की है कि किन चीज़ों का स्वागत करना है और किन्हें छोड़ देना ही बेहतर होगा।

हम कितने ही आधुनिक क्यों न बन जाये , पर अपनी जड़ों से जुड़े रहने से ही हमारा पोषण होगा. चाहे किसी नई वस्तु की बात हो  या नए विचारो की, विवेक,समझ और साहस के साथ उसका पूरा आकलन करना बेहद ज़रूरी है  ताकि भविष्य में ईमानदार संभावनाओं को  सही आयाम मिले और अपने फायदे के लिए हमे कोई कठपुतली न बना सके।

कविता बूढ़ा पेड़ (17 नवम्बर 2018)

सुबह सवेरे में आज मेरी कविता पढ़ें।

बूढ़ा पेड़

घने हो गए पेड़ की छटाई के लिए
फंदा डाला
और एक आदमी तने का सहारा ले
चढ़ गया ऊंची मजबूत डाली पर

पेड़ ही ने उसे सहारा दिया और ऊँचाई भी

फिर आदमी ने
पेड़ की शाखाओं पर
कुल्हाड़ी से वार किए
पूरा पेड़ कांप गया

धराशाई होती गईं कमजोर शाखाएं

पेड़ के अंग बिखर गए ज़मीन पर
सड़क हरी हो गई ताजा कतरों से

आरी चलाई जा रही अब
अलग हुई डालियों पर
टुकड़ों टुकड़ों में बंट जाएगा पेड़
लदान के लिए

कुछ के घर संवारेगा
कुछ का चूल्हा जलेगा
अलाव में बदलकर
गर्माहट देगा कुछ लोगों को
जाड़े में

थोड़े दिनों में
फिर निकल आएंगी नई शाखाएं

बिना प्रतिशोध निकल आएंगे नए पत्ते
पंछी आते रहेगे नियमित
पुराने जख्मों को भूलकर
फिर मुस्कुराने लगेगा
बूढ़ा पेड़।

एकता कानूनगो बक्षी

मन की सफाई ( 30 ऑक्टोबर 2018 जनसत्ता)

आज जनसत्ता में मेरा लेख पढ़ें।

मन की सफाई

एकता कानूनगो बक्षी

वैसे तो हर दिन हम घर की और हमारे आसपास  की साफ़-सफाई नियमित रूप से करते रहते है, लेकिन जैसे ही त्योहारों का मौसम आता है हम कुछ अधिक सक्रिय होकर निष्ठा के साथ इस काम में जुट जाते है.  इसी समय घर-घर से बेजरूरत का पुराना सामान, अटाला और रद्दी पेपर आदि खरीदने वालों की फेरियां भी खूब लगने लगती है.  और सचमुच इन दिनों देखिए न रोज़ की सफाई के बाद भी कितना अटाला , कूड़ा और कचरा निकल ही आता है। जैसे जैसे हम इस कार्य में जुटते हैं बरसों से खोई और गुमशुदा चीजें भी बरामद होने लगतीं हैं. कुछ का हम त्याग  कर पाते हैं तो कुछ के मोहपाश में घिर जाते हैं. बहुत सी वस्तुओं से हमारी कई स्मृतियाँ जुडी होती हैं. कुछ को हम जरूरत न होने पर भी सहेज लेना चाहते हैं. ऐसा लगता हैं इन वस्तुओं के संग्रहण से हम कल के लिए कुछ खुशियाँ सुनिश्चित कर लेना चाहते हों. 



जब हम घर की सफाई इतनी मुस्तेदी से करते हैं तो हमे एकबार अपने भीतर की व्यवस्था का भी पुनरावलोकन जरूर कर लेना चाहिए । इस के लिए कुछ सवाल खुद से करना आवश्यक होंगे. मसलन क्या हमारे बचपन की मासूमियत, अल्हड़पन, वह निश्छल खिलखिलाहट सहज रूप से उपस्थित है या वह भी अनावश्यक चीजों की भीड़ में कहीं ओझल हो गई है. हमारा  शरीर पूरे दिन बिना थके हमारा साथ देता है ? क्या चेहरे पर जो झुर्रियां आ गयी हैं वो उम्र परिपक्वता बयाँ कर रही है या फिर वे चिंताओं के निशान हैं ? क्या आज भी हम कुछ समय उन लोगो के साथ बिता पाते हैं जो लोग हमारे प्रिय हैं, जो हमें निस्वार्थ प्यार करते हैं, जिनके साथ हम सहज रह पाते है ? हर सुबह कुछ नया करने की ललक और जोश के साथ क्या आज भी हम सुबह जाग पा रहे हैं ? उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम हों लेकिन ऐसे और कई भावुक और संवेदनापूर्ण सवाल भी हमे खुद से रोज़ पूछते रहना चाहिए और शांति से बैठकर उन पर चिंतन भी करना चाहिए ।



खुद को समझना और खुद से बात करना उतना ही ज़रूरी है जितना जीवन के लिए प्राणवायु ग्रहण करना । उम्र के साथ-साथ हमारे अंदर कई शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं. ऐसे में नई परिस्थिति के साथ खुद को तैयार करना बेहद ज़रूरी होता है । ज्यों ज्यों हमारे संपर्कों का दायरा बढ़ने लगता है परिणामस्वरूप कई तरह के विचारों  और खट्टे मीठे अनुभवों से हमारा सामना होने लगता है। जो आदतें हमारी पहले रहीं होंगी वो नई स्थिति में हो सकता है उपयुक्त न हो । कम उम्र में हमें सबक दिया गया कि जो अपने से बड़े कहे वो बात हमे हर हाल में माननी चाहिए, पर अब समय के साथ हमारे बड़ो में केवल हमारे परिजन और शिक्षक ही नही हैं, अन्य लोग भी शामिल हैं इसलिए अब समझदारी इसी में है कि आदर का भाव सबके साथ  रहे,लेकिन पर खुद के विवेक से ही अच्छे-बुरे का हर निर्णय लिया जाए। अब समय जब हमसे ज़िम्मेदारी की अपेक्षा करता है तो उस से घबराने की जगह पूरी ईमानदारी से उसका निर्वाह किया जाना चाहिए।



घर के अटाले के निपटान की तरह ही हमें अपने भीतर की सामग्री का निपटान भी करते रहना चाहिए. बढ़ती उम्र के साथ कुछ चीज़ें त्यागना चाहिए, वहीं कुछ चीज़ों को स्वीकार कर लेना चाहिए। ये तभी सम्भव है जब हम इस बारे में ईमानदारी से विचार करेंगे। अब देखिए जब घर को रोज़ साफ करने पर भी इतना कचरा जमा हो जाता है तो फिर हमारा मस्तिष्क और शरीर कितना कुछ इकट्ठा कर लेता होगा.  और फिर विचार तो लगभग अमर ही होते हैं. कुछ गलत इकट्ठा हो गए तो उनसे मुक्ति बड़ी कठिन हो जाती है. मन के विचार ही है जो हमे कमज़ोर या मजबूत बनाते हैं. 



हम तो चाहते है हमारा हर दिन उत्सव हो है . इसके लिए हमे दृढ़ता की झाड़ू थाम लेना चाहिए और नष्ट कर देना चाहिए उन विचारों को जो हमारे समय और सेहत को नुकसान पहुचा रहे है.  उन लोगो से भी हमे परहेज करना चाहिए जो अपनी नकारात्मकता से हमे कमज़ोर कर रहे हैं, क्योकि असल मे ऐसी कोई भी परीक्षा और कठिन घड़ी नही है जिसपर हम अपने साहस,मेहनत और विवेक के बल हम फतह हासिल ना कर सके । नकारात्मकता  दीमक की तरह है जो सब कुछ नष्ट कर देती है। हमे उसे अपने पास भी नही फटकने देना चाहिए।



सफाई के साथ साथ हमे इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि हम किन चीज़ों को अपने जीवन मे जगह दे रहे हैं, ये सब हमारे भविष्य की खुशहाली को निश्चित करते हैं या नहीं?  कहा भी गया है सही संगत और अच्छे साहित्य को अपने जीवन में जगह देनी चाहिए। नकारात्मकता का कूढा हमें कमज़ोर करके खत्म कर देता है खुद को समझना और मन की नियमित सफाई करना बेहद आवश्यक है।

इसलिये ये बहुत ज़रूरी है कि हम अपने भीतर की व्यवस्था का रखरखाव और साफ़-सफाई पर भी पर्याप्त ध्यान देते रहें. जिन्हें सहेजकर जीवन सुखी होता हो उन्हें रखकर भीतर के अटाले का भी त्याग करने में ही हमारा भला है।

http://epaper.jansatta.com/m5/1876177/Jansatta/30-October-2018#page/6/1

कविता वो संवाद ( 22 ऑक्टोबर 2018)

आज सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
वो संवाद

उफ़!  ये बदबू !
लगता नहीं कि यह घर है
दवाखाना लगता है

जी! यह घर ही है
धीमी आवाज़ में जवाब मिला

कहाँ से ?
चारो तरफ से तो घेर रखा है दवाओं ने
बाहर निकलो!
ज़रा सांस लो खुली हवा में
मिला करो अपनों से ..!

यही तो अपने हैं मेरे..
देखिये! वो छोटी सी लाल लिबास में
खड़ी है शीशे की मेरी दोस्त 
हर लेती है मेरा सारा दर्द

और जब नींद नहीं आती
तो वो दुबला सा लंबे कद का मेरा शुभ चिन्तक
सब संभाल लेता है बिना कुछ कहे 
मेरे साथ ही सोता है
यह मेरा छोटा सा
दर्द हारी बाम

अरे! कैसी बाते कर रहे हो !
परिवार कहाँ है आपका?
इतनी दवाई लेना ठीक नहीं आपके लिए

जी!
परिवार को फुर्सत नहीं अब अपनों से
सबके अपने अपने दुखड़े हैं

दोस्त तो होगा कोई आपका?

दोस्त तो कब के पीछे छूट गए
चले गए अपने नए आशियानों में

आप सही नहीं कर रहे अपने साथ,
बाहर निकलिए इन सब से
खुली हवा में चहल कदमी कीजिये थोड़ी बहुत

जी!आप सही कह रहे
ऐसा ही करूँगा अब
आप आ जाया कीजिये न मुझ से मिलने
अच्छा लगता है !!

 एकता कानूनगो बक्षी

कविता संक्षिप्त का विस्तार(1 ऑक्टोबर 2018)

आज सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़ें।

कविता
संक्षिप्त का विस्तार

एकता कानूनगो बक्षी

ब्रह्मांड के रहस्यों की पड़ताल करता वैज्ञानिक
कुछ पंक्तियों में ही दे देता है ज्ञान का  सूत्र

प्रकृति को देखा है
इशारों में अपनी बात कहते हुए
बारिश का संकेत देते हैं  बादल
ठंडी हवाएं पैगाम देती है जाड़े के आगमन का

चेहरे से पता चल जाता है जरूरतमंद का दुख
हिसाब नही देना होता उसे
कठिनाइयों का विस्तार से
कंधे पर रखा हाथ
हौसला देता है बिना कुछ कहे

संक्षिप्त का विस्तार सम्भव है
योजनाओं की बात हो जब
ईमानदार तथ्यों के साथ

संक्षिप्त में दिया निर्देश
बन जाता है सबब शीघ्र कार्यान्वयन का
कम शब्दों में कहने का हुनर
बचा लेता है उबाऊ भाषणों से

संवेदना का  बीज
रचनात्मकता से भर देता है
दो पंक्तियों की कविता
धरती आकाश को बाहों में भर लेती है।

कविता जनरेशन गैप ( 31 अगस्त 2018 सुबह सवेरे)

आज सुबह सवेरे में मेरी कविता पढ़े।

कविता
जनरेशन गैप
एकता कानूनगो बक्षी

घड़ी के मिनिट और सेकंड के काँटो
की तरह अलग है दोनों की रफ्तार
पर मकसद एक है

गर्म रक्त का जोशीला प्रवाह है इधर
तो उधर भी अनुभव के समुद्र में ज्वारभाटा आता रहता है समय समय पर

विचारों का टकराव होता है अक्सर
पर निकल ही जाता है अमृत हर मंथन पर

जीवन डगर पर साथ चल रहे दो पथिक
एक दूसरे में खुद को ढूंढते से प्रतीत होते हैं
कभी छायादार वृक्ष बन जाता है एक
तो लाठी बन पार करा देता है दूसरा दुर्गम रास्ता ।

एकता कानूनगो बक्षी

कविता उसका बड़ा दिन (13 अगस्त 2018)

आज नवभारत के पुणे एडिशन में पढ़े मेरी कविता ।

कविता
उसका बड़ा दिन
एकता कानूनगो बक्षी

माफ़ कीजिये
कि उसे याद नहीं रहा आज भी
कि आज बड़ा दिन है
बेखबर है वह कि
कौन थे हमारे स्वतंत्रता सेनानी
उसका दिल
उत्सव के जोश से नहीं भर रहा ज्यादा
हवाओं में गूँज रही किसी भी धुन और राग से

कोई और लय है उसके भीतर
जिसकी ताल पर थिरक रहा उसका मन और तन

तड़के ही ही निकल गया था यह योद्धा
बिना देखे आज की तारीख, वार और समय
रोज़ की तरह थी इसकी सुबह और उसका लक्ष्य

उसने तो सोचा ही नहीं कि आज गूंजेंगे नारे
और सारा अन्धेरा दूर हो जाएगा
शहद में डूबे शब्दों की रोशनी से

नहीं जानता कि आज बड़ा दिन है
पढ़ी लिखी बहन लौट आई है मायके वापिस ।
माँ का ऑपरेशन कराना बाकी है अभी
रोटी के इंतजाम में आज भी जुटना ही पडेगा रोज की तरह
जानता नहीं
कितनी आजाद हवा में सास ले रहा है वह

अभी-अभी दो लड्डुओं का पैकेट थमा गया है कोई
जब उतरेगी मिठास भीतर
सूरज खोद लाएगा पहाड़ के बीचो बीच से ...

लघुकथा टपरी( नईदुनिया 14 जुलाई 2018)

आज नईदुनिया नायिका में मेरी लघुकथा पढ़े।

लघुकथा
टपरी
एकता कानूनगो बक्षी

दीनू काका की टपरी पर लगी लकड़ी की बेंच पर
रोज की तरह बुजुर्गों की बैठक जमी हुई थी। अधिकांश सेवानिवृत्त अधिकारी और गण्यमान वरिष्ठ जन शाम की सैर के बाद यहीं इकट्ठा हो जाते थे।
चाय के दौर लगातार चले जा रहे थे। शुगर फ्री बिस्कुट करीने से छोटी सी तश्तरी में सजे हुए थे। काका को मालूम था कि उनके इन खास ग्राहकों में से ज्यादातर को मधुमेह है या एहतेहातन शक्कर से दूर रहते हैं। शुगर फ्री गोलियां भी वे रखते थे अपनी टपरी में।

अब यही चाय की दुकान संध्याकालीन चर्चा गोष्ठी में रूपांतरित हो चुकी थी। दीनू काका कई वर्षो से यहाँ टपरी लगा कर साहबों को चाय पिला रहे थे।देखते देखते टाई कोट पहनकर आने वाले साहब अब लकड़ी की बेंत थामे कुर्ता पाजामा या बड़मोला में उनकी दूकान में आने लगे थे।

काका की टपरी कई विषयों पर हुई बातचीत की गवाह रही है। आर्थिक ,राजनैतिक ,पर्यटन , खेल जगत की बातों के बाद अब आध्यात्मिक और मोटिवेशनल विषयों पर गहन चिन्तन की गूंज भी टपरी के पर्यावरण में महसूस की जाने लगी है।

एक तरह से दीनू काका को दीनदुनिया का सारा ज्ञान  ऐसी ही चर्चाओं से टपरी में ही मिलता रहा था। आज की चर्चा तीर्थयात्रा विषय पर आ रुकी थी। बुजुर्गों का मानना था कि जीवन की पूर्णता और मोक्ष प्राप्ति तीर्थाटन और देवदर्शन से ही संभव है। हालांकि कुछ बुजुर्ग इस पर सहमत नहीं भी थे।

जिन्होंने बहुत सारे देव स्थानों के दर्शन कर लिए थे वे  गौरव और संतुष्टि का भाव लिए हुए मुस्कुरा रहे थे, वहीं कुछ अपनी स्वास्थ्य और शारीरिक कठिनाइयों और पारिवारिक बंधनों की वजह से तीर्थाटन नहीं कर पाए थे,उनमें कुछ निराशा का भाव दिखाई दे रहा था।
एकाएक सब का ध्यान चाय बनाते चाचा पर केन्द्रित हो गया। काका भी उम्र के लगभग अस्सी वें  पायदान पर ही थे ।
एक सज्जन ने उनसे कहा 'अरे चाचा! जीवन भर चाय ही पिलाते रहोगे कि कुछ तीरथ वीरथ भी करोगे? यहाँ नहीं तो वहाँ तो स्वर्ग मिले।हमेशा केतली ही घुमाते रहोगे क्या.. !

दीनू काका ने बड़ी विनम्रता से कहा 'हुजुर समय ही कहाँ है..काम नही किया तो भूखे मर जाएंगे , ऊपर वाले ने ताकत दी है तो दिनभर आप सबकी खिदमत कर पा रहा हूँ..उस से और क्या मांगू.. '
आप सबको खुशी खुशी चाय की चुस्कियां लेते बातचीत करते देखता हूँ तो मजा आ जाता है.. खुशियाँ हो तो यहीं स्वर्ग है साहब।' 

दीनू काका  की बात सुनकर फीकी  चाय के आखिरी घूँट भीतर उतार सभी अपने अपने घरों की ओर लौट चले।

काका ने भी चाय के पतीले को उतार रात के लिए बिरयानी की हांडी चड़ा दी। कॉलेज के युवाओं का लघु सेमिनार रोज रात जो यहां होता रहता था।

कुदरत का कर्ज (जनसत्ता 10 जुलाई 2018)

विश्व पर्यावरण दिवस पर 
लेख 
हम ऋणी है 
एकता कानूनगो बक्षी 

छुट्टियां को सही तरह से  बिताने के लिए हम सब अक्सर प्रकृति की ओर रुख करते है जंगलो पहाड़ो झरनों के बीच सुकून के कुछ पल बिताते है दुर्लभ और उस क्षेत्र के  पशु पक्षियों के चित्र लेते है और उन्हें हमेशा के लिए संजो लेने की कोशिश करते है हमारी वैकेशन की एल्बम में ।बस यही तो है पर्यावरण , हमारे आस पास मौजूद प्रकृति ,जीव जंतु  सुखद स्वस्थ वातावरण,  जो हमारे स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है . ये हम सभी के लिए सब से बड़ा उपहार है अगर हमारा पर्यावरण स्वस्थ है तो हम स्वस्थ है और खुशहाल भी ।

इन दिनों आदर्श पर्यावरण और वास्तविक पर्यावरण के बीच की खाई कुछ गहराती जा रही है , हमे इतना भी उसे गहरा नही कर देना चाहिए कि फिर हम उसे कभी पहले जैसा न कर सके और इस खाई में  गिर हम खुद नष्ट हो जाये ।

इस बारे में कई बार कहा और लिखा गया है कि हमारी छोटी छोटी आदतों में बदलाव से हम अपने पर्यावरण का पूरा दृश्य ही बदल सकते है ।पर असल मे सब से पहले अगर किसी बदलाव की ज़रूरत है तो वो हमारी मानसिकता की है ।

 इंसानी फितरत है कि जो चीज़ हमे बिना मेहनत और खर्चे किये हुए मिलती है उसका हम दुरुपयोग करते है। प्रकृति ऐसी ही एक देन है जो बचपन से हमे स्वतः ही मिल गयी। हम इसका दोहन जन्म होते ही करते है जब हम हमारी पहली सांस लेते है कैसे प्रकृति में उपस्थित प्राण वायु खुद ब खुद बिना मांगे हमारे अंदर प्रवेश कर हमारा  स्वागत करती है , और उसके साथ ही हमारी हर छोटी से छोटी ज़रूरतो के लिए हम प्रकति पर निर्भर होते चले जाते है  जीव जंतु पेड़ पौधे जड़ी बूटियां सब लग जाती है हमारा पोषण करने । शायद प्रकृति में स्वाभाविक रूप से मनुष्य के प्रति प्रेम और उसका पालन पोषण करने का भाव विधमान है ।

   मानव प्रजाति  की सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है जो असम्भव को संभव बनाने में सक्षम है ।अनूठे आविष्कार करने में हम दक्ष है , पर हमसे भी गलतिया होती है जब हम हमारी सीमा भूल जाते है क्षणिक सुख के लिए हम ये भूल जाते है कि हम असल मे उन स्वाभाविक तत्वों में बदलाव ला रहे है जिसका कोई एवज नही है यहा तक कि उनके बिना हमारा जीवन ही नष्ट हो सकता है ये सब सब हमारी बुद्धिमत्ता नही मूर्खता ही दर्शाती है ।आज फेस मास्क , वाटर प्यूरीफायर , ,एयर प्यूरीफायर ये सब ज़रूरत की वस्तुएं बनती चली जा रही है क्योंकि हमने खुद ही हमारी गतिविधियों से खुद को वेंटीलेटर पर रख दिया है, ।काश की हमारी हर गतिविधि क्षणिक सुख को लेकर नही दीर्घकालीन सुख के लिए हो ।

हम से पहले ये प्रकृति जीव जंतु इस पृथ्वी पर मौजूद है हम से पहले ये भूमि इन सब की है । हमने इन्ही की जगह पर पहाड़ो ,नदियों ,पेड़ो को नष्ट कर खुद के लिए घर ,आफिस, फैक्टरियां ,माल हर सुविधा का प्रबंध कर लिए  इन सभी को पूरी तरह नज़र अंदाज़ करके , आज जो पक्षी हमारी बालकनी में आता है उसे हम पानी देकर गोरवनीत होते है असल में कभी  वहा उसका बसेरा होता होगा , जो मटमैला सा नाला हमे रास्ते मे दिखता है वहा का निर्मल जल पीकर वह प्यास बुझाता होगा। हम बर्ड हाउस बनाते  है जबकि जिस ज़मीन पर हमारी पूरी कॉलोनी कटी है वहा उसका भी आलीशान घर था ।हम मात्र किरायदार है जिन्होंने बिना मकानमालिक की मंजूरी के उसकी कृति को बेपरवाह ढंग से इस्तेमाल करने की गलती की है और करते जा रहे है ।मकान मालिक भी हमारे प्रति सख्त ज़रूर होगा और वो अब दिखने भी लगा है क्योंकि आज वायु ,जल, फल,सब्जियां   की गुणवत्ता में कमी होती जा रही है , मौसम का बदलाव , ग्लोबल वार्मिंग , प्राकृतिक आपदाएं हमारे  सामने है ।हमारे साथ साथ मासूम जानवर भी इसका शिकार हो रहे है जिन्होंने कभी अपनी सीमा नही उलाँघि ।

हम सब ऋणी है , पर कोशिश की जाए तो छोटे छोटे प्रयासों से हम सारा ऋण हम चुका भी सकते है । ज़रूरत है विवेकपूर्ण जीवन की जिनमे हर अविष्कार और हर कदम,  आने वाले कल और सभी के हित के लिए हो , क्योकि हम प्रकृति के अभिन्न अंग है । ताकि पर्यावरण की परिभाषा सिर्फ शाब्दिक ना रह जाये।

कविता बूंदों की उम्र

सुबह सवेरे में प्रकाशित मेरी कविता पढ़े। (27 जून 2018)

कविता
बूंदों की उम्र
एकता कानूनगो बक्षी

बूंदों की उम्र क्षणिक
छोटा सा जीवन
सदियों के विशाल संसार में
जैसे छोटी सी उम्र  इंसान की

पलके खुलने से
पलके मुंदने तक का सफ़र
पल भर में मिल जाती संसार सागर में

बूंदों का सफ़र
मधुर स्मृतियों का जैसे एलबम पुराना
सारांश सुख दुख का

खट्टे मिट्ठे अहसासों
और आलोचनाओ के तराजू के पलड़ों से
खुद को आज़ाद कर देता है जब मन
बारिश होने लगती है
बहने लगती हैं बूँदें

क्षण भर के लिए चमकती बूँदें
ठंडक देकर
अपनी उम्र पूरी करती है।

एकता कानूनगो बक्षी

Thursday, March 21, 2019

हमारे लिए बेशकीमती उपहार की तरह है पर्यावरण के सारे घटक (6 जून 2018)

आज सुबह सवेरे में मेरा लेख पढ़ें।(6 जून 2018)

हमारे लिए बेशकीमती उपहार की तरह है पर्यावरण के सारे घटक
एकता कानूनगो बक्षी

अपनी छुट्टियों को आनंद के साथ अच्छी तरह से बिताने के लिए अक्सर हम प्रकृति का रुख करते हैं. जंगलों पहाड़ों,झरनों, नदियों और समुद्र के किनारों के साथ सुकून के कुछ पल बिताते हैं. प्रवासी, दुर्लभ और उस क्षेत्र के ख़ास पक्षियों और पशुओं, वन्य प्राणियों सहित वहां के स्थानीय जन जीवन के चित्र अपने कैमरों में सहेज लेने के लिए लालायित हो जाते हैं. हमारी वैकेशन एल्बम और स्म्रतियों में यही सब तो वहां से लेकर लौटते हैं। नहीं लौटते तो इस बात का जवाब और इसके पीछे छुपा सन्देश कि आखिर क्यों वहां का वातावरण हमारा मन मोह लेता है..और क्यों हमारे आसपास ही यह सब मौजूद नहीं हो पाता.... और क्यों नहीं कुछ ख़ास जगहें ही पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण और लोकप्रिय बन जाती हैं.और लोग बार बार वहां जाना पसंद करते हैं...



पर्यावरण आखिर है क्या? हमारे आस पास मौजूद प्रकृति ,जीव जंतु, प्राणी ,हवा पानी,और मिट्टी से मिलकर जो परिदृश्य बनता है. जो हमें धरती पर ठीक से रहने की सुविधा प्रदान करता है. यही तो है पर्यावरण. जिसका शुद्ध,स्वच्छ होना हमारे तन, मन के स्वस्थ विकास के लिए बहुत जरूरी है. दरअसल पर्यावरण के सारे घटक प्रकृति और इस धरती की ओर से निस्वार्थ बल्कि यों कहें हमारे लिए बेशकीमती उपहार हैं. अगर हमारा पर्यावरण बीमार नहीं होगा तो हमारे भी स्वस्थ और खुशहाल होने के अवसर बड़ जाते हैं. आसपास के पर्यावरण में अपने दुर्गुणों के वायरस छोड़, हम अपने स्वास्थ्य की तलाश में पहाड़ों, नदियों, झीलों, अभयारण्यों और वन्य जीवन के बीच छुट्टियां बिताने चले आते हैं.



पर्यावरण और वास्तविक पर्यावरण के बीच की खाई इस दौर में कुछ अधिक गहराती जा रही है पर्यावरण के घटकों के बीच जो सन्तुलन होना चाहिए वह निरंतर गड़बड़ा रहा है. यह असुंतलन इतना भी अधिक न हो जाए कि जिस माहौल में हम रहते हैं उसी को वास्तविक पर्यावरण मान बैठें. धीरे-धीरे हमारे आम शहर और बस्तियों के पर्यावरण और पर्यटन स्थलों के पर्यावरण के बीच का अंतर भी कम होता जा रहा है. यदि आपने देखा होगा तो इन दिनों मैदानी इलाकों में पड़ने वाली गर्मी के लगभग बराबर गर्मी पहाडी स्थलों पर पड़ने लगी है. वृहद स्वच्छता अभियान के बावजूद समुद्र और नदियों के कई किनारों पर स्थित मंदिरों का कूढा करकट, फूल मालाएं, पूजा सामग्री आदि यहाँ-वहां बिखरी पडी दिखाई दे जाती है. दुर्गन्ध का असहनीय वातावरण वहां निर्मित हो जाता है. हालांकि कुछ चेतना अब हमारे समाज में आई है और शासन, प्रशासन भी अब कुछ ध्यान देने लगा है. फिर भी समस्या के बढ़ने के पहले सचेत रहना बहुत आवश्यक होगा.

इस बारे में कई बार कहा और लिखा भी गया है कि हमारी छोटी छोटी आदतों में बदलाव से हम अपने पर्यावरण का दृश्य ही बदल सकते है। लेकिन यह भी ठीक कहा जाता है कि सब से पहले अगर किसी बदलाव की ज़रूरत है तो उसकी शुरुआत हमारी मानसिकता के बदलाव की होगी।



इंसानी फितरत है कि जो चीज़ हमे बिना मेहनत और खर्च के मिल जाती है उसका हम बिना सोचे अपव्यय या दुरुपयोग करने लगते हैं। व्यापक अर्थों में कहें तो प्रकृति सृष्टि की ऐसी देन है जो हमे जन्म के साथ स्वतः ही मिल गयी है। इसका दोहन जन्म होते ही हम अनायास ही करने लगते हैं. पहली सांस लेते ही प्राणवायु खुद ब खुद बिना मांगे हमारे अंदर प्रवेश कर धरती पर हमारी अगवानी करती है , और इसके बाद तो हर छोटी से छोटी ज़रूरत के लिए हम प्रकति पर निर्भर होते चले जाते हैं. जीव जंतु पेड़ पौधे जड़ी बूटियां सब लग जाती है हमारा पोषण करने । शायद माँ की तरह ही प्रकृति में भी यह स्वाभाविक गुण होता है जो सब कुछ देकर, सहकर भी अपने बच्चों के भले का ही सोचती रहती है.



  मानव प्रजाति  की सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है जो असम्भव को संभव बनाने में सक्षम है ।अनूठे आविष्कार करने में हम दक्ष है , पर हमसे भी गलतियाँ होती है. जब हम अपनी मर्यादा भूल जाते हैं,  क्षणिक सुख के लिए हम ये भूल जाते है कि असल मे हम उन मूल और प्राकृतिक तत्वों में बदलाव ला रहे है जिसका कोई विकल्प ही नही है. यहाँ तक कि उनके बिना हमारा जीवन ही नष्ट हो सकता है. ये सब सब हमारी बुद्धिमत्ता नही मूर्खता ही दर्शाती है। कैसी विडम्बना है कि आज फेस मास्क , वाटर प्यूरीफायर, एयर प्यूरीफायर जैसी चीजें ये सब रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं बनती चली जा रही हैं. क्योंकि हमने खुद ही हमारी हरकतों  से खुद को वेंटीलेटर पर लाकर रख दिया है । काश हमारे सारे कामकाज  और आचरण तात्कालिक लाभ और क्षणिक सुख को लेकर नही बल्कि पर्यावरण का ध्यान रखते हुए सार्वकालिक आनन्द के खातिर हो.



हम से काफी पहले से ये प्रकृति, जीव जंतु..आदिवासी, वनवासी, इस पृथ्वी पर रहते आये हैं. हम से पहले ये धरती इन सबकी भी है । हमने इन्ही की दुनिया पर अपना हक़ जमाने का प्रयास किया है. उनके ठिकानों को ध्वस्त करके अपनी एशगाहें खडी की हैं. पहाड़ों, नदियों, पेड़ो की बर्बादी से बस्तियां सजाईं हैं...

आज जो पक्षी हमारी बालकनी में आता है उसे हम शहरी लोग उसके लिए पानी का सिकोरा रख गौरवान्वित होते हैं. यह अच्छी बात है लेकिन ज़रा सोचिये असल में कभी वहां उसका बसेरा भी  होता होगा . जो गंदा-सा सा नाला हमारी सोसायटी के किनारे बहता है , कभी कितनों की ही प्यास बुझाता रहा होगा. हम घर के पोर्च में बर्ड हाउस बनाते  हैं जबकि जिस ज़मीन पर हमारा घर बना है उसी पर कभी बरगद का ऐसा पेड़ था,जिस पर हजारों पक्षी रात भर बसेरा करते थे. हम तो मात्र किराएदार हैं..  जिन्होंने बिना असली मालिक की मंजूरी लिए अवैध कब्जा जमा लिया है..इस अपराध का दंड तो जरूर मिलेगा...मिलने भी लगा है..

मौसम का मिजाज बदल रहा है, पृथ्वी दिनों दिन आग उगलने लगी है..ग्लोबल वार्मिंग, अनसोची प्राकृतिक आपदाएं, बिन बुलाये खतरनाक वायरस, लाइलाज बीमारियाँ.. ये सब क्या है.. हमारे अपराध की सजाएं ही तो हैं.  हमारे साथ साथ अबोध शिशु और जानवर भी इसका शिकार हो रहे हैं..



सच तो यह है कि हम सब प्रकृति का ऋण चुकाने में कोताही करते रहे हैं.

कोशिश की जाए तो भी इस ऋण को चुकाया नहीं जा सकता लेकिन पर्यावरण रक्षा के छोटे छोटे प्रयासों से अपनी साख जरूर बचाई जा सकती है.